Samvad: फिरोज़ गाँधी के योगदान को देश ने भुला दिया
फिरोज़ गांधी हमारे देश के पहले और यशस्वी प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के दामाद थे, वह देश की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के पति थे और वह देश के बड़े नेता संजय गांधी और राजीव गांधी के पिता थे राहुल गांधी के दादा थे और सबसे बड़ी बात कि उन्होंने आज़ादी की लड़ाई में श्रीमती इंदिरा गांधी के साथ मिलकर स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था। आखिर क्या कारण है की इतनी योगदान और देश के कामों में बढ़-चढ़कर भाग लेने वाले उसे नेता को आज कोई याद भी नहीं करता। क्या उनका यही दोष था कि वह कश्मीरी पंडित नहीं थे बाल के पारसी थे और अपने इस जेनेटिक संबंध को शायद उनका परिवार पसंद नहीं करता अथवा श्रीमती इंदिरा गांधी के साथ आगे के दिनों में मधुर संबंध न बिगड़ते और इंदिरा जी अपने पिता नेहरू जी के पास न जाती।
देश उनके योगदान को कैसे भूल गया?
फिरोज़ गाँधी को उनके परिवार ने तो भुला ही दिया लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेड़ने वाले इस जुझारू पत्रकार को देश के पत्रकारों ने भी भुला दिया। इतना ही नहीं लोक सभा में अपने तर्कपूर्ण ओजश्वी भाषणों से नेताओ को मोहित करने वाले नेता को राजनेताओं ने भी भुला दिया। हमारा देश उनके योगदान को कैसे भूल गया यह समझ से परे है। यह तो सुना है कि नेहरू जी फिरोज और इंदिरा गाँधी की शादी को न पसंद करते थे शायद इस लिए कि फिरोज गाँधी एक साधारण परिवार से आते थे और बहुत से लोग उन्हें मुसलमान समझ बैठेते है लेकिन वह पारसी थे जैसे देश के महान उद्योगपति जे आर डी टाटा। सच्चाई जो भी हो नेहरू परिवार में उनका संपर्क नेहरू जी की पत्नी श्रीमती कमला नेहरू के माध्यम से हुआ था। भले ही इंदिरा जी और फिरोज गांधी इंग्लैंड में समकालीन विद्यार्थी थे और उन दोनों का परिचय वहीँ से हुआ था। जब स्वतंत्रता आंदोलन चालीस के दशक में अपने चरम पर था तो इंदिरा और फिरोज गाँधी उसमे कूद पड़े थे। तब फिरोज गाँधी की उम्र केवल 20 वर्ष थी और इस आंदोलन के कारण उन्हें तीन बार जेल जाना पड़ा थे।
भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल
जब 1947 में देश आजाद हुआ तब भी फिरोज गाँधी कांग्रेस के सक्रीय सदस्य थे और नेहरू परिवार के साथ अच्छे सम्बन्ध चल रहे थे। देश का पहला आम चुनाव 1952 को हुआ उसमे कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में विजय पाकर वह पहली लोकसभा में रायबरेली से सांसद बन गए। फिरोज गांधी लोकप्रिय सांसद थे और अपने संसदीय क्षेत्र का ध्यान रखते हुए राष्ट्रीय समस्याओं पर भी तीखी नजर रखते थे। उन्होंने प्रधानमंत्री के साथ अपने रिश्तों की परवाह किए बिना देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल बजा दिया था। फिर चाहे एक प्राइवेट कंपनी का बीमा व्यवसाय हो मूंधड़ा कांड हो फिर चाहे डालमिया की बीमा कम्पनी कांड हो या टीटी कृष्णमाचारी मंत्रालय के खिलाफ उठाई गई आवाज हो सब जगह उन्होंने सशक्त तरीके से भ्रष्टाचार को उजागर किया था और सरकार को सुधारात्मक बदलाव के लिए मजबूर किया था। उसी के बाद बीमा के क्षेत्र में सरकार का आगमन हुआ था और बाकी भ्रष्टाचारों के खिलाफ कार्रवाई हुई थी।
स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका
फिरोज़ गांधी का जन्म मुंबई 1912 में एक सामान्य पारसी परिवार में हुआ था। बहुत ही छोटी उम्र में उनके पिताजी का देहांत हो गया था और मां ने इलाहाबाद (प्रयागराज) में रहकर उनका पालन पोषण किया था। कालांतर में जब वह अपनी पढ़ाई के लिए लंदन स्कूल आफ इकोनॉमिक्स में गए तो उन्हीं दिनों श्रीमती इंदिरा गांधी भी अपनी पढ़ाई कर रही थी दोनों में वैचारिक मेल बना और मित्रता में परिवर्तित हुआ। भारत भारत लौटकर फिरोज़ गांधी श्रीमती इंदिरा गांधी के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाते रहे और आनंद भवन में उनका आना-जाना रहता था। बाद में जब फिरोज गांधी और इंदिरा जी ने अपने को वैवाहिक संबंध में जोड़ना चाह तो शायद यह पंडित नेहरू को पसंद नहीं था लेकिन कहते हैं महात्मा गांधी ने अपना आशीर्वाद दिया और अपना सरनेम भी दिया और तब वह फिरोज़ जहांगीर गांधी से घांडी से फिरोज़ गांधी बन गए। गांधी जी से उनका कोई भी खून का रिश्ता नहीं था।
