महिलाएँ खेती में बढ़ीं लेकिन कमाई और अधिकार में पीछे, हर दो में से एक महिला को नहीं मिलता वेतन; रिपोर्ट में सामने आए आँकड़े

Umang | Aug 20, 2026, 11:17 IST
भारत की खेती में महिलाओं की भागीदारी बढ़कर करीब 48 प्रतिशत हो गई है, लेकिन Arya.ag की रिपोर्ट के मुताबिक़ कृषि में काम करने वाली 50.5 प्रतिशत महिलाएँ परिवार के खेतों पर बिना वेतन मददगार के रूप में काम करती हैं। महिलाओं के पास केवल 13.96 प्रतिशत कृषि जोतों का संचालन है। कर्ज़, तकनीक और संसाधनों तक सीमित पहुँच से उनकी उत्पादकता और आय प्रभावित होती है। रिपोर्ट ने महिला किसानों को बेहतर वित्त, तकनीक, बाज़ार और किसान संगठनों तक पहुँच देने की सिफ़ारिश की है।

भारत की खेती में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है, लेकिन उनके काम की पहचान और कमाई के मामले में अब भी बड़ा अंतर है। एग्रीटेक प्लेटफॉर्म Arya.ag (आर्या डॉट एजी) की ‘हर हार्वेस्ट 2026’ रिपोर्ट के मुताबिक़, कृषि क्षेत्र में काम करने वाली 50.5 प्रतिशत महिलाएँ परिवार के खेतों पर बिना वेतन मददगार के तौर पर काम करती हैं। पुरुषों में यह हिस्सेदारी 21.7 प्रतिशत है। यानी खेती में बड़ी संख्या में महिलाएँ काम तो कर रही हैं, लेकिन उनके काम को अलग किसान या कमाने वाले कामगार के रूप में दर्ज नहीं किया जाता।



रिपोर्ट के अनुसार, कृषि कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी अब करीब 48 प्रतिशत हो गई है, जो 2017-18 में लगभग 30 प्रतिशत थी। इसके बावजूद महिलाओं की ज़मीन, कर्ज़, कृषि संसाधनों, तकनीक और बाज़ार तक पहुँच पुरुषों की तुलना में कम है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यही अंतर उनकी कमाई और खेत की उत्पादकता पर भी असर डालता है। रिपोर्ट में सार्वजनिक आँकड़ों और विभिन्न संस्थागत स्रोतों के आधार पर भारत में महिला किसानों की स्थिति का आकलन किया गया है।



खेती में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ी, लेकिन पहचान अब भी कम

रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत के कृषि कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 48 प्रतिशत है। 2017-18 में यह लगभग 30 प्रतिशत थी। इसका मतलब है कि पिछले कुछ वर्षों में खेती से जुड़े कामों में महिलाओं की भागीदारी काफ़ी बढ़ी है। लेकिन आधिकारिक आँकड़ों में परिवार के खेत पर बिना वेतन काम करने वाली महिला को अक्सर किसान के रूप में दर्ज नहीं किया जाता। रिपोर्ट के अनुसार, कृषि में काम करने वाली 50.5 प्रतिशत महिलाएँ इसी श्रेणी में आती हैं। पुरुषों में परिवार के खेत पर बिना वेतन मददगार के रूप में दर्ज होने वालों की हिस्सेदारी 21.7 प्रतिशत है।



भारत में महिलाओं के नाम पर कितनी खेती?

रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कुल कृषि जोतों में महिलाओं के संचालन वाली जोतों की हिस्सेदारी 13.96 प्रतिशत है। दुनिया में इसका औसत करीब 14.5 प्रतिशत है। भारत में महिलाएँ खेती के कुल क्षेत्रफल के 11.72 प्रतिशत हिस्से का संचालन करती हैं। इसकी तुलना में ब्राज़ील में यह हिस्सेदारी 8.5 प्रतिशत और अमेरिका में 7 प्रतिशत है। नेपाल इस मामले में भारत से आगे है। वहाँ महिलाओं के पास 32.4 प्रतिशत कृषि जोतें हैं और वे 22.3 प्रतिशत कृषि क्षेत्र का संचालन करती हैं।



महिलाओं के खेतों की उत्पादकता कम क्यों?

