World Sparrow Day : गाँव से शहर तक गायब होती गौरैया की चहचहाहट, क्या कहते हैं आँकड़े और क्या हैं समाधान?
किसी बढ़ती उम्र के इंसान को आज गौरैया की फोटो दिखाई जाए तो, कहेंगे "अरे ये तो दिखती ही नहीं अब" और ये सच भी है। कभी हर आँगन, छत और पेड़ों पर आसानी से दिखने वाली छोटी-सी चिड़िया गौरैया आज तेजी से गायब होती जा रही है। जिस चिड़िया की चहचहाहट सुबह की पहचान हुआ करती थी, वह अब शहरों के साथ-साथ गाँवों से भी लुप्त होने लगी है। यह सिर्फ एक पक्षी के खत्म होने की कहानी नहीं, बल्कि पर्यावरण असंतुलन का बड़ा संकेत है।
20 मार्च को हर साल मनाया जाने वाला विश्व गौरैया दिवस हमें इस छोटे से जीव के प्रति हमारी उदासीनता का आईना दिखाता है। गौरैया सिर्फ एक पक्षी नहीं है बल्कि हमारे बचपन की यादों का वो सहारा है जो बड़े-बड़े होते कहीं पीछे छूट गया है और हम कहीं दूर निकल आए हैं। आज जब हम आधुनिकता की चकाचौंध में डूबे हैं, तो गौरैया की कमी हमें भावनात्मक रूप से शून्यता का एहसास कराती है। सच रहें तो शहरों में आज गौरैया न के बराबर दिखती है। क्योंकि आँकड़े भी यही कह रहे हैं-
आँकड़े क्या कहते हैं?
बर्डलाइफ इंटरनेशनल के अनुसार, भारत में गौरैया की संख्या 1960 के दशक से 60 से 70 प्रतिशत तक घट गई है। वर्ष 2014 में जहाँ संख्या करीब 3362 दर्ज की गई थी, वहीं 2024 तक यह घटकर लगभग 1500 के आसपास पहुँच गई। कई बड़े शहरों में 60–70% तक गिरावट दर्ज की गई है। इन आंकड़ों से साफ है कि गौरैया अब संकट की ओर बढ़ रही है।
Journal of Threatened Taxa के डेटा के अनुसार बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद, कोलकाता और मुंबई जैसे छह महानगरों में किए गए सर्वे से पता चलता है कि शहरी क्षेत्रों में गौरैया की संख्या धीरे-धीरे घट रही है। भारत में गौरैया की इस गिरावट के पीछे मुख्य कारण माने जाते हैं - कीटों की संख्या में कमी, पर्यावरणीय विषैले तत्व (टॉक्सिन) और घोंसला बनाने के लिए उपयुक्त स्थानों की कमी।
“सिटीजन स्पैरो” अध्ययन के दौरान यह पाया गया कि भारत में 2005 से पहले गौरैया की आबादी अधिक थी, जबकि 2005 से 2012 के बीच इसमें गिरावट आई और यह रुझान देश के सभी क्षेत्रों में समान रूप से देखा गया।
गौरैया के खत्म होने की वजह
गौरैया के कम होने के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं। सबसे बड़ा कारण है तेजी से हो रहा शहरीकरण। पुराने कच्चे घर और छप्पर खत्म हो रहे हैं, जहां गौरैया आसानी से घोंसला बना लेती थी। अब कंक्रीट के मकानों में उनके लिए जगह नहीं बची। इसके अलावा मोबाइल टावरों से निकलने वाला रेडिएशन, कीटनाशकों का बढ़ता इस्तेमाल, और खाने के प्राकृतिक स्रोतों की कमी भी इसकी संख्या घटने का कारण बन रहे हैं। पहले घरों के आसपास अनाज के दाने, कीड़े-मकोड़े आसानी से मिल जाते थे, लेकिन अब यह सब धीरे-धीरे खत्म हो गया है
गौरैया के जीवन पर भारत के रामेश्वरम में हुआ अध्ययन
Journal of Threatened Taxa के अनुसार-भारत के रामेश्वरम द्वीप पर हाउस स्पैरो (घरेलू गौरैया) के घोंसले बनाने की जगहों का एक अध्ययन हुआ। इस अध्ययन में गौरैया के 407 सक्रिय घोंसले और 2,988 वयस्क पक्षी पाए गए। इस अध्ययन में यह बात सामने आई कि हाउस स्पैरो (घरेलू गौरैया) अपने रहने के तरीकों में बहुत लचीली होती हैं। वे इंसानों द्वारा बनाए गए घरों के डिज़ाइन के हिसाब से खुद को ढाल लेती हैं। उन्होंने कृत्रिम घोंसला बक्सों (artificial nest boxes) का भी इस्तेमाल किया। इसके अलावा, वे टूटी हुई नावों में, पूजा स्थलों (places of worships) में बनी दरारों और गुफाओं में भी घोंसले बनाती हैं। आसपास की वनस्पतियों (vegetation) में भी उन्हें रहने की जगहें मिल जाती हैं।
पर्यावरण पर असर
गौरैया सिर्फ एक चिड़िया नहीं, बल्कि पर्यावरण का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह कीड़े-मकोड़ों को खाकर फसलों को बचाने में मदद करती है और पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बनाए रखती है। इसके खत्म होने से जैव विविधता पर सीधा असर पड़ता है।
कैसे बनाती है गौरैया घोंसले?
