कॉकरोच जनता पार्टी: छात्र संगठन या राजनीतिक दल?

Dr SB Misra | Jul 25, 2026, 13:38 IST
कॉकरोच जनता पार्टी ने पेपर लीक मामले में मंत्री के इस्तीफे की मांग करते हुए एक जोरदार आंदोलन शुरू किया है। इस आंदोलन की विशिष्टता संसद का घेराव करना और जोखिम से भरे तरीके अपनाना है। इसमें हिंसा और विदेशी हस्तक्षेप जैसी चिंताओं को भी उजागर किया गया है। जयप्रकाश नारायण की क्रांति से इसकी तुलना निराधार मानी जा रही है, क्योंकि नेतृत्व और कार्यशैली में स्पष्ट भिन्नताएं हैं।

यदि कॉकरोच जनता पार्टी एक छात्र संगठन होती- जैसा कि बार-बार छात्रों के नाम से उसे आम सभा में संबोधित किया जा रहा है तो उसका कोई सिद्धांत, उद्देश्य या विचारधारा होती, जिसकी जानकारी देश में शायद ही किसी को होगी। पुराने छात्र संगठनों में एस.एफ.आई. (स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया) की विचारधारा साम्यवाद की तरफ झुकी हुई है और इसी तरह एनएसयूआई की विचारधारा कांग्रेस से प्रेरित है। एक और साम्यवादी रुझान का छात्र संगठन आइसा (AISA) है, और इसी तरह समाजवादी तथा अन्य राजनीतिक दलों से प्रेरित छात्र संगठन बड़ी संख्या में देश में मौजूद हैं। राष्ट्रवाद से संबंध रखने वाला छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) है। इन सभी के अपने-अपने सिद्धांत, छात्र नेता और कार्यकारिणी हैं, लेकिन ऐसा कुछ कॉकरोच पार्टी के बारे में सुनने में नहीं आया।



छात्र संगठनों की चिंता का विषय अध्ययन-अध्यापन तथा शैक्षिक व्यवस्था रहती है। यदि मान भी लिया जाए कि शिक्षा समाप्त करके प्रतियोगी परीक्षाओं का पेपर लीक होने से कॉकरोच पार्टी के कार्यकर्ताओं की बहुत हानि हुई है, तो ऐसे लीक होने से देश के दर्जनों छात्र संगठनों के मेधावी छात्रों पर भी प्रभाव पड़ा है। लेकिन इस संगठन के नाम, उसके पदाधिकारियों अथवा उद्देश्यों के बारे में कुछ नहीं सुना गया। अब कॉकरोच पार्टी ने पेपर लीक के समाधान के रूप में धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र को एकमात्र उपाय समझा है; लेकिन उनके त्यागपत्र से पेपर लीक की समस्या कैसे हल हो जाएगी? कोई दूसरा व्यक्ति आएगा, फिर तीसरा आएगा, और यदि वे भी ऐसा ही व्यवहार करेंगे तो इसका अंत कहाँ होगा? आवश्यकता सिस्टम को बदलने की है, न कि व्यक्ति को।



आंदोलन की पद्धति और सुरक्षा का जोखिम

कॉकरोच जनता पार्टी के छात्र संसद का घेराव करके समाधान निकालना चाहते हैं। पहली बात तो यह कि घेराव करने से समाधान संभव नहीं है; और दूसरी बात यह कि यह कितना जोखिम भरा कदम है, क्योंकि भीड़ में अराजक तत्वों के शामिल हो जाने का डर रहता है। इसी तरह पाकिस्तानी आतंकवादियों ने संसद भवन के परिसर में घुसकर बमबारी की थी और कुछ पकड़े गए जिन्हें सजा मिली। कॉकरोच छात्रों की बात छोड़िए, कांग्रेस जैसी पुरानी और परिपक्व संस्था के लोग बिना किसी सूचना के प्रधानमंत्री आवास का घेराव करते हैं-उन्हें तो मालूम होगा कि कैसे भीड़ में कोई आतंकवादी घुसकर उपद्रव कर सकता है। आखिर ये लोग समस्या का समाधान कैसे करना चाहते हैं? क्या जो 'नो फ्लाइंग ज़ोन' में उड़ान भरकर भीड़ की फोटो खींचने से समाधान हो जाएगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम छोटी समस्या को हल करने के लिए बड़े-बड़े जोखिम पाल रहे हैं? इसके साथ ही शासन-व्यवस्था की भी जिम्मेदारी बनती थी कि वह भीड़ के ऊपर उड़ते हुए ड्रोन को पकड़ती।



आंदोलन में हिंसा, उपद्रव और विदेशी हस्तक्षेप की आशंका

कहते हैं उस भीड़ में बहुत से विदेशी लोग देखे गए जो तरह-तरह के कमेंट कर रहे थे; यह तो नहीं कहा जा सकता कि वे भारत के नागरिक थे। निश्चित रूप से यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ आंदोलनकारी वाहनों को क्षति पहुँचाने, पुलिसकर्मियों पर पत्थर मारने आदि की घटनाओं में व्यस्त थे। इसके साथ ही 100 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए। पुलिस के लाठीचार्ज में अनेकों कॉकरोच कार्यकर्ता भी घायल हुए। इसके साथ ही, न जाने किन परिस्थितियों में अनेक छात्रों ने अपनी जीवन-लीला समाप्त कर दी। विश्वास नहीं होता कि छात्र ऐसी हरकत करेंगे; मेरे विचार से खुफिया पुलिस और सीसीटीवी कैमरे इस गुत्थी को सुलझाएंगे। ऐसा प्रतीत होता है कि उस भीड़ का एक ही लक्ष्य था, और शायद वह यह था कि सरकार को उखाड़ फेंका जाए; लेकिन यह सोच छात्रों की नहीं हो सकती। कुछ नेता बड़े उत्साह के साथ इस आंदोलन में भाग लेते हुए या उसका समर्थन करते हुए देखे गए, और ये वही नेता थे जो कहते थे कि एक साल के बाद मोदी सरकार नहीं रहेगी। इसके पहले छात्र आंदोलनों में राजनीतिक कार्यकर्ताओं और नेताओं को इतनी सक्रियता से भाग लेते हुए नहीं देखा गया।



