भीषण गर्मी में बिना खेत और बिना मिट्टी उग रहा हरा चारा, महिला उद्यमियों को भी हो रही कमाई, जानिए कौनसी है ये तकनीक

Preeti Nahar | May 20, 2026, 18:02 IST
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भीषण गर्मी में बकरी पालकों का सहारा बनी हाइड्रोपोनिक्स तकनीक
उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में कम लागत वाली हाइड्रोपोनिक्स तकनीक के जरिए हरे चारे का उत्पादन छोटे बकरी पालकों के लिए राहत बनकर उभरा है। द गोट ट्रस्ट की पहल से 150 से अधिक पशुपालक किसानों को लाभ मिल रहा है। इस तकनीक की खासियत यह है कि बिना मिट्टी, बिना खेत और बिना बिजली के मात्र सात दिनों में पौष्टिक हरा चारा तैयार हो रहा है। महिला उद्यमी इसे लगभग ₹5 प्रति किलो की दर से बेच रही हैं, जिससे उन्हें अतिरिक्त आय का स्रोत मिला है।

भीषण गर्मी, सूखे चारे की कमी और बढ़ते पशुपालन खर्च के बीच उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के छोटे बकरी पालकों के लिए कम लागत वाली हाइड्रोपोनिक्स तकनीक उम्मीद बनकर उभरी है। बिना मिट्टी, बिना खेत और बिना बिजली के तैयार होने वाला यह हरा चारा न सिर्फ बकरियों को पोषण दे रहा है, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के लिए आय का नया जरिया भी बन रहा है। जानिए कैसे सफल हो रही है ये तकनीक।



सात दिनों में तैयार हो रहा पौष्टिक चारा

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भीषण गर्मी में बकरी पालकों का सहारा बनी हाइड्रोपोनिक्स तकनीक

हाइड्रोपोनिक्स तकनीक से 150 से अधिक छोटे पशुपालक किसानों को मात्र सात दिनों में तैयार होने वाला पौष्टिक हरा चारा मिल रहा है। खास बात यह है कि यह चारा बिना मिट्टी, बिना खेत और बिना बिजली के तैयार किया जा रहा है। महिला उद्यमी इसे करीब ₹5 प्रति किलो की दर से बेच रही हैं, जिससे उन्हें अतिरिक्त आय भी हो रही है।



कम लागत में बेहतर आमदनी

6 फीट x 4 फीट की एक मैनुअल इकाई लगाने में लगभग ₹8,000 से ₹12,000 तक का खर्च आता है। प्रत्येक इकाई से प्रतिदिन 20 से 25 किलो तक मक्का, गेहूं या जौ का हरा चारा तैयार हो रहा है। इससे महिला उद्यमियों को हर माह लगभग ₹3,000 से ₹3,500 तक का शुद्ध लाभ मिल रहा है।



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गर्मी में बकरियों के लिए फायदेमंद

बकरी पालक विशेषज्ञ संजीव कुमार (Goat Man) बताते हैंहाइड्रोपोनिक हरा चारा विटामिन, एंजाइम और खनिजों से भरपूर होता है। इसमें 80 से 85 प्रतिशत तक नमी होने के कारण गर्मी में बकरियों का तनाव कम होता है और उनका पाचन बेहतर बना रहता है। फील्ड मॉनिटरिंग में यह भी सामने आया कि इस चारे के उपयोग से गर्भधारण दर में 25 से 30 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है। साथ ही गाभिन बकरियों का स्वास्थ्य बेहतर हुआ है और गर्भपात के मामलों में कमी आई है।



महिला उद्यमियों को मिल रहा नया रोजगार

गया (बिहार) की महिला उद्यमी सुनीता देवी बताती हैं कि पहले उन्हें मई-जून की गर्मी में पत्तियां लाने के लिए कई किलोमीटर पैदल जाना पड़ता था, लेकिन अब वे घर के बरामदे में ही प्रतिदिन 25 किलो हरा चारा उगा रही हैं और आसपास के परिवारों को बेच कर आय भी अर्जित कर रही हैं।



कम पानी में तैयार हो रहा हरा चारा

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कम पानी और कम लागत में तैयार हो रहा पौष्टिक चारा

संजीव कुमार का कहना है कि अत्यधिक गर्मी में बकरियां अक्सर सूखा चारा खाना कम कर देती हैं, जबकि हाइड्रोपोनिक हरा चारा उनके रूमेन को सक्रिय बनाए रखता है और गर्भावस्था को सुरक्षित रखने में मदद करता है। इस तकनीक में केवल ट्रे, शेड नेट और पानी की जरूरत होती है। एक किलो बीज से लगभग 6 से 8 किलो तक हरा चारा तैयार हो जाता है और पारंपरिक खेती की तुलना में 90 प्रतिशत कम पानी की आवश्यकता पड़ती है।



500 नई इकाइयां लगाने की तैयारी

45 महिला उद्यमियों के साथ सफल पायलट के बाद द गोट ट्रस्ट अगले वर्ष तक तीन राज्यों में 500 नई इकाइयाँ स्थापित करने की योजना बना रहा है। द गोट ट्रस्ट की इस पहल से अब गांवों में घर के पास ही सात दिनों में पौष्टिक हरा चारा तैयार किया जा रहा है।

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