विश्व व्यापार संगठन के मत्स्य समझौते से क्या प्रभावित होंगे भारत के पारंपरिक मछुआरे? जानिए क्यों बढ़ी सरकारी सब्सिडी को लेकर चिंता
विश्व व्यापार संगठन (WTO) के मत्स्य सब्सिडी समझौते को भारत द्वारा औपचारिक रूप से स्वीकार किए जाने के बाद देश के पारंपरिक मछुआरा समुदायों के बीच चिंता बढ़ गई है। कई मछुआरा संगठनों का कहना है कि यदि इस समझौते के प्रावधानों को बिना पर्याप्त सुरक्षा उपायों के लागू किया गया, तो इसका सबसे अधिक असर उन छोटे और पारंपरिक मछुआरों पर पड़ेगा, जिनकी आजीविका सरकारी सहायता और कल्याणकारी योजनाओं पर निर्भर है। उनका मानना है कि समुद्री संसाधनों के संरक्षण के साथ-साथ मछुआरों के रोज़गार और सामाजिक सुरक्षा को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए।
भारत ने 20 जुलाई को जिनेवा स्थित WTO मुख्यालय में अपना स्वीकृति-पत्र जमा कर इस समझौते की पुष्टि की और ऐसा करने वाला 123वाँ सदस्य देश बन गया। इस समझौते का उद्देश्य अत्यधिक मछली पकड़ने और समुद्री संसाधनों के दोहन को बढ़ावा देने वाली हानिकारक सब्सिडी पर रोक लगाना है। हालाँकि, मछुआरा संगठनों का कहना है कि विकसित और विकासशील देशों की परिस्थितियाँ अलग-अलग हैं, इसलिए सभी देशों पर एक जैसे नियम लागू करना न्यायसंगत नहीं होगा।
पारंपरिक मछुआरों के हितों की सुरक्षा की उठी माँग
'बिजनेस लाइन' की रिपोर्ट के अनुसार, केरल के मछुआरा संगठनों ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि समझौते को लागू करते समय पारंपरिक मछुआरों के हितों की पूरी सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। उनका कहना है कि राज्य में बड़ी संख्या में छोटे और पारंपरिक मछुआरे सरकारी सहायता पर निर्भर हैं। ईंधन सब्सिडी, नावों के रखरखाव के लिए अनुदान, सुरक्षा उपकरण, मत्स्य बंदरगाह, कोल्ड स्टोरेज और सामाजिक सुरक्षा जैसी सुविधाएँ उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। संगठनों ने आशंका जताई है कि यदि प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना और राज्यों की अन्य वित्तीय सहायता योजनाओं को WTO के नियमों के तहत प्रतिबंधित सब्सिडी की श्रेणी में रखा गया, तो लाखों मछुआरा परिवारों की आजीविका प्रभावित हो सकती है।
विकसित और विकासशील देशों के लिए समान नियमों पर आपत्ति
मछुआरा संगठनों का कहना है कि भारत अभी गहरे समुद्र में मत्स्य पालन, ट्यूना मछली पकड़ने और ब्लू इकोनॉमी जैसे क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति मज़बूत करने की शुरुआत ही कर रहा है। दूसरी ओर, विकसित देशों ने दशकों तक भारी सरकारी सहायता के बल पर अपने मत्स्य उद्योग का विस्तार किया है। इसी कारण संगठनों ने माँग की है कि छोटे और पारंपरिक मछुआरों को दी जाने वाली सहायता को "हानिकारक सब्सिडी" नहीं माना जाना चाहिए। उनका कहना है कि समुद्री संसाधनों का संरक्षण, टिकाऊ मत्स्य पालन, सामाजिक न्याय और मछुआरों की आजीविका-इन सभी के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है।
भारत ने पहले भी रखी है अलग व्यवस्था की माँग
मछुआरा संगठनों का कहना है कि विकसित देशों में मत्स्य क्षेत्र को आज भी बड़े पैमाने पर आर्थिक सहायता मिलती है, जबकि भारत में प्रति मछुआरा परिवार मिलने वाली सहायता अपेक्षाकृत बहुत कम है। ऐसे में समान नियम लागू करने से भारतीय मछुआरे प्रतिस्पर्धा में पीछे रह सकते हैं।
भारत का मत्स्य क्षेत्र लगभग 44 लाख लोगों को रोज़गार देता है और देश में तीन लाख से अधिक मछली पकड़ने वाले पोत संचालित होते हैं। बड़ी संख्या में मछुआरा परिवार आर्थिक रूप से कमज़ोर हैं, इसलिए सरकारी सहायता उनके लिए अत्यंत आवश्यक है। भारत पहले भी WTO की विभिन्न मंत्रिस्तरीय बैठकों में यह पक्ष रख चुका है कि विकासशील देशों को कम-से-कम 25 वर्षों तक मत्स्य सब्सिडी जारी रखने की अनुमति मिलनी चाहिए, ताकि पारंपरिक मछुआरों की आजीविका सुरक्षित रह सके और मत्स्य क्षेत्र का संतुलित विकास जारी रहे।