देश के लिए वरदान हैं देसी नस्ल की गायें

देश के लिए वरदान हैं देसी नस्ल की गायेंदेवेंद्र शर्मा का लेख “ज़मीनी हक़ीकत”।

नोटबंदी पर छिड़ी बहस के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के दीसा में 10 दिसंबर को ए2 दूध के ‘अमूल देशी ब्रांड’ की शुरुआत की है। देश में स्वास्थ्य का जो पहलू बीते कुछ वर्षों से भुलाया जा चुका था, उस दिशा में यह एक महत्वपूर्ण खबर है लेकिन वह नोटबंदी की यातनाओं के बीच दब गई।

मेरी ख्वाहिश है कि प्रधानमंत्री को इस मौके का इस्तेमाल ए2 दूध के गुणों और क्यों यह राष्ट्रीय पोषण सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है, की ओर खींचना चाहिए। यह निश्चित तौर पर ग्राहकों को बड़ी संख्या में आकर्षित करता। उन्होंने नोटबंदी से लोगों को हो रही परेशानी पर ज्यादा त्वज्जो देने की बजाय कैसे यह लड़ाई कालेधन और भ्रष्टाचार के खिलाफ है, इस ओर लोगों का ध्यान खींचा। इसका मतलब कि सुनहरे अवसर का लाभ नहीं मिल पाया।

मुझे उम्मीद है कि प्रधानमंत्री ए2 दूध पर बात करने के लिए कोई न कोई मौका जरूर तलाश लेंगे। ए2 दूध पर उनका बोलना इसकी खपत के स्वरूप में बदलाव लाएगा। इससे देश में स्वास्थ्यपरक पेय की जरूरत की राष्ट्रीय बहस तेज होगी। आबादी का बड़ा तबका इसके सेवन की मात्रा को बढ़ाएगा। मैं यह पक्के तौर पर कह सकता हूं कि बच्चे अपने अभिभावकों से यह सवाल करने लगेंगे कि वह उन्हें ए2 दूध क्यों नहीं पीने को देते हैं।

ए2 दूध मवेशियों की देसी नस्ल से मिलता है और यह विदेशी पशुओं के दूध में मिलने वाले पौष्टिक तत्वों से ज्यादा गुणकारी है। यह दरअसल बीटा-कैसिन प्रोटीन-ए2 एलील जीन- से युक्त होता है, जो दूध को स्वास्थ्यपरक और पौष्टिक बनाता है। यह बात इसलिए भी दीगर है क्योंकि हमारी सभी गायों और भैसों में-चाहे उन्हें देसी ही क्यों न कहा जाए-ए2 एलील जीन होता है। भैंस के मुकाबले गाय के दूध में कम वसा होती है और इसीलिए ज्यादातर लोग उसका दूध खरीदते हैं।

करनाल के नेशनल ब्यूरो ऑफ एनिमल जेनेटिक रिर्सोसेज (एनबीएजीआर) के अध्ययन के मुताबिक भारतीय प्रजातियों में ए2 दूध सबसे गुणकारी है। हाल में 22 देशी नस्लों पर हुए अध्ययन में ए2 एलील रेड सिंधी, गिर, राठी, सहिवाल और थरपरकर में 100 फीसदी पाया गया। अन्य प्रजातियों में ए2 एलील जीन 94 फीसदी पाया जाता है। वहीं जर्सी और होल्स्टीन फ्रीसियन में यह 60 फीसदी होता है।

इसलिए जो लोग नियमित तौर पर ए2 दूध का सेवन करते हैं तो उनमें एलर्जी, डायबिटीज, मोटापे और हृदय रोग होने की आशंका कम पाई जाती है। मैं यह नहीं कह रहा कि ए2 दूध रोग से लड़ने की 100 फीसदी प्रतिरोधक क्षमता देता है। हां, देसी प्रजातियों के दुधारू मवेशियों का दूध हमारे लिए बेहतर विकल्प है। इससे इन रोगों के होने का जोखिम घटेगा। यह सही है कि विदेशी नस्ल के पशु ज्यादा दूध देते हैं लेकिन उनमें मौजूद ए1 एलील जीन के कारण उसकी गुणवत्ता घट जाती है।

लंदन के ‘द टेलीग्राफ’ में छपी खबर के मुताबिक आम तौर पर ए1 एलील जीन वाले दूध का इस्तेमाल ज्यादा होता है। इससे एलर्जी, शरीर का फूलना, पेट दर्द, मिचली आना, डायरिया और कब्ज की शिकायत हो जाती है। अमूल ने एक ऐसी विचारधारा को जन्म दिया है जो पूरी दुनिया में फैल रही है। हरियाणा ने विटा ब्रांड के हिस्से के रूप में ए2 दूध को शुरू किया है। वैश्विक स्तर पर मैं पाता हूं कि ब्रिटेन में ए2 दूध की बिक्री जोरों पर है, वहीं आयरलैंड में इसकी बिक्री सिर्फ एक साल में 10 लाख पाउंड तक पहुंच गई। ए2 दूध ब्रिटेन और आयरलैंड के एक हजार स्टोरों पर बिक रहा है। इसे बेचने वालों में बड़े दुकानदारों मसलन टेस्को, मोरिसन और को-ऑप शामिल हैं। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में ए2 दूध की दुग्ध बाजार में हिस्सेदारी सर्वाधिक तेजी से बढ़कर आठ फीसदी पर पहुंच गई है। इसकी बिक्री एक साल में 57 फीसदी तक बढ़ी है।

