विश्व जनसंख्या दिवस 2026: बढ़ती आबादी नहीं, बदलती आबादी बनी नई चुनौती; भारत में तेज़ी से बढ़ रही बुज़ुर्गों की संख्या
आज दुनिया की आबादी 8 अरब (800 करोड़) से अधिक हो चुकी है और भारत करीब 1.46 अरब (146 करोड़) लोगों के साथ दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश बना हुआ है लेकिन इस विश्व जनसंख्या दिवस (11 जुलाई) पर चर्चा केवल बढ़ती आबादी की नहीं, बल्कि बदलती जनसंख्या संरचना की हो रही है। एक ओर कई देशों में जन्म दर लगातार घट रही है, वहीं दूसरी ओर लोगों की औसत आयु बढ़ने से बुज़ुर्ग आबादी तेज़ी से बढ़ रही है। यह बदलाव आने वाले वर्षों में स्वास्थ्य सेवाओं, रोज़गार, सामाजिक सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिए नई चुनौतियाँ खड़ी कर सकता है।
इसी बदलते परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए इस वर्ष विश्व जनसंख्या दिवस की थीम "युवाओं की उम्मीदों और आकांक्षाओं को साकार करना – आज और भविष्य के लिए" रखी गई है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफ़पीए) का कहना है कि जनसंख्या से जुड़ी बहस अब केवल लोगों की संख्या तक सीमित नहीं रह गई है। यह समझना भी ज़रूरी है कि युवा क्या चाहते हैं, परिवार शुरू करने के उनके फ़ैसलों को कौन-सी परिस्थितियाँ प्रभावित करती हैं और तेज़ी से बढ़ती बुज़ुर्ग आबादी के लिए देश कितने तैयार हैं।
2050 तक भारत में हर पाँच में एक व्यक्ति होगा वरिष्ठ नागरिक
संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफ़पीए) की ‘इंडिया एजिंग रिपोर्ट 2023’ के अनुसार, भारत में 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों की हिस्सेदारी 2022 में 10.5 प्रतिशत थी, जो 2050 तक बढ़कर 20.8 प्रतिशत होने का अनुमान है। यानी आने वाले वर्षों में हर पाँच में एक भारतीय वरिष्ठ नागरिक होगा। वहीं सदी के अंत तक देश की कुल आबादी में बुज़ुर्गों की हिस्सेदारी 36 प्रतिशत से अधिक हो सकती है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2010 के बाद से बुज़ुर्ग आबादी में तेज़ बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जबकि 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों की हिस्सेदारी लगातार घट रही है। अनुमान है कि 2050 से चार वर्ष पहले ही भारत में बुज़ुर्गों की संख्या 0 से 4 वर्ष आयु के बच्चों की संख्या से अधिक हो जाएगी।
राष्ट्रीय स्तर पर 2021 में बुज़ुर्ग आबादी की हिस्सेदारी 10.1 प्रतिशत थी, जिसके 2036 तक बढ़कर 15 प्रतिशत होने का अनुमान है। दक्षिण भारत के अधिकांश राज्यों और कुछ उत्तरी राज्यों में बुज़ुर्ग आबादी का अनुपात पहले ही राष्ट्रीय औसत से अधिक है और आने वाले वर्षों में यह अंतर और बढ़ सकता है। यूएनएफ़पीए की रिपोर्ट यह भी संकेत देती है कि बढ़ती बुज़ुर्ग आबादी के साथ स्वास्थ्य सेवाओं, पोषण, पेंशन, आवास, आय सुरक्षा और देखभाल से जुड़ी ज़रूरतें भी तेज़ी से बढ़ेंगी। ऐसे में बदलती जनसंख्या संरचना के अनुरूप नीतियों और व्यवस्थाओं को मज़बूत करना आने वाले समय की बड़ी आवश्यकता होगी।
युवा परिवार चाहते हैं, लेकिन आर्थिक चुनौतियाँ बन रही हैं सबसे बड़ी बाधा
विश्व जनसंख्या दिवस 2026 की थीम के साथ जारी यूएनएफ़पीए की रिपोर्ट ‘लाइफ़, चॉइसेज़ एंड फ़्यूचर्स: व्हाट यंग पीपल वॉन्ट एंड व्हाट शेप्स देयर डिसीज़न्स अबाउट रिलेशनशिप्स एंड पैरेंटहुड’ वर्ष 2025-26 के डेमोग्राफ़िक फ़्यूचर्स सर्वे पर आधारित है। इस सर्वेक्षण में 73 देशों के 18 से 39 वर्ष आयु वर्ग के 1.08 लाख से अधिक इंटरनेट उपयोग करने वाले युवाओं की राय शामिल की गई। रिपोर्ट के अनुसार, दो-तिहाई से अधिक युवा शादी करना या किसी साथी के साथ जीवन बिताना चाहते हैं। सात में से पाँच क्षेत्रीय समूहों में दो बच्चों वाला परिवार सबसे आदर्श परिवार का आकार माना गया।
सर्वे में सामने आया कि आर्थिक स्थिति और घर की उपलब्धता रिश्ते बनाने में सबसे बड़ी बाधा हैं। 81 प्रतिशत युवाओं ने कहा कि किसी रिश्ते की शुरुआत करने के लिए आर्थिक सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण है, जबकि 88 प्रतिशत युवाओं ने माता-पिता बनने के लिए भी आर्थिक रूप से सुरक्षित होना सबसे ज़रूरी बताया। इसके अलावा 87 प्रतिशत युवाओं ने स्थायी रोज़गार और 85 प्रतिशत ने भावनात्मक रूप से तैयार होने को माता-पिता बनने की अहम शर्त माना। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि युद्ध, आर्थिक असुरक्षा और बढ़ती असमानता जैसी चिंताओं के बावजूद लगभग दो-तिहाई युवाओं ने अपने भविष्य को लेकर सकारात्मक सोच व्यक्त की। यूएनएफ़पीए का कहना है कि यह सर्वे राष्ट्रीय स्तर के अनुमान प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि विभिन्न देशों के इंटरनेट उपयोग करने वाले युवाओं की प्राथमिकताओं, चुनौतियों और सोच की तुलनात्मक तस्वीर सामने रखता है।
विश्व जनसंख्या दिवस 2026 का संदेश भी इसी दिशा में है कि जनसंख्या से जुड़े मुद्दों को केवल जन्म दर या आबादी के आकार तक सीमित नहीं देखा जाना चाहिए। बदलती जनसंख्या संरचना, युवाओं की आकांक्षाओं और बढ़ती बुज़ुर्ग आबादी- तीनों को साथ लेकर नीतियाँ बनाना आने वाले समय की सबसे बड़ी ज़रूरत होगी।