भारत को किसी एक व्यक्ति या पार्टी ने आजादी नहीं दिलाई

Dr SB Misra | Oct 17, 2026, 18:58 IST
Image credit : Gaon Connection Network
भारत की स्वतंत्रता संग्राम में कई नेताओं और संगठनों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। महात्मा गांधी का सत्याग्रह आंदोलन अवश्य महत्वपूर्ण था, परंतु स्वतंत्रता की अंतिम जीत के लिए अन्य क्रांतिकारियों का प्रयास भी उतना ही आवश्यक था। नेताजी सुभाष चंद्र बोस सहित विभिन्न विचारधाराओं वाले नेताओं ने आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वतंत्रता का श्रेय किसी एक व्यक्ति या समूह को नहीं दिया जा सकता।

देश के तमाम लोगों का मानना है कि भारत की आजादी महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ने दिलाई थी। लेकिन हमें यह भूलना नहीं चाहिए कि गांधी जी कांग्रेस में चवन्नी के सदस्य भी नहीं थे, और उनके सत्याग्रह का श्रेय किसी एक पार्टी को देना उचित नहीं है। आजादी की लड़ाई में भारत के सर्व समाज ने भाग लिया था और गाँधी जी का नेतृत्व उनमे बहुत से लोग स्वीकार करते थे। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि आजादी की पहली लड़ाई 1857 में बहादुर क्रांतिवीरों ने योजना बनाकर शुरू की थी। क्रांति के शुरुआत की तारीख निश्चित थी, लेकिन मंगल पांडेय जैसे सैनिक अपने जोश और उत्साह पर नियंत्रण नहीं रख पाए और उस तारीख से पहले ही मेरठ स्टेशन पर कुछ अंग्रेजों पर गोली चला दी। इससे अंग्रेज सतर्क हो गए, क्रांतिकारियों की धरपकड़ चालू हो गई और आजादी की पहली लड़ाई कामयाब नहीं हो पाई। इतना जरूर हुआ कि देश के कोने-कोने में स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी सुलग पड़ी। इससे सभी स्वतंत्रता सेनानी प्रेरित हुए फिर चाहे उग्रपंथी या अहिंसा के मार्ग पर चलने वाले थे।



हमें ध्यान रखना चाहिए कि कांग्रेस का जन्म 1885 में एओ ह्यूम नामक अंग्रेज अधिकारी के हाथों से हुआ था। इसका पहला अधिवेशन मुंबई में हुआ था, लेकिन इसका उद्देश्य न तो आजादी थी, ना स्वतंत्रता संग्राम। उस समय कांग्रेस का उद्देश्य था अंग्रेज शासक और भारतीय प्रजा के बीच में मधुर संबंध स्थापित करना। उसमें आजादी या आजादी के लिए संघर्ष की बात नहीं कही गई थी। गांधी के 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत आने तक कांग्रेस की स्थापना के 30 वर्ष बीत चुके थे। इस अवधि में सत्याग्रह आंदोलन सक्रिय नहीं हुआ था। इतना जरूर है की लाल, बाल, पाल द्वारा गरम दल के रूप में आजादी की आवाज उठी थी। लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और विपिन चंद्र पाल, शायद पहले साफ नजरिए के साथ आजादी की आवाज बुलंद करने वाले नेता थे। बाल गंगाधर तिलक ने नारा दिया था ‘स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है।’



अंग्रेजों के साथ कांग्रेस का सौहार्द्रपूर्ण संबंध स्थापित करने का एओ ह्यूम का उद्देश्य ज्यादा दिन नहीं चल सका। 1905 आते-आते चाहे बंग भंग यानी बंगाल विभाजन के कारण या दूसरे अन्य कारणों से कांग्रेस का रवैया बदला और इसमें लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, विपिन चंद्र पाल जैसे गरम दल के नेताओं की आवाज बुलंद होने लगी। लगभग यही समय था जब मोहम्मद अली जिन्ना का इंग्लैंड से भारत आगमन हुआ और वह कांग्रेस पार्टी के सदस्य बने। 1915 में दक्षिण अफ्रीका से कांग्रेस की कार्य पद्धति में और भी बदलाव आए। आजादी के लिए संघर्ष में गांधी का रास्ता शांतिपूर्ण सहयोग आंदोलन का था, जो कांग्रेस का धीरे-धीरे रास्ता बन गया। मोहम्मद अली जिन्ना का मानना था कि राजनीति सज्जनों का काम है, और इसमें जनआंदोलन की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। गांधी का रामराज्य की कल्पना और सत्याग्रह में जनआंदोलन करना जिन्ना को पसंद नहीं था। इसलिए जिन्ना ने 1920 आते-आते कांग्रेस पार्टी से अलग होने का फैसला लिया। वास्तव में प्रारंभिक वर्षो में जिन्ना एक धर्मनिरपेक्ष सेक्युलर नेता थे, वह कब और कैसे सांप्रदायिक बनकर द्विराष्ट्रवाद के समर्थक बन गए। जबकि नेहरू की ही तरह जिन्ना धर्मनिरपेक्ष सेकुलर नेता थे और मतभेद नहीं होना चाहिए था। इसी बीच तुर्की देश के मुस्लिम सर्वमान्य मार्गदर्शक खलीफा को वहां के सेकुलर नेता अतातुर्क ने अपदस्थ कर दिया, जिसके खिलाफ आंदोलन आरम्भ हुआ, जिसे खिलाफत आंदोलन के नाम से जाना गया। धर्मावलंबियों में बहुत से लोगों ने अतातुर्क के इस फैसले का विरोध किया।



भारत में हिंदू मुस्लिम दोनों का सम्मिलित सहयोग पाने के लिए कांग्रेस पार्टी ने खिलाफत आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया, क्योंकि वह खिलाफत आंदोलन के पक्ष में नहीं थे। जो मोहम्मद अली जिन्ना को पसंद नहीं आया।



इसी बीच 1920 के दशक में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने कांग्रेस पार्टी में सम्मिलित होने का निर्णय लिया और अपने तमाम साथियों के साथ कांग्रेस के सदस्य बन गए। डॉक्टर हेडगेवार को कांग्रेस का लक्ष्य और उद्देश्य यह लगा कि केवल राजनीतिक आजादी और सत्ता परिवर्तन इनका उद्देश्य है, जो डॉक्टर हेडगेवार के सिद्धांत से मेल नहीं खाता था। डॉ. हेडगेवार राष्ट्र के सर्वांगीण विकास और सामाजिक आर्थिक तथा राजनीतिक सभी प्रकार की आजादी के पक्षधर थे, केवल सत्ता परिवर्तन से काम नहीं चलेगा, उनका सोचना था। फिर भी उन्होंने बढ़-चढ़कर कांग्रेस में भाग लिया। नागपुर अधिवेशन और कोलकाता अधिवेशन की व्यवस्था संभालने में सहयोग दिया। अंततः किसी बीच 1925 में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की जिसका लक्ष्य था व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण का लक्ष्य हासिल करना।



उन्हीं दिनों नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आईसीएस की परीक्षा पास की थी, लेकिन देश को आजाद करने की जो भावना उनके मन में थी, उसमें आईसीएस कुछ मदद नहीं कर सकता था। इतने प्रतिष्ठा पूर्ण नौकरी छोड़कर नेताजी ने आकर कांग्रेस पार्टी ज्वाइन कर ली। 30 के दशक में वह कांग्रेस के अध्यक्ष बने और दोबारा फिर अध्यक्ष के पद पर विजयी हुए, लेकिन महात्मा गांधी के अनुयाई नेहरू, पटेल और दूसरे लोगों ने दूसरी बार अध्यक्ष बने नेताजी को कार्य समिति में शामिल करने से इनकार कर दिया और अंततः नेताजी ने कांग्रेस छोड़कर फारवर्ड ब्लाक नाम की संस्था बनाई। उन दिनों द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था, नेताजी भारत से बाहर जाकर जापान में आजाद हिंद फौज का गठन किया और नगालैंड की सरहद तक अंग्रेजों पर हमला बोल दिया इतना ही नहीं, अंडमान निकोबार पर भी कब्जा कर लिया और उनका नारा था, ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।’ यह नारा कांग्रेस के अहिंसावादी मार्ग से भिन्न था और अकेले ही उनको इस पर चलते हुए संघर्ष करना पड़ा। दुर्भाग्य से विमान दुर्घटना में उनका देहांत हुआ और भारत में उस समय के सबसे बड़े सपूत को खो दिया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंग्रेजों की हालत जर्जर हो चुकी थी और अब भारत जैसे बड़े देश पर नियंत्रण बनाए रखना उनके बस का नहीं था।



इस सबके बीच में समय-समय पर क्रांतिकारियों का अंग्रेजों पर हमला चल रहा था। इन क्रांतिकारियों में भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, अशफ़ाकउल्ला खान, राम प्रसाद बिस्मिल, खुदीराम बोस। इस प्रकार के हजारों क्रांतिवीर अंग्रेजों की नाक में दम किए हुए थे, लेकिन इनको कांग्रेस का समर्थन, सहयोग और आशीर्वाद तक नहीं मिला और अधिकांश को फांसी की सजा भोगनी पड़ी। इन हजारों क्रांतिवीरों का आजादी की लड़ाई में योगदान किसी भी सत्याग्रह से कम नहीं रहा है। यह क्रांतिवीर कांग्रेस के सदस्य नहीं थे।



इस प्रकार हम देखते हैं कि आजादी की लड़ाई में देश के हर कोने और हर वर्ग की भागीदारी रही। इस ताकत के सामने अंग्रेजों का जर्जर साम्राज्य ढह जाना एक स्वाभाविक अंत हो सकता था। अंग्रेजों ने सम्मानपूर्वक भारत से छुटकारा पाना बेहतर समझा और उसके लिए प्रयास किया। भले ही देश का बंटवारा कराने में कामयाब हो गए।



महात्मा गांधी को यह मालूम था कि आजादी की लड़ाई में सत्याग्रह क्रांतिकारी राष्ट्रवादी समाजवादी और यहां तक के मुस्लिम लीग के लोग भी शामिल थे। गाँधी किसी भी कीमत पर देश का बंटवारा नहीं चाहते थे, फिर चाहे सत्ता की बागडोर मो. अली जिन्ना के हाथ में सौपनी पड़े। वह कामयाब नहीं हुए। यही कारण है कि आजादी के बाद गांधी का सुझाव था, अब कांग्रेस का काम समाप्त हो गया है, उसे भंग कर देना चाहिए। लड़ाई के अंत में देश का बंटवारा भी हुआ, सत्ता की बागडोर कांग्रेस के हाथ में आई। सत्ता सुख भोगने का अवसर मिला। कांग्रेस में केवल राजनीतिक आजादी मिल सकी, सामाजिक सांस्कृतिक आर्थिक और वैचारिक आजादी नहीं मिल पाई परिणामतः संघ के स्वयंसेवक विभाजन के खिलाफ अखंड भारत का उद्घोष करते रहे। कांग्रेस पार्टी खंडित भारत में सत्ता चलाती रही। अंग्रेजों के साथ पले बढ़े लोगों के हाथ में सत्ता चली गई, भारतीय संस्कार सिद्धांतों में न तो जोड़े गए और ना देश चलाने वालों की जीवन शैली में। जो भी हो किसी एक व्यक्ति या पार्टी को यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि देश की आजादी उनके कारण मिली है। क्योंकि जो उस समय मौजूद थे, उन्हीं का प्रत्यक्ष योगदान रहा था, एक बार अटल बिहारी बाजपेई से किसी ने कहा था, अपने आजादी की लड़ाई में कितना भाग लिया? तो उनका उत्तर था Òक्या यह हमारी गलती है कि हम जरा देर से पैदा हुएÓ। संभवतः कांग्रेस समेत आज के सभी राजनेताओं पर भी यह बात लागू होती है।



इस प्रकार हम देखते हैं कि आजादी की लड़ाई सम्पूर्ण देशवासियों द्वारा लड़ी गई थी, जिसमे मंगल पांडेय जैसे सैनिक, लाल-बाल-पाल जैसे गरम दल के नेता, मोहम्मद अली जिन्ना जैसे निर्दलीय मुस्लिम नेता, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, रामप्रसाद, बिस्मिल, असफाक उल्ला खां, चंद्रशेखर आजाद, राजेंद्र लाहिड़ी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे क्रांतिकारी विचारों वाले देश भक्त शामिल थे। इन्ही स्वