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गाँवों में गुड़ जैसे कुटीर उद्योगों का स्किल सिखाएं

डॉ. शिव बालक मिश्र | Sep 16, 2016, 16:16 IST
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मोदी ने अनेक वादों में एक वादा स्किल डेवलपमेन्ट का भी किया था। आजकल स्किल डेवलपमेन्ट की खूब चर्चा हो रही है और इसे अभियान की तरह चलाया जाना है लेकिन गाँव और शहर के नौजवानों के लिए स्थानीय आवश्यकताओं और उपलब्ध सुविधाओं के हिसाब से ही स्किल का चुनाव होना चाहिए। गाँवों में पुरातन पद्धतियां और आधुनिक विधाएं एक साथ चल रही हैं। जहां कम्प्यूटर, मोबाइल, फ्रिज, मोटर-साइकिल, सोलर उपकरण वगैरह के मैकेनिक चाहिए वहीं खुरपी, कुदाल और फावड़ा बनाने के कारीगर भी चाहिए।

गुड़ की बात इसलिए भी प्रासंगिक है कि आलू और प्याज के बाद शायद महंगाई में चीनी का नम्बर है और चीनी मिलें पैसा देर से देती हैं। और गुड़ के उत्पादन और स्थानीय स्तर पर बिक्री से तुरन्त पैसा मिलता है। यह देश का बहुत पुराना उद्यम है फिर भी इस पर उतनी भी रिसर्च नहीं हुई है जितनी बैलगाड़ी और हल पर हुई है। गुड़ और खांडसारी उद्योग को विकसित करके रोजगार के अनगिनत अवसर जुटाए जा सकते हैं। चीनी की अपेक्षा गुड़ स्वास्थ्य के लिए भी बेहतर है। हमारी सरकारें शायद इस उद्योग को पिछड़ा मानती हैं और हतोत्साहित करती हैं। आधुनिक विधियों का प्रयोग करके इसे लाभप्रद और निर्यात के लिए विदेशों तक में लोकप्रिय बनाया जा सकता है।

गुड़ में अनेक खनिज पदार्थ जैसे लौह, मैगनीशियम, पोटाश, फास्फोरस और कैल्शियम होते हैं जो चीनी में नहीं होते। इसमें अनेक विटामिन होते हैं जो चीनी में नहीं होते। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि मधुमेह की जननी चीनी को इतना महत्व मिला है और मधुमेह के लिए अपेक्षाकृत कम जिम्मेदार गुड़ को नजरअंदाज़ किया गया है।

आयुर्वेद में गुड़ को अनेक लाभों वाला माना गया है जैसे गन्ने का रस लीवर के लिए लाभदायक है, गुड़ पाचक होता है, फेफड़ों के लिए हितकर है और थकान मिटाने वाला है। इसमें पोटाश होने के कारण दिल के लिए लाभदायक है और कहते हैं वजन को घटाने वाला है। अब तो गन्ने का रस केवल शहरों में मिलता है। गाँवों में गुड़ बनाने का चलन ही समाप्त हो रहा है तो पीने के लिए रस कहां से मिलेगा। गन्ने की पेराई में गाँव जीवन्त हो उठता था, सब मिलकर रस निकालते और गुड़ बनाते थे, आपसी प्रेमभाव और सहयोग का परिचय देते थे ।

गुड़ का उत्पादन भले ही कम हुआ हो परन्तु इसकी मांग आज भी है। मांग-पूर्ति के बिगड़े सन्तुलन के कारण बाजार में चीनी और गुड़ के भाव में अन्तर ही नहीं रहा। गुड़ उत्पादन में कमी के कई कारण हो सकते हैं परन्तु सरकारी समर्थन का अभाव और इन्स्पेक्टर राज के चलते स्थानीय स्तर पर प्रोत्साहन नहीं मिलता। गुड़ महंगा हो गया और इससे बनने वाले पदार्थ भी। गुड़ की खपत घटने के कारण हैं इसके बनाने में सफाई की कमी, भंडारण में कठिनाई और इस पर सरकार का ध्यान ना देना।

केवल गुड़ ही नहीं गाँवो की अनेक चीजें अतीत के गर्त में जा रही हैं। कम ताप पर बना छाछ, मट्ठा और मावां, कम ताप पर पिसा हुआ आटा, बिना पालिश की गई दालें, रेशे वाले खाद्य पदार्थ और बिना रसायनिक पदार्थों के प्रयोग के फल, सब्जी और मसाले। यही सब गाँव की विशेषता थी, परन्तु अब पारम्परिक ढंग से बनने वाली इन चीजों का चलन नहीं रहा। इन पर ना तो कोई रिसर्च हुई और ना ही सरकारों का प्रोत्साहन मिला। इनका कुटीर ढंग से बनना ही बन्द हो गया।

सच कहा जाए तो चीनी के दुर्गुणों को उसी प्रकार प्रचारित किया जाना चाहिए जैसे तम्बाकू की बुराइयों को बताया जाता है। हानिकारक पेय पदार्थों के स्थान पर सत्तू की पैकेजिंग करके उसे देश में बेचा और निर्यात किया जा सकता है। गुड जैसे खाद्य पदार्थों को निर्यात योग्य बनाने के लिए इनकी साफ-सफाई पर विशेष ध्यान देना होगा और भारत पर से मधुमेह की राजधानी होने का धब्बा हटाना होगा।

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