ये गांधी के चरखे का सौंवा साल है

ये गांधी के चरखे का सौंवा साल हैसौ साल के फासले में हम कितना कुछ भूल गए कि याद ही नहीं रहा कि 1917 में ही गांधी को चरखा मिलने की उम्मीद जगी थी।

रवीश कुमार

सौ साल के फासले में हम कितना कुछ भूल गए कि याद ही नहीं रहा कि 1917 में ही गांधी को चरखा मिलने की उम्मीद जगी थी।

जब उनके गुजराती मित्र भड़ौंच शिक्षा परिषद में ले गए। सत्य के साथ प्रयोग में गांधी ने तो लिखा है कि मित्र उन्हें घसीट कर ले गए। इसी जगह पर गांधी की मुलाकात बहन गंगाबाई से होती है। गंगाबाई से दोबारा गोधरा की परिषद में मुलाकात होती है तो परिचय थोड़ा गाढ़ा होता है। उन्होंने बहन गंगाबाई को साहसी और घोड़े की सवारी के लिए भी तैयार रहने वाली महिला बताया है।

गांधी ने लिखा है कि 'अपना दुख मैंने उनके सामने रखा। दमयंती जिस प्रकार नल की खोज में भटकी थी, उसी प्रकार चरखे की खोज में भटकने की प्रतिज्ञा करके उन्होंने मेरा बोझ हल्का कर दिया। गुजरात में अच्छी तरह भटक चुकने के बाद गायकवाड़ के बीजापुर गाँव में गंगा बहन को चरखा मिला। वहां बहुत से कुटुंबों के पास चरखा था, जिसे उठाकर उन्होंने छत पर रख दिया। गंगा बहन ने मुझे ख़बर भेजी। मेरी खुशी का पार न रहा।'

1908 तक गांधी चरखा के बारे में नहीं जानते थे। 1915 में दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद तक चरखे के दर्शन नहीं किए थे। 1917 का वो साल है जब गांधी को चरखा मिला और अब उस साल के सौ साल हो रहे हैं। चरखे की यह कहानी भाई उमर सोबानी और मगनलाल गांधी के बिना पूरी नहीं होती है। भाई उमर सोबानी ने ही चरखे पर कातने के लिए रूई की गुच्छी यानी पूनी दी। कुछ समय बाद गांधी को लगा कि उमर भाई के मिल से पूनी लेना ठीक नहीं क्योंकि चरखे की सोच तो मिल के ख़िलाफ़ है। इसके बाद पूनी बनाने वाले की खोज हुई। गंगा बहन ने काम एकदम बढ़ा दिया। बुनकरों को लाकर बसाया और कता हुआ सूत बुनवाना शुरू किया। बीजापुर की खादी मशहूर हो गई।

बहन गंगाबाई की मदद से न सिर्फ गांधी ने चरखा खोज लिया जिसे भारत ने भुला दिया था बल्कि उनके कारण खादी बनने भी लगी। इस चरखे में साबरमती आश्रम के मगनलाल गांधी ने कुछ सुधार किए। गांधी ने लिखा है कि गंगाबाई ने अवंतिकाबाई, रमीबाई, शंकरलाल बैंकर की माताजी और वसुमती बहन को कातना सिखा दिया। मेरे कमरे में चरखा गूंजने लगा। सत्य के प्रयोग में गांधी एक जगह लिखते हैं कि लक्ष्मीदास लाठी गाँव से एक अंत्यज भाई रामजी और उनकी पत्नी गंगा बहन को आश्रम ले आए। कायदे से चरखा के सौ साल पूरे होने पर इन महिलाओं की तस्वीर चारों तरफ होनी चाहिए। बहन गंगाबाई और भाई उमर सोबानी इसके असली नायक हैं।

इस बात के लिए प्रधानमंत्री की आलोचना करने वाले कांग्रेसी भी भूल गए कि ये गांधी के चरखे का सौंवा साल है। 2017 में चंपारण सत्याग्रह के भी सौ साल पूरे हो रहे हैं। चंपारण सत्याग्रह के दौरान ही गांधी को एक महिला ने कहा था कि वो कपड़े नहीं बदल सकती है क्योंकि उसके पास दूसरी साड़ी नहीं है। उसके बाद गांधी भारत के कपास की यात्रा और किसानों की ग़रीबी के बारे में सोचने लगे। गांधी भारत की ग़रीबी का हल खोज रहे थे। उन्हें जवाब चरखे से मिला। आज के नेता वोट खोज रहे हैं, उन्हें जवाब गांधी के चरखे में मिला।

सबने न सिर्फ चरखे के सौंवे साल को भुला दिया बल्कि बहन गंगाबाई और तमाम महिलाओं को भुला दिया जिनके कारण चरखे का पुनर्जन्म हुआ। खादी घर-घर पहुंचा। गांधी ने चरखा संघ बनाया जो कांग्रेस से अलग संगठन था। तिलक फंड के तहत जमा पैसे को चरखे के वितरण और प्रसार में लगा दिया। ब्रिटिश हुकूमत ने कई बार चरखों को ज़ब्त भी किया और तोड़ा भी। गांधी ने यरवदा जेल में रहते हुए चरखे का स्वरूप भी बदला ताकि ज़्यादा बारीक सूत की कताई हो और उसे लेकर कहीं आने-जाने में असुविधा न हो। अभी जिस खादी की बिक्री के आंकड़े दिए जा रहे हैं वो गांधी के चरखे से काते हुए सूत के नहीं है। बिजली से चलने वाले मशीनी चरखों और करघों से बनी खादी है। गांधी इसे कभी स्वीकार नहीं करते।

अंत में चलते-चलते, सरकार को बिन मांगे एक सलाह। कैशलेस लेन-देन की बात करने वाली सरकार के विभिन्न विभाग किस सोच के तहत डायरी और कैलेंडर छपवा रहे हैं। जिस स्मार्टफोन से आम जनता को बैंकिंग करने के लिए कहा जा रहा है, उसी स्मार्टफोन में घड़ी और कैलेंडर भी मिल जाता है। सरकार को यह प्रथा बिना किसी आठ तारीख के इंतज़ार किए बंद कर देनी चाहिए। सरकार का काम कैलेंडर छापना नहीं है। इस एक आदेश से केंद्र से लेकर राज्य सरकारें छपाई को लेकर होने वाली कमीशनबाज़ी से मुक्ति पा जाएंगी।

स्मार्टफोन में नोट पैड होते हैं इसलिए डायरी की कोई ज़रूरत नहीं। न जाने इनकी छपाई पर कितना पैसा बेकार पानी में जाता होगा। केंद्रीय खादी ग्रामोद्योग को कैलेंडर और डायरी में पैसा नहीं फूंकना चाहिए। छपवाना ही है तो उसे तो री-साइकिल किए गए क़ाग़ज़ पर कैलेंडर छापना चाहिए। बेहतर तो यही है कि कैलेंडर और डायरी पर बेकार होने वाले पैसे को कताई के काम में लगे मज़दूरों को बोनस के तौर पर बांट दिया जाता।

(लेखक एनडीटीवी में सीनियर एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं। ये उनके निज़ी विचार हैं।)

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