कांग्रेस और आरएसएस: दो संगठनों की दो यात्राएं, शुरुआत सामाजिक सरोकारों से हुई थी

Gaon Connection | Jun 03, 2026, 18:26 IST
यह लेख कांग्रेस और आरएसएस के उद्भव के पीछे की सामाजिक विचारधाराओं को विस्तार से उजागर करता है। इसमें दोनों संगठनों के स्थापनाकाल के उद्देश्य और आज के संदर्भ में उनकी भूमिकाओं को समझाया गया है। पाठक को यह जानने के लिए प्रेरित किया गया है कि विभाजन के समय कौन-कौन से नेता अलग-अलग दिशाओं में चले गए थे।

कांग्रेस पार्टी और आरएसएस का जन्म सामाजिक उद्देश्य से हुआ था। कांग्रेस की स्थापना 1885 में एक अंग्रेज अधिकारी सर ओ. ए. ह्यूम तथा ए. सी. बनर्जी की अगुवाई में हुई थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार के द्वारा नागपुर में हुई थी। स्थापना के समय कांग्रेस का उद्देश्य था अंग्रेज हुक्मरान और भारतीय प्रजा के बीच में संवाद स्थापित करना। इस संवाद में आजादी के लिए संघर्ष या आंदोलन सम्मिलित नहीं था, बल्कि भारत के नागरिक और अंग्रेज हुक्मरान के बीच में मधुर संबंध बनाए रखना था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की चिंता का विषय था देश गुलाम क्यों हुआ और उसका उद्देश्य था हिंदू समाज को संगठित और सशक्त बनाना, हिंदू राष्ट्र की स्थापना करना, जिससे हम दोबारा गुलाम न बनें। संघ का उद्देश्य अभी भी गैर-राजनीतिक है, लेकिन कांग्रेस का उद्देश्य हो गया है सत्ता प्राप्ति और शासन व्यवस्था।



स्वराज का उद्घोष और कांग्रेस का शुरुआती स्वरूप

कहते हैं स्वराज शब्द का प्रयोग पहली बार आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद ने किया था और कांग्रेस के अंदर आरंभ में बाल गंगाधर तिलक और उनके समकालीन नेताओं ने कांग्रेस में बढ़-चढ़कर स्वराज का उद्घोष किया था। स्वराज पार्टी के नाम से 1923 में पंडित मोतीलाल नेहरू ने पार्टी बनाई थी। मोहम्मद अली जिन्ना जब तक कांग्रेस के सदस्य रहे, वह एक secular नेता थे लेकिन उनका कहना था “राजनीति भद्र पुरुषों का काम है”। वह सत्याग्रह अथवा असहयोग आंदोलन के खिलाफ थे। कालांतर में वह कांग्रेस में असहज महसूस किए और मुस्लिम लीग में सम्मिलित हो गए, जिसका उद्देश्य था हिंदू और मुसलमानों के लिए आजादी के बाद दो अलग राष्ट्र बनाना।



वास्तव में स्वराज के लिए असहयोग आंदोलन का आरंभ 1920 के कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गांधी जी ने किया था, जिसकी अध्यक्षता लाला लाजपत राय ने की थी। उसके बाद लाल-बाल-पाल का वर्चस्व रहा। 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार भी 1925 से 1930 तक कांग्रेस के सदस्य रहे थे और उसमें सक्रियता से भाग लिया था। गांधी जी के नेतृत्व में आजादी की लड़ाई के साथ सामाजिक कार्य बराबर चलते रहे, फिर चाहे छुआछूत समाप्त करने की बात हो, सफाई के कार्यक्रम हों, अथवा गाँव की तरफ ध्यान देने की बात हो, सब कुछ चलता रहा। इस प्रकार कांग्रेस पार्टी बहती गंगा के समान थी, जिसमें सभी जातियों, धर्मों, विचारधाराओं और यहाँ तक कि नेताजी सुभाष चंद्र जैसे सशस्त्र क्रांति के पक्षधरों का भी स्थान था; और गांधी जी की अगुवाई में अहिंसावादियों का भी स्थान तो था ही। उन सबके बीच में एक ही समानता थी-देश की आजादी।



देश का विभाजन और भिन्न होते लक्ष्य

जब देश को आजादी मिलने वाली ही थी और नेहरू, जिन्ना तथा माउंटबेटन ने शिमला में भारत के बंटवारे पर सहमति जताई तो सबसे अधिक दुखी गांधी जी हुए थे और वह किसी कीमत पर देश का बंटवारा नहीं चाहते थे। संघ का सोचना गांधीजी के समान ही था, जो अखंड भारत की बात करता रहा। गांधी जी तो भारत का बंटवारा रोकने के लिए मोहम्मद अली जिन्ना तक को पूरे भारत का प्रधानमंत्री बनाने को तैयार थे, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। कांग्रेस पार्टी ने उनकी बात से सहमति नहीं जताई। जब भारत में अंग्रेजों के अंतिम दिन आ रहे थे, तो भारतवासियों के लक्ष्य अलग-अलग हो रहे थे। कांग्रेस का लक्ष्य था स्वराज और सरकार बनाना, गांधी जी का लक्ष्य था भारत विभाजन को रोकना (प्रधानमंत्री कोई भी बने) और संघ का लक्ष्य वही रहा-हिंदू समाज को संगठित और सशक्त बनाना। अंततः हासिल हुआ विभाजन, और सत्ता भारत में कांग्रेस को और पाकिस्तान में मुस्लिम लीग को मिल गई। विभाजन रोकने के गांधी जी के सारे प्रयास विफल रहे।



