टिप्पणी : पंचायती राज को आरक्षण ने तहस नहस कर दिया
Dr SB Misra | Apr 24, 2018, 11:29 IST
भारत में पंचायत की व्यवस्था जिसे ग्राम सभा कहते थे, बहुत पुरानी है शायद वैदिक काल से चली आ रही थी। इसके अन्तर्गत गांव के लोगों की आम सहमति से समझदार और सम्मानित लोगों में से पांच बुजुर्ग नामित किए जात थे। ये ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में काम करते थे और इन्हें पंच परमेश्वर कहा जाता था। इस पुरानी परम्परा को महात्मा गांधी ने समझा था और इसे ग्राम स्वराज का नाम दिया था। आजाद भारत के बाकी नेताओं ने पहली पंच वर्षीय योजना में पंचायती राज पर ध्यान नहीं दिया लेकिन बाद के वर्षों में कुछ ध्यान दिया गया।
जमीन पर नजर नहीं आ रहा है ग्रामीण विकास। ग्राम सभा वास्तव में ग्राम स्वराज की आदर्श व्यवस्था थी जिस पर राजाओं और बादशाहों की लड़ाई तक का कोई प्रभाव नहीं पड़ा, न तो मुगलों की गुलामी में और न अंग्रेजों की गुलामी में। यह स्थानीय प्रशासन की सबसे छोटी स्वतंत्र इकाई थी लेकिन इसे आजादी के बाद की सरकारों ने भी अपनी हुकूमत का भाग नहीं माना। आजादी के बाद गांधी जी के नाम की माला जपने वाले हुक्मरानों से आशा थी कि गांवों का पुराना स्वरूप कायम करेंगे लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
आजाद भारत में करीब 40 साल तक पंचायतें भले ही प्रभावी भूमिका नहीं निभा सकीं लेकिन इनमें लोभी और स्वार्थी लोग नहीं थे इसलिए कुछ हद तक पुराना स्वरूप बना रहा। चुनाव खर्जीले नहीं थे, ग्रामीण कलह नहीं थी और शान्ति से ग्राम सभापति का चुनाव होता था जिसे अब ग्राम प्रधान कहते हैं। जब 1992 में पंचायती राज ऐक्ट लागू किया गया तब इसका पुराना स्वरूप पूरी तरह बदल गया ।
कई गाँव अभी भी विकास से हैं कोसों दूर। दूसरा कानून है प्रधानों के चुनाव में महिलाओं को आरक्षण जिससे अपेक्षा की गई थी महिला सशक्तीकरण की। कानून के हिसाब से महिला प्रधान तो बन जाती हैं लेकिन काम उनकी जगह कोई पुरुष ही करता है, कभी प्रधानपति के रूप में तो कभी प्रधानपुत्र के रूप में। कुछ अपवादों को छोड़कर प्रधान तो केवनल हस्ताक्षर करती या अंगूठा लगाती है । इस प्रकार महिलाओं का सशक्तीकरण तो नहीं हो रहा उनका केवल यूज़ हो रहा है पुरुषों द्वारा।
पंचायतीराज से अपेक्षा थी कि गांव के लोग अदालतों के चक्कर लगाने से बचेंगे जब न्याय पंचायतें अपना काम आरम्भ करेंगी। पिछले तीस साल में इन्हें काम करते और अदालतो का बोझा घटाते नहीं देखा गया। न्याय पंचायत अथवा ग्राम पंचायत की बैठकों की कौन कहे अधिकांश पंचायतों में उनका अपना भवन तक नहीं है। मैं समझता हूं अधिकांश आंगनवाड़ी और बालवाड़ी केन्द्रों के लिए भी जगह किराए पर ही ली जाती है। गांव के लोगों को यह जानकारी तक नहीं रहती कि उन्हें किन योजनाओं में क्या लाभ मिल सकता है।
ग्राम प्रधानों की रुचि इस बात में नहीं रहती कि सर्वशिक्षा अभियान कैसा चल रहा है, टीकाकरण की क्या प्रगति है, प्राइमरी स्कूल में शहर से आकर पढ़ाने वाली अध्यापिका आती भी है या नहीं अथवा प्राथमिक विद्यालय में अध्यापक हैं या नहीं बल्कि इसमें उनकी रुचि रहती है कि भवन निर्माण के लिए बैंक खाते में पैसा आया अथवा नहीं, पट्टे पर जमीन बांटने का अवसर मिलेगा या नहीं और लोहिया भवन, अम्बेडकर भवन या प्रधानमंत्री आवास के लिए परिवारों को कब चिन्हित करना और भेजना है ताकि उन परिवारों से कुछ मिल सके।
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