फिरोज गाँधी और इंदिरा जी की दो संताने हुई राजीव गांधी और संजय गांधी अब वंश परंपरा चल पड़ी और गांधी के नाम से चली। कुछ समय तक इंदिरा जी और फिरोज़ गांधी के बीच में मधुर संबंध रहे स्वस्थ वैवाहिक जीवन बिता रहे थे और फिरोज गांधी अपने बच्चों से कहते हैं बहुत ही स्नेह करते थे उन्हें कहानी सुना कर प्रेरित भी करते थे। लेकिन कुछ समय बाद न जाने किन कारणों से उनके संबंध बिगड़ते गए और इंदिरा जी अपने पिता पंडित नेहरू के घर जाकर रहने लगी और बच्चे भी उन्हीं के साथ रहे। लेकिन फिरोज गांधी एकाकी जीवन बिताते रहे राजनीति में सक्रिय रहे वह पहले पत्रकार थे खोजी पत्रकारिता करते थे 1952 के आम चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर रायबरेली से चुनाव लड़ा और लोकप्रिय सांसद बने।
एक निर्भीक वक्ता
संसद में फिरोज़ गांधी की छवि एक निर्भीक वक्ता और सिद्धांतों के लिए जुझारू कार्यकर्ता की बन गई थी। उन्होंने शायद आजाद भारत के इतिहास में पहली बार भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई बिना यह सोचे की उनके ससुर प्रधानमंत्री हैं उन्ही की सरकार के खिलाफ वह आवाज उठा रहे थे। डालमिया की जीवन बीमा कंपनी के विरुद्ध जो लड़ाई उन्होंने लड़ी उसके परिणाम स्वरूप भारतीय जीवन बीमा निगम जन्म हुआ जिस पर सरकार का पूरा नियंत्रण रहा और आज भी है। उसके पश्चात 50 के उत्तरार्ध में उन्होंने मुद्रा कांड के नाम से मशहूर भ्रष्टाचार के मुद्दे को जोर-जोर से उठाया जिसका ऐसा प्रभाव हुआ की टी टी कृष्माचार्य जैसे मूर्धन्य वित्त मंत्री को त्यागपत्र देना पड़ा। इससे नेहरू जी ना खुश हुए थे।
आज के विपक्षी नेता भी जो मुद्दे उठाते हैं उन्हें अंजाम तक नहीं पहुंचा पाते हमारे विपक्षी नेताओं को फिरोज गांधी के नेतृत्व से सीखना चाहिए। ऐसी अपेक्षा इसलिए कर सकते हैं कि फिरोज़ साहब आज के नेता विपक्ष के दादाजी थे और उनका रक्त उनकी संतानों में दौड़ रहा है। जब फिरोज गाँधी का स्वास्थ्य पचास के दशक के उत्तरार्ध में बिगड़ रहा था तो उनकी पत्नी श्रीमती इंदिरा गाँधी कुछ समय के लिए उनके साथ रहने के लिए आयी थी। यह तो नहीं पता किन विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने ऐसा किया था लेकिन यह संवेदनशीलता का उदाहरण था। 1960 में हृदय गति रुकने से उनका देहांत हो गया तब इंदिरा गाँधी ने फिरोज गाँधी के पार्थिव शरीर को अंतिम संस्कार के लिए तैयार किया था और उनके बेटे राजीव गांधी ने मन्त्रोच्चार्य के मध्य हिन्दू रीति रिवाज से फिरोज साहब को मुखाग्नि दी थी।
अंतिम संस्कार में सर्व श्री - अली शौकत, अल्बैर कामू ,एडविना माउंटबेटन ,कुलदीप कौर ,गामा पहलवान ,चारु चंद्र विश्वास ,जिगर मुरादाबादी ,डेविड लश ,नाजिक अल-आबिद ,नाथूराम प्रेमी , फ्रैंक एल्मोर रॉस आदि सम्मिलित हुए थे। अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि कोई भी नमी गिरामी स्वतंत्रता सेनानी या कांग्रेस नेता अथवा पत्रकार उपस्थित नहीं था। फिरोज गाँधी की समाधि प्रयाग में बनी है शायद यह बात देश के बहुत कम लोगों को ही पता होगी और उनके वंशज भी साल में एक बार भी समाधि पर पुष्पांजली देने नहीं पहुँचते है छोटे छोटे नेताओं के नाम पर उनके जन्मदिन अथवा निर्वाण दिवस पर छुट्टियाँ होती है या फिर उनके नाम से स्कूल कॉलेज और सड़के बनाई जाती है लेकिन फिरोज गाँधी को पूरी तरह विस्मृत किया गया है।
हमारी सरकार जो भ्रष्टाचार समाप्त करने का दम भरती है उसके ध्यान में भी फिरोज़ गाँधी का नाम नहीं आया। आशा की जानी चाहिए कि कम से कम पत्रकार बंधुओं का ज्ञान इस तरफ जाएगा और देश के ध्यान में भी लाएगा यह एक जुझारू सांसद, समाज सेवी और स्वतंत्रता सेनानी को विनम्र श्रंद्धाजली होगी।