सावरकर, गोडसे और संघ से जुड़े भ्रमों का निवारण

संघ के विषय में अनेक लोगों को कुछ भ्रांतियाँ हैं कि संघ का संबंध विनायक दामोदर सावरकर और नाथूराम गोडसे के साथ था। वास्तव में विनायक दामोदर सावरकर लंदन के इंडिया हाउस में रहते हुए भारत की आजादी के लिए आवाज उठाते रहे थे। अंग्रेजों के नोटिस में आया होगा तो उन्हें पकड़कर पानी के जहाज द्वारा भारत भेजा गया, रास्ते में वह समुद्र में कूदकर फ्रांस के तट पर पहुंचे थे; लेकिन वहां उन्हें शरण नहीं मिली और उन्हें फिर से जहाज द्वारा भारत भेज दिया गया। अंडमान जेल में यातनाएं सहते हुए उन्होंने अपना जीवन काटा और जेल से छूटने के बाद वह हिंदू महासभा के सदस्य and अध्यक्ष बने। इस प्रकार सावरकर को संघ से जोड़ना एक भ्रांति है, क्योंकि संघ और हिंदू महासभा की विचारधाराएं अलग-अलग थीं। सावरकर शायद ही अपने जीवन में कभी भी संघ की शाखा पर स्वयंसेवक के रूप में गए होंगे, भले ही अतिथि के रूप में गए हों।



जब 30 जनवरी 1948 को एक सिरफिरे नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या कर दी, तो कांग्रेस सरकार ने सोचा गोडसे का संबंध आरएसएस से था और कांग्रेस सरकार ने संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। गांधी जी की हत्या का मुकदमा नाथूराम गोडसे पर चलाया गया, जिसमें अपनी पैरवी स्वयं उसने की। गोडसे ने कभी भी अपने को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से अपने संबंधों का उल्लेख नहीं किया है और न उसका कोई संबंध था। गोडसे को उसके कर्म की सजा मृत्युदंड के रूप में दी गई, लेकिन कांग्रेस के कुछ लोग उसे जनसंघ और आरएसएस से संबंद्ध बताते रहे। कांग्रेस सरकार ने संघ पर प्रतिबंध भी लगाया और प्रतिबंध हटाया भी; यह तो स्पष्ट नहीं है कि प्रतिबंध लगाया क्यों था और हटाया क्यों था, शायद इतिहासकार जानते होंगे। अतः विनायक दामोदर सावरकर अथवा नाथूराम गोडसे का संबंध आरएसएस के साथ जोड़ना तथ्यों पर आधारित नहीं है।



राजनीतिक प्रवेश: भारतीय जनसंघ की स्थापना और सामाजिक कार्य

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का संबंध 1950 तक दलगत राजनीति से बिल्कुल नहीं रहा, लेकिन जब गांधी जी की हत्या हुई और उसमें हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे को संघ का सदस्य बताया गया और लोकसभा तक में चर्चा हुई, तो संघ का पक्ष रखने वाला कोई नहीं था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को राजनीति के क्षेत्र में अपना पक्ष रखने के लिए 'भारतीय जनसंघ' नाम की राजनीतिक पार्टी बनाई गई। अंततः शायद समझ में आ गया होगा कि गोडसे का संबंध संघ से नहीं था और कांग्रेस ने प्रतिबंध हटा लिया। मैं समझता हूं यह समय कांग्रेस और संघ के परस्पर विरोधी बनने का कारण रहा होगा। तब तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दलगत राजनीति से पूरी तरह अलग था और सिद्धांततः अभी भी अलग है।



इस प्रकार भारतीय जनसंघ का जन्म हुआ, इसके प्रथम अध्यक्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी बने जो नेहरू जी की सरकार में मंत्री रह चुके थे। संघ अपने अनेक अनुषांगिक संगठनों के माध्यम से समाज का काम करता रहा है और कर रहा है; इनमें प्रमुख हैं-भारतीय मजदूर संघ, भारतीय किसान संघ, विद्या भारती, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, वनवासी कल्याण आश्रम और इस प्रकार के 35 संगठन। कांग्रेस पार्टी भी गांधी जी के समय तक समाज के कामों में बढ़-चढ़कर भूमिका लेती रही थी, फिर चाहे गांधी जी का भंगी कॉलोनी में जाकर रहना हो, या सफाई का कलकत्ता अधिवेशन में स्वयं सफाई का काम करना हो। कांग्रेस का अभी विद्यार्थी संगठन है एनएसयूआई (NSUI), यूथ कांग्रेस तथा कुछ अन्य संगठन हैं, लेकिन कांग्रेस सेवा दल की गतिविधियां अब देखने में नहीं आतीं। जहां तक संघ के अनुषांगिक संगठनों का सवाल है, सभी का अपना स्वतंत्र अस्तित्व है; कोई भी आर्थिक या दूसरे रूप में संघ पर आश्रित नहीं है, लेकिन वे सभी एक-दूसरे के पूरक जरूर हैं।