साइंटिफिक जरनल ‘इंफेंट’ में बीते माह छपी रिपोर्ट के मुताबिक ए1 दूध के सेवन से बच्चों में टाइप 1 डायबिटीज का खतरा बढ़ गया है। उनकी प्रतिरोधक क्षमता घट रही है, उनकी पाचन प्रणाली बिगड़ गई है, साथ ही श्वसन प्रणाली में संक्रमण हो रहा है। गायक डेनी मिनोग ए2 दूध के स्वास्थ्यपरक गुणों के कारण ही उसका प्रमोशन कर रही हैं जिनकी पाचन प्रणाली में शिकायत पैदा हो गई थी। वह इस दूध की ब्रांड अंबेसडर बन गई हैं। मुझे उम्मीद है कि एक दिन कोई भारतीय सेलिब्रिटी भी ए2 दूध का प्रमोशन शुरू कर देगा।

ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में ए2 दूध की बिक्री उम्मीद से कहीं बेहतर रही। इससे स्वतंत्र खाद्य बाजार में हिस्सेदारी बढ़ी है जो दुनिया की सर्वश्रेष्ठ डेयरी कंपनियों में से एक है। पेप्सी फूड्स भी सबसे आगे है, और उसकी योजना ए2 दूध को ब्रिटेन के बाहर यूरोपीय बाजार में लांच करने की है। इस बीच, कुछ साल पहले हुए नकली बेबी मिल्क पाउडर घोटाले से घिरा रहा चीन भी ए2 दूध के लिए बड़े बाजार के रूप में उभरा है। उम्मीद है कि चीन में इस दूध की शुरुआत से 2020 तक इसका बाजार दोगुना हो जाएगा।

देसी नस्लों के प्रोत्साहन से आर्थिक लाभ यह होगा कि चाहे वे विदेशी प्रजातियों के मुकाबले कम दूध भी दें, उनके दूध के सेवन से स्वास्थ्य लाभ में बढ़ोतरी होगी, खासकर तब जब आबादी के बड़े हिस्से में डायबिटीज, हृदय रोग, अलर्जी, कमजोर पाचन क्रिया की शिकायतें लगातार बढ़ रही हैं।ए2 दूध के लोकप्रिय होने से देसी पशुओं की नस्लों की ओर लोगों का झुकाव बढ़ेगा। मैं खुद आग्रह करूंगा कि लोग इसे ही अपनाएं। पशुपालन कार्यक्रमों में कुछ वर्षों से देसी नस्लों को नजरअंदाज किया जा रहा है। अपने आसपास हम जिन प्रजातियों को देख रहे हैं वे गुणकारी नहीं हैं। इसका मतलब यह है कि उनकी जेनेटिक बनावट दूषित है।

हरियाणा सरकार, कृषि मंत्रालय के साथ-साथ राष्ट्रीय डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (एनडीडीबी) की पहल के बारे में जानकर मुझे खुशी हुई कि वे स्वदेशी नस्लों की दशा में सुधार लाने का प्रयास कर रहे हैं। राजस्थान पहला ऐसा राज्य है जिसने गाय के मामलों के लिए एक मंत्री नियुक्त किया है और हरियाणा ने गुजरात के साथ एक समझौता किया है जिसमें गिर गायों के शुक्र को एक लाख गायों की देसी नस्ल तैयार करने के लिए उपलब्ध कराया जाएगा। सामाजिक उद्यमशीलता के भागीदारों ने देश में जहां-तहां छोटी डेयरी स्थापित की हैं और वे ए2 दूध की सफल मार्केटिंग कर रहे हैं। उन्हें अच्छी कीमतों में बेच रहे हैं। मुझे पक्का भरोसा है कि आने वाले दिनों में इसमें बढ़ोत्तरी होगी।

अगर आप किसान हैं और एक या दो देसी गायें हैं जो आपके लिए किसी काम की नहीं हैं तो मेरी राय में आपको उन्हें बेचना नहीं चाहिए। वे भले ही दूध कम देती हों लेकिन वह दूध आपके परिवार के स्वास्थ्य के लिए अमृत से कम नहीं। अगर आप एक देसी नस्ल की गाय रख सकते हों तो रख लीजिए। इसको खरीदते वक्त सिर्फ यही सावधानी बरतनी होगी कि उसकी नस्ल असली हो।

(लेखक प्रख्यात खाद्य एवं निवेश नीति विश्लेषक हैं, ये उनके अपने विचार हैं)

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