Climate Crisis: प्राकृतिक विपदाओं पर नियंत्रण संभव नहीं लेकिन उनसे बचाव सीखना होगा
प्राकृतिक विपदाओं पर नियंत्रण संभव नहीं, लेकिन उनसे बचाव सीखना होगा। हमें जीवन में अनेक विपदाओं का सामना करना पड़ता है। इनमें से कुछ प्राकृतिक और कुछ मानव-जनित होती हैं। प्राकृतिक विपदाओं में भूकंप, ज्वालामुखी, सुनामी, भूस्खलन आदि सम्मिलित हैं; जबकि रोगों का फैलना, विश्वयुद्ध जैसी विपदाएँ, अकाल और भुखमरी जैसी अनेक समस्याएँ मानव-जनित होती हैं। समय-समय पर अनेक स्थानों पर भूकंप आते रहते हैं। अभी कुछ वर्ष पहले वेनेज़ुएला में और अब कोलंबिया में विनाशकारी भूकंप आया था। ये दोनों देश दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर एंडीज़ पर्वत श्रृंखला के निकट होने के कारण अस्थिर क्षेत्र में आते हैं।
इसी प्रकार हिमालयी क्षेत्र में अफ़गानिस्तान से लेकर म्यांमार तक अनेक बार भूकंप के झटके महसूस होते रहते हैं और उनका प्रभाव भारत के मैदानी इलाकों में भी महसूस किया जाता है। कुछ साल पहले नेपाल और उत्तरी बिहार के इलाकों को भूकंप ने झकझोर दिया था, त्राहि-त्राहि मची थी। मन में आना स्वाभाविक है कि क्या हमारा समाज, देश या दुनिया कुछ नहीं कर सकती? कड़वी सच्चाई यह है कि विज्ञान की मदद से भूकंप की संभावना वाले क्षेत्रों की जानकारी रखते हैं और हम कुछ हद तक अपना बचाव कर सकते हैं और नुकसान कम कर सकते हैं। पुराने समय में यह भी संभव नहीं था।
भूकंपीय क्षेत्रों की पहचान और सतर्कता
विज्ञान ने जानकारी उपलब्ध कराई है कि किन स्थानों पर भूकंप और ज्वालामुखी आने की अधिक संभावना है; उसी प्रकार जैसे हमें पता हो कि शेर की मांद कहाँ है। इस जानकारी के आधार पर हम शेर की मांद से दूर रहेंगे और यदि पास जाना बेहद ज़रूरी होगा तो पूरी सावधानी और तैयारी के साथ जाएँगे। जिन देशों को भूकंप और ज्वालामुखी का प्रायः सामना करना पड़ता है, उन्होंने यह सावधानी बरतना सीख लिया है।
हमारा विज्ञान यह तो बता पाता है कि भूकंप की संभावना कहाँ अधिक है और कहाँ कम, लेकिन यह नहीं बता पाता कि भूचाल कब आएगा। गाँव की भाषा में कहें तो यदि एक मैदान में जलते चूल्हों पर सैकड़ों पतीलियाँ चढ़ी हों जिनमें पानी हो और जिन पर ढक्कन रखा हो; यह बताना तो संभव हो सकता है कि किस पतीली के ढक्कन को भाप अस्थिर कर रही है, परंतु यह नहीं कि कौन-सा ढक्कन कब भाप द्वारा उठा दिया जाएगा।
विश्व के प्रमुख भूकंपीय और अस्थिर क्षेत्र
दुनिया के जिन भागों में प्रायः भूकंप और ज्वालामुखी की घटनाएँ होती रहती हैं, उनमें प्रशांत महासागर के तटीय भागों में बसे देश प्रमुख हैं—जापान, चीन, इंडोनेशिया हमारे पूर्व में और अमेरिका, मेक्सिको, ब्राज़ील, चिली आदि हमारे पश्चिम में। इसके अलावा भारतीय भूभाग के उत्तर में म्यांमार से चलकर हिमालय श्रृंखला यूरोप के आल्प्स पर्वत में मिलती है और एक अस्थिर बेल्ट बनाती है।
भारत को स्थिरता के हिसाब से तीन भागों में बाँट सकते हैं। पहला तो दक्षिण का पठारी भाग जो मजबूत और स्थिर माना जाता रहा है, और दूसरा उत्तर में हिमालय जो निरंतर अस्थिर है और जिस भाग में ही अधिक भूकंप आते हैं। इन दोनों के बीच में गंगा-यमुना का मैदान है जिसके नीचे ज़रूर हज़ारों फीट गहरी बालू है। अब यदि बड़े बाँध बनाने हों या नए शहर बसाने हों, तो स्थिर भागों को वरीयता देनी होगी।