आपातकाल (1975) और संघ की भूमिका

जब 1975 में कांग्रेस पार्टी की सरकार ने देश में आपातकाल लगाया और नागरिकों की आजादी समाप्त कर दी, तो जयप्रकाश नारायण जी की अगुवाई में उसे वापस लाने के लिए विभिन्न पार्टियों ने मिलकर संघर्ष किया था। तब आजाद भारत में पहली बार संघ ने आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया था और कांग्रेस सरकार ने संघ पर दूसरी बार प्रतिबंध लगा दिया था। संघ के हजारों स्वयंसेवकों को जेल में डाला गया था, यातनाएं भोगनी पड़ी थीं; लेकिन अंततः राजनीतिक कार्यकर्ताओं को तथा संघ के स्वयंसेवकों को तब छोड़ा गया जब आजादी फिर से वापस आ गई थी।



आजादी के बाद कांग्रेस में बिखराव बनाम संघ का विस्तार

कांग्रेस पार्टी में विविध विचारों के लोग गांधी जी के नेतृत्व में काम करते रहे थे, लेकिन आजादी के बाद गांधी जी का सुझाव नहीं माना गया जिन्होंने कहा था कि अब कांग्रेस का काम समाप्त हो गया है, इसे भंग कर देना चाहिए। लेकिन सत्ता चलाने वाले लोग इसके लिए तैयार नहीं थे। नतीजा यह हुआ कि बहुत से मूर्धन्य नेताओं का मोहभंग होने लगा और उन्होंने कांग्रेस पार्टी छोड़ना आरंभ कर दिया। आचार्य जे. बी. कृपलानी ने कांग्रेस छोड़कर किसान मजदूर प्रजा पार्टी बनाई; डॉ. राम मनोहर लोहिया ने अलग होकर सोशलिस्ट पार्टी बनाई; जयप्रकाश नारायण ने विनोबा भावे के साथ मिलकर भूदान यज्ञ अभियान चलाया; प्रख्यात समाजवादी अशोक मेहता, अच्युत पटवर्धन जैसे नेता भी कांग्रेस से अलग हो गए।



कालांतर में चौधरी चरण सिंह, विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कांग्रेस छोड़कर जनता दल का गठन किया। मशहूर अतुल्य घोष, मोरारजी देसाई, कामराज नादर, बाबू जगजीवन राम आदि पचासों नेता कांग्रेस छोड़ गए; उनमें से कुछ ने नई पार्टी बनाई और कुछ लोग दूसरी पार्टियों में सम्मिलित हो गए। यदि गांधी जी की सलाह मान ली गई होती तो सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी की यह दशा नहीं होती। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में इस प्रकार का बिखराव नहीं आया है और उसने अपने जीवन की शताब्दी पूरी कर ली है। जहां कांग्रेस का संगठन सिकुड़ता गया है, वहीं संघ का लगातार विस्तार हुआ है।



निष्कर्ष: राष्ट्रहित सर्वोपरि

संघ ने अपने 100 वर्षों में कभी भी दलगत राजनीति में प्रत्यक्ष भाग नहीं लिया, सामाजिक संगठन के रूप में हमेशा काम करता रहा और अभी भी कर रहा है-फिर चाहे सरहद पर लड़ रहे सैनिकों को सामग्री पहुँचाना हो, गुजरात का भूकंप हो, बाढ़, सूखा या उड़ीसा का सुनामी का संकट हो। अपने लक्ष्य के अनुसार निरंतर समाज को संगठित और शक्तिमान बनाने के काम में लगा रहा है और कामयाब हुआ है। इसके विपरीत कांग्रेस की शक्ति का ह्रास हुआ है, सामाजिक कामों में भागीदारी घटी है और सत्ता का क्षेत्र भी सिकुड़ता जा रहा है।



देश के सभी संगठन यदि एक-दूसरे के लक्ष्य को समझें और निराधार आलोचना तथा परस्पर विद्वेष से बचते हुए राष्ट्र कार्य में सभी योगदान देते रहें तो बहुत ही उचित होगा। सभी राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक संगठनों का अपना अलग-अलग उद्देश्य, कार्यपद्धति और लक्ष्य होता है, जिसका सम्मान होना चाहिए। परस्पर आलोचना की मर्यादा हो और देखने का पैमाना यही रहे कि कौन सा काम राष्ट्रहित में हो रहा है और कौन सा काम राष्ट्र विरोधी है। इतिहासकारों को इस पर विस्तार से प्रकाश डालना चाहिए ताकि भ्रम न रहे कि कांग्रेस आरंभ से ही राजनीतिक पार्टी रही और इसका एक स्पष्ट सिद्धांत और लक्ष्य बना रहा है, अथवा संघ एक राजनीतिक संगठन है।

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