गौरैया घोंसला बनाने के लिए अपने आसपास मिलने वाली चीज़ों का इस्तेमाल करती हैं। उन्होंने मछली पकड़ने वाली जाली के टुकड़े (pieces of fishing nets) और पूजा स्थलों के आसपास मिलने वाली मालाओं से निकले रेशों (fibers from garlands) का भी उपयोग किया। यह भी देखा गया कि ये पक्षी रेत में और पानी में नहाने (sand and water bathing) की आदत रखते हैं। इसलिए, यह ज़रूरी है कि स्थानीय लोगों को गौरैया की घटती आबादी को बचाने के महत्व के बारे में जागरूक किया जाए। साथ ही, नए बने घरों में गौरैया के लिए ज़्यादा घोंसले बनाने की जगहें (nesting sites) बनाई जानी चाहिए।
समाधान: कैसे बचाएँ गौरैया?
गौरैया को बचाने के लिए छोटे-छोटे प्रयास बहुत बड़ा बदलाव ला सकते हैं। राकेश खत्री, जिन्हें “नेस्ट मैन ऑफ इंडिया” के नाम से जाना जाता है, इस दिशा में एक बड़ा अभियान चला रहे हैं। राकेश खत्री, जो एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता थे, ने 2008 में अपनी पूरी जिंदगी को पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्पित कर दिया। राकेश खत्री इको रूट्स फाउंडेशन के संस्थापक हैं। इको रूट्स फाउंडेशन पिछले 18 वर्षों से न केवल दिल्ली में बल्कि पूरे भारत में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में काम कर रहा है। उनका विशेष ध्यान एक ऐसी समस्या पर था, जो उनके दिल के करीब थी - मानव आबादी के आसपास रहने वाली गौरैया चिड़ियों की घटती संख्या।
राकेश खत्री बताते हैं, “हमारा बचपन आँगन में चिड़ियों की चहचहाहट से भरा रहता था, लेकिन आज के समय में न तो वह आँगन रहे और न ही चिड़ियों की चहक। हम सभी ने अपने घरों को इतना संकुचित कर लिया है कि चिड़ियों के लिए भी जगह नहीं बची।”
लेकिन राकेश खत्री ने इन चिड़ियों को वापस लाने के लिए घोंसले बनाना शुरू किया। वो आगे कहते हैं, "पहला घोंसला जब मैंने लगाया, तो हर दिन बैठकर देखता था कि चिड़िया आती है या नहीं। जब चिड़िया आयी और वहाँ रहने लगी, तो मुझे बहुत अच्छा लगा कि चिड़िया को घर पसंद आ गया।" यह भावना ही थी जिसने उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी और अब वे हजारों घोंसले बना चुके हैं। इनके अनुसार गौरैया को कुछ उपाय करके बचाया जा सकता है, जैसे-
- घरों की छत या बालकनी में कृत्रिम घोंसले (nest box) लगाएं
- रोजाना पानी और दाना रखें
- कीटनाशकों का कम से कम इस्तेमाल करें
- पेड़-पौधे लगाकर प्राकृतिक आवास बनाएं
- बच्चों और समाज में जागरूकता फैलाएं
गाँव और आम लोगों की भूमिका
गाँवों में अभी भी गौरैया को बचाने की उम्मीद है, क्योंकि वहाँ प्राकृतिक वातावरण अपेक्षाकृत बेहतर है। अगर किसान कीटनाशकों का सीमित उपयोग करें और घरों के आसपास दाना-पानी रखें, तो गौरैया की संख्या बढ़ सकती है। शहरों में भी लोग अपनी बालकनी और छत को “गौरैया फ्रेंडली” बनाकर इस चिड़िया को वापस ला सकते हैं।
गौरैया का गायब होना एक चेतावनी है कि हमारा पर्यावरण तेजी से बदल रहा है। लेकिन अच्छी बात यह है कि अगर हम अभी से प्रयास करें, तो इस प्यारी चिड़िया को वापस ला सकते हैं। छोटे-छोटे कदम, जैसे एक घोंसला लगाना या पानी रखना, बड़ी पहल बन सकते हैं। अगर आज हम नहीं संभले, तो आने वाली पीढ़ियाँ गौरैया को सिर्फ किताबों में ही देख पाएंगी।