कभी-कभी स्थिर भागों में भी परियोजनाएँ भूगर्भीय कारणों से प्रभावित हो जाती हैं, जैसे महाराष्ट्र के कोयना बाँध के साथ 1968 में हुआ था। कुछ लोगों का मानना है कि कोयना नगर भूकंप आया ही कोयना बाँध के कारण, परंतु यह प्रमाणित नहीं है। फिर भी यदि छोटे बाँधों और जलाशयों से काम चल सके तो बड़े बाँध न बनाए जाएँ, और अस्थिर पर्वतीय क्षेत्रों में तो कतई नहीं।
भवन निर्माण तकनीक और पारंपरिक ज्ञान
यदि अस्थिर भागों में बड़ी इमारतें बनानी ही हों, तो हल्की भवन-सामग्री का प्रयोग करना होगा। जापान में लकड़ी के मकान बनाते हैं, परंतु हमारे यहाँ तो जंगल कटने से लकड़ी की भी कमी है। भूकंप से निपटने के लिए अलग डिज़ाइन के मकान बनाने होते हैं, हमारे पूर्वजों को ज्ञान था। वे ऐसी तकनीक का प्रयोग करते थे जिससे बनी बिल्डिंग में जोड़ होते थे जो शॉक एब्जॉर्बर का काम करते थे।
मानव जाति का नुकसान भूकंप से नहीं बल्कि उसके परिणामों से होता है। विकासशील और निर्धन देशों के भवन उतने मजबूत नहीं होते, बचाव के उतने साधन नहीं हैं जितने विकसित देशों में हैं, इसलिए निर्धन देशों में जन-धन की अधिक हानि होती है। भूकंप के कारणों की सतत जानकारी वैज्ञानिक हासिल कर रहे हैं, शायद भविष्य में विकासशील देशों में भी पूर्वानुमान संभव हो सके।
दुनिया के विकसित देशों ने भूगर्भ की विशद जानकारी हासिल की है और भूकंप से निपटने के उपाय खोजे हैं। बिल्डिंग सामग्री, कमजोर इलाकों के लिए भवन डिज़ाइन, और कभी-कभी भूकंप का पूर्वानुमान—यह सब मानव जाति के हित में उन्हें विकासशील देशों के साथ बाँटना चाहिए। यदि पेटेंट कानून बनाकर ज्ञान छिपाते रहेंगे, तो अमेरिका, चीन, यूरोप और रूस के भी पर्यटक नेपाल में मरते रहेंगे।
जल संकट: एक प्राकृतिक और मानव-जनित विपदा
भूकंप की ही भांति जल संकट भी एक प्राकृतिक आपदा है, लेकिन इस आपदा को बढ़ाने में स्वयं मनुष्य का भी योगदान रहता है। कभी जलभराव तो कभी जलाभाव मनुष्य को संकट में डालता है। जलवायु परिवर्तन के कारण पानी के विविध रूपों का परस्पर संतुलन बदल रहा है। यह सतत चिंतन की बात है।
पृथ्वी पर जल बजट ठोस, द्रव तथा भाप के रूप में लगभग निश्चित रहता है। पहाड़ों पर ठोस अवस्था में मौजूद बर्फ़ जब पिघलती है, तो द्रव रूप में जल नदियों के माध्यम से समुद्र तक पहुँचता है। समुद्र की सतह से भाप बनकर पानी आसमान में जाता है जहाँ पर ठंडा होकर द्रव बनकर धरती पर गिरता है। इस वर्षाजल का कुछ भाग पहाड़ों पर रह जाता है, कुछ धरती के अंदर भूजल के रूप में चला जाता है और बाकी सब वापस समुद्र में जाता है। इसे जलचक्र कहते हैं जो हमेशा चलता रहता है। किसी एक समय में जल के ठोस, द्रव और वाष्प तीनों रूपों में मौजूद पानी की मात्रा का योग स्थिर रहता है जिसे जल बजट कहते हैं।
धरती पर बरसने वाले पानी का एक अंश जमीन के अंदर उसी प्रकार जमा होता है जैसे किसान अपने लिए बखारी में फ़सल कटने के बाद अनाज बचाकर रखता है। यह शुद्ध पानी होता है क्योंकि जमीन के अंदर जाते हुए छन-छन कर जाता है। इस प्रकार मनुष्य के पीने के लिए पानी का यह एकमात्र स्रोत है, क्योंकि समुद्र का पानी खारा है और सतह पर पानी प्रदूषित हो रहा है। लेकिन जमीन के अंदर पानी जाए, इसके लिए ज़रूरी है कि धरती पर इतनी वनस्पति हो कि रुकता हुआ आगे बढ़े। यदि पेड़-पौधों के कटान के कारण वनस्पति नहीं होगी, तो बरसाती पानी मिट्टी को साथ लेकर तेज़ी से नदियों में बह जाएगा और वापस समुद्र में चला जाएगा।