अंतरराष्ट्रीय तुलना और नेतृत्व का अभाव

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का यह सोचना है कि इस विध्वंसात्मक आंदोलन की जड़ में विदेशी ताकतें हो सकती हैं। आंदोलन के ठीक पहले कुछ नेताओं का विदेश जाना और आंदोलन के दौरान वापस आना संदेह का कारण हो सकता है। आंदोलन के असली कारण शायद कुछ समय बाद पता चलेंगे जब जांच रिपोर्ट सामने आएगी; अभी तो केवल अटकलें लगाई जा सकती हैं। कुछ लोग इस आंदोलन की तुलना लोकनायक जयप्रकाश नारायण की 'संपूर्ण क्रांति' से करते हुए सुने गए हैं, लेकिन दोनों में किसी प्रकार की समानता नहीं है। वर्तमान आंदोलनकारियों के पास न तो जयप्रकाश जी की तरह का सशक्त नेतृत्व है और न ही संयमित कार्यविधि। कुछ और लोग इस आंदोलन की तुलना नेपाल के नौजवानों के आंदोलन से करते हैं, लेकिन यदि ऐसा हुआ तो बड़ा ही दुर्भाग्यपूर्ण होगा। समय बताएगा कि भारत का नेतृत्व नेपाल, बांग्लादेश और अन्य देशों से भिन्न है। अच्छा होता कि राजनीति से जुड़े हुए छोटे-बड़े हजारों नेता छात्र आंदोलन में न कूदते। यदि ऐसा होता तो शायद अनेक छात्र जिन्होंने अपनी जान गँवा दी, वे बहकावे में आकर अपने प्राण न गँवाते।



संसद के माध्यम से शांतिपूर्ण समाधान की आवश्यकता

सामूहिक रूप से बड़ी संख्या में छात्रों के प्राण जाना दुखद घटना है और आशा है कि इस आंदोलन से राजनीति से जुड़े सभी लोग कुछ सीखेंगे। लगता है सरकार ने कुछ संवेदनशीलता दिखाई थी और इसीलिए छात्रों का एक साल बचाकर अविलंब परीक्षाएं कराकर उन्हें कुछ राहत दी थी। कार्रवाई करते हुए दोषियों की पहचान भी की थी और उन्हें सलाखों के पीछे भिजवाया था। लेकिन शायद इतना पर्याप्त नहीं है; और भी प्रभावी सुधारात्मक और दंडात्मक कदम उठाने होंगे, जिससे ऐसी घटनाओं को रोका जा सके। शिक्षकों का दायित्व बनता है कि वे अपने छात्रों को उचित मार्गदर्शन देकर प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होने की कला बताएं।



ऐसी राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान सामूहिक चिंतन द्वारा संसद के माध्यम से ही निकल सकता है। अफसोस! यदि मान भी लिया जाए कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने जयप्रकाश जी के नेतृत्व में ऐसी ही चुनौती पेश की गई थी, तो भी उन्होंने जो समाधान सोचा और तरीका अपनाया, उसे तो आज के राजनेता भी ठीक नहीं समझेंगे। भारत जैसे विशाल देश की समस्याओं की तुलना नेपाल या बांग्लादेश से नहीं की जा सकती और वह यहाँ की सरकार तथा जनता को स्वीकार भी नहीं होगी। गांधी जी के देश में यदि हो सके तो समस्याओं के निदान के लिए अहिंसात्मक तरीका ही अपनाया जाना चाहिए; वर्तमान में यदि वे तरीके अपनाए गए होते तो इतनी तोड़-फोड़ और हिंसा न होती।



सह-मात के खेल पर विराम

अपेक्षा करनी चाहिए कि कॉकरोच जनता पार्टी का नियमानुसार गठन होगा तथा परंपरानुसार कार्य पद्धति होगी। अच्छी बात है कि सरकार ने पेपर लीक की समस्या को अति-गंभीर मानते हुए कुछ बड़े और कड़े कदम उठाए हैं। पेपर लीक का मामला देशव्यापी है, इसलिए एक मंत्री के त्यागपत्र देने या न देने से समाधान नहीं होगा। साथ ही, सिस्टम में व्याप्त समस्या का समाधान एक मंत्री के हटने से नहीं होगा। इसका समाधान पक्ष और विपक्ष द्वारा सुझावों पर आम सहमति बनाकर उन्हें कड़ाई से लागू करने के बाद ही होगा; और इस सब के लिए संसद ही सर्वोत्तम फोरम है। उसके संचालन में व्यवधान का मतलब है या तो संसद नहीं चलेगी, अथवा सत्तापक्ष कड़ाई करके संसद चलाएगा तथा नियम और कानून बनाएगा; लेकिन इससे पक्ष और विपक्ष में कड़वाहट आएगी जो वांछनीय नहीं है। आशा है कि देशहित में और विशेषकर छात्र-छात्राओं के भविष्य को ध्यान में रखते हुए सह और मात का खेल बंद होगा।

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