रिपोर्ट में कहा गया है कि समान आकार के खेतों की तुलना में महिलाओं द्वारा संचालित खेतों की उत्पादकता 24 प्रतिशत तक कम हो सकती है। रिपोर्ट इस अंतर को महिलाओं की क्षमता से नहीं जोड़ती। इसके पीछे कर्ज़, बीज, खाद, तकनीक और दूसरे कृषि संसाधनों तक महिलाओं की कम पहुँच को प्रमुख वजह बताया गया है।



रिपोर्ट के अनुसार, कृषि-खाद्य क्षेत्र में महिलाओं को पुरुषों की हर 100 रुपये की कमाई के मुकाबले करीब 82 रुपये मिलते हैं। वहीं, समान काम के लिए महिला कृषि श्रमिकों को पुरुषों की तुलना में 20 से 30 प्रतिशत कम भुगतान मिलने की बात कही गई है।



संसाधनों की कमी से देश को बड़ा आर्थिक नुकसान

रिपोर्ट ने खाद्य एवं कृषि संगठन यानी एफएओ के अनुमान का हवाला देते हुए कहा है कि उत्पादक संसाधनों तक असमान पहुँच से कृषि उत्पादन में 2.5 से 4 प्रतिशत तक की कमी हो सकती है। भारत के 48.7 लाख करोड़ रुपये के कृषि सकल मूल्य वर्धन को आधार बनाकर रिपोर्ट का अनुमान है कि संसाधनों तक असमान पहुँच के कारण देश हर साल 1.2 से 2 लाख करोड़ रुपये के कृषि उत्पादन से वंचित रह सकता है। रिपोर्ट का कहना है कि इसका कारण यह नहीं है कि महिलाएँ कम खेती करती हैं, बल्कि उन्हें खेती के लिए ज़रूरी संसाधन कम मिलते हैं।



महिला किसानों को कर्ज़ और तकनीक की ज़रूरत

Arya.ag के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी प्रसन्ना राव ने कहा कि महिला किसानों को कर्ज़, भंडारण, तकनीक और संगठित बाज़ार तक बेहतर पहुँच मिलने पर इसका फायदा उनके परिवार के साथ पूरी कृषि अर्थव्यवस्था को होगा। उन्होंने कहा कि 2026 को ‘अंतरराष्ट्रीय महिला किसान वर्ष’ के रूप में मनाए जाने के दौरान ऐसी व्यवस्था बनाने का अवसर है, जिसमें महिलाएँ कृषि में बराबरी से भाग ले सकें, नेतृत्व कर सकें और आगे बढ़ सकें।



रिपोर्ट ने महिला किसानों के लिए क्या सुझाव दिए?

  • रिपोर्ट में महिला को किसान के रूप में पहचान देने के लिए सिर्फ़ यह देखे जाने का विरोध किया गया है कि ज़मीन किसके नाम पर है। इसके बजाय महिला की वास्तविक कृषि गतिविधि को भी पहचान देने की बात कही गई है।
  • रिपोर्ट ने सुझाव दिया है कि कृषि कर्ज़, उपज की ख़रीद और किसान उत्पादक संगठनों यानी एफपीओ की सदस्यता से जुड़े आँकड़े महिला और पुरुष के हिसाब से अलग-अलग दर्ज किए जाएँ।
  • महिलाओं के लिए कम या बिना ज़मानत वाले कृषि कर्ज़, वेयरहाउस रसीदों और उनके नाम पर कृषि ऋण खातों का विस्तार करने की भी सिफ़ारिश की गई है।
  • इसके अलावा, महिलाओं की भागीदारी वाली संस्थाओं के ज़रिए ड्रोन, कृषि सलाह और बाज़ार से जुड़ी तकनीक तक उनकी पहुँच बढ़ाने की बात कही गई है।
  • रिपोर्ट में महिला-नेतृत्व वाले एफपीओ को केवल छोटी अवधि की योजनाओं तक सीमित रखने के बजाय लंबे समय तक काम करने वाले बाज़ार संस्थानों के रूप में विकसित करने पर भी ज़ोर दिया गया है।
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