भूजल का अत्यधिक दोहन और संरक्षण
धरती के अंदर का पानी भूजल या भूमिगत पानी कहलाता है और धरती पर भूतलीय जल के रूप में है। यदि समझदारी से इसका उपयोग किया जाए तो मानव जाति के लिए हमेशा ही यह पानी उपलब्ध रहेगा, लेकिन दुरुपयोग करने से बूंद-बूंद पानी के लिए मनुष्य तरस जाएगा; जैसे वर्तमान में दक्षिण अफ़्रीका के शहर जोहान्सबर्ग में पानी समाप्तप्राय हो रहा है और टैंकरों से लाया जा रहा है। हमारे पूर्वजों ने एक मोटा नियम बनाया था कि भूजल पीने के लिए और सतह का पानी सिंचाई और पशुओं के प्रयोग के लिए होता था। अब उद्योगों और सिंचाई में अधिकाधिक भूजल के प्रयोग के कारण भूजल का स्तर नीचे जा रहा है, फिर भी भूजल के संचय और प्रदूषण-रहित बनाए रखने का सतत प्रयास होना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात है भूजल को प्रदूषण से बचाना, क्योंकि एक बार प्रदूषित हो जाने के बाद इसे शुद्ध करना संभव नहीं। यह मानव जाति के अस्तित्व का सवाल है।
जल संरचनाओं का जीर्णोद्धार और पंचायत स्तरीय योजना
देश के जलवैज्ञानिक बता सकते हैं कि हमें प्रतिवर्ष कितना पानी चाहिए, लेकिन उन्होंने शायद इस बात का आकलन नहीं किया होगा कि भारत भूमि पर जो तालाब, झीलें, जलाशय, बावड़ी और कुएँ हैं उनमें कितना पानी भरने की क्षमता है। यह आँकड़ा पंचायतवार प्रधान उपलब्ध करा सकते हैं, बिना ख़र्चे के। यह जानकारी क्षेत्रवार इंटरनेट पर उपलब्ध करा सकते हैं वर्षा के पहले। अधिकांश तालाब अब सूखे पड़े हैं, उनकी खुदाई करके उनकी जलधारण क्षमता जितनी बढ़ाई जा सकती हो बढ़ाई जाए। अब समय है कि हम आपदा प्रबंधन के साथ-साथ आपदा नियंत्रण और निवारण पर काम करें।
शहरों में जल संचय के लिए वॉटर हार्वेस्टिंग की योजना चलाई जा रही है। लेकिन शहरों में संचित किया गया जल अनेक बार प्रदूषित रहता है। जमीन के अंदर का पानी बराबर ख़र्च कर रहे हैं, उसकी पूर्ति के लिए विचार करने की ज़रूरत है। इसके लिए आवश्यक है कि धरती के अंदर का जलभंडार बढ़े। यह तभी संभव है जब हमारी जमीन पर वर्षाजल कुछ देर रुके, जिसके लिए हमारी धरती पर वनों और वनस्पतियों की जड़ें पानी को धरती के अंदर जाने के लिए पारगम्यता प्रदान करती हैं। अच्छी बात है कि हमारी सरकार जापान और इजराइल जैसे देशों की सिंचाई तकनीक जैसे ड्रिप इरिगेशन और स्प्रिंकलर द्वारा सिंचाई आदि अपनाने की कोशिश कर रही है।
वायु-जनित आपदाएँ और जलवायु परिवर्तन
भूकंप और जल के कारण पैदा होने वाली समस्याएँ तो होती ही हैं, लेकिन वायु-जनित समस्याएँ भी मनुष्य के सामने आती हैं। आंधी, तूफान, चक्रवात और उससे जनित सुनामी वर्तमान समय में तथा ग्रामीण क्षेत्रों में घरों का जलना, जंगलों में आग लगना, पुराने समय में वायु का योगदान रहा करता था। पहले काफी हद तक मौसम में निश्चितता रहा करती थी; गर्मी, बरसात और जाड़े का समय निर्धारित होता था। अब तो जलवायु परिवर्तन के कारण सब कुछ अनिश्चित जैसा हो गया है, और अनिश्चित ही नहीं, उनकी तीव्रता में भी गड़बड़ होती रहती है। पहले मौसम के विषय में कहा जाता था दिनमपि रजनी सायं प्रातः, शिशिर बसंतौ पुनरायात लेकिन अब दिन, रात और मौसम अपने समय का पालन नहीं करते। मनुष्य को बदली परिस्थितियों में स्वयं ही अपनी जीवनशैली में परिवर्तन लाना पड़ेगा।
आज़ादी के पहले और आज़ाद भारत के प्रारंभिक दिनों में अनेक प्रकार के रोग भी जन-स्वास्थ्य को प्रभावित करते रहते थे। इनमें प्रमुख थे चेचक, हैज़ा, प्लेग, मलेरिया, और टीबी को तो राजरोग की संज्ञा दी जाती थी। अब विज्ञान की प्रगति के साथ इन सबको आपदा तो नहीं माना जा सकता, लेकिन समय-समय पर कोरोना जैसी समस्याएँ पैदा होती रहती हैं। विज्ञान की प्रगति के कारण रोगों पर एक सीमा तक विजय पाई गई है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में भी बदलती जीवनशैली ने नई-नई समस्याएँ पैदा की हैं। अब गाँव में भी रक्तचाप, मधुमेह, कैंसर, हृदय रोग और अनेक मानसिक बीमारियाँ फैल रही हैं, जिन पर शहरों में भी विजय नहीं पाई गई है, तो गाँव की क्या कहें। इस तरह की जन-स्वास्थ्य और जीवनशैली से जुड़ी हुई समस्याएँ मानव-जनित हैं और इनका निदान भी स्वयं मनुष्य को ही ढूँढना होगा।
मानव-जनित वैश्विक संघर्ष और उनका प्रभाव
जब पृथ्वी पर प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध हुए तो उनके लिए जिम्मेदार कुछ गिने-चुने लोग थे, लेकिन उसके परिणाम और कष्ट संपूर्ण मानव जाति को भोगने पड़े। वर्तमान में अमेरिका और ईरान के युद्ध के कारण समुद्री मार्गों से आयात-निर्यात तथा सामान्य आवागमन बहुत बाधित हुआ है, जिससे वे तमाम लोग जिनका युद्ध से कोई मतलब नहीं, कष्ट झेलने को मजबूर हैं। भारत के सुदूर गाँवों तक में अब दोपहिया, तिपहिया और चारपहिया गाड़ियाँ बड़ी संख्या में चलने लगी हैं और दूर-दूर के गाँवों में गैस चूल्हे जलते हैं; लेकिन जिसे गैस न मिले तो भोजन बनाना मुश्किल हो जाए। इस तरह डीज़ल, पेट्रोल और ईंधन गैस की आपूर्ति में कमी आने के कारण भारतीय लोगों का कोई अपराध न होते हुए भी उन्हें संकट झेलना पड़ रहा है। इसी तरह रूस और यूक्रेन के युद्ध के कारण और अन्य क्षेत्रों में तनाव के कारण आबादी प्रभावित हो रही है, जिसका निदान केवल मनुष्य के पास है और इसमें भगवान या प्रकृति का प्रकोप जिम्मेदार नहीं है।
आज़ाद भारत में 60 के दशक में जब गंभीर खाद्यान्न संकट पैदा हुआ तो विदेशों से अनाज मंगाना पड़ा; इनमें से मेक्सिकन वैरायटी का गेहूं प्रमुख था। इन आयातित अनाजों के साथ आ गए कीट, जीवाणु और कीटाणु जो हमारे देश के लिए नए थे और जिनके कारण हमारे यहाँ पैदा होने वाला अनाज भी विकृत हो गया। इनको नष्ट करने के लिए भारत में पेस्टिसाइड और इंसेक्टिसाइड प्रयोग में लाए गए जिससे जन-स्वास्थ्य दुष्प्रभावित हुआ। मेक्सिकन गेहूं को पानी की बहुत आवश्यकता पड़ती है, जिसकी पूर्ति के लिए भूमिगत जल का अधिकाधिक उपयोग किया गया और भूजल का स्तर नीचे गिरता गया और गिर रहा है। विविध खादों के अत्यधिक प्रयोग के कारण मिट्टी भी प्रदूषित होती रही है और ऊसरीकरण बढ़ा है। ये सारी समस्याएँ मानव-जनित हैं और इनका निदान ऑर्गेनिक खेती जैसी विधियों का उपयोग करना हो सकता है। इस प्रकार प्राकृतिक आपदाओं से मनुष्य को बचाने के उपाय और मानव-जनित विपदाओं से उनकी रोकथाम स्वयं मनुष्य द्वारा ही आवश्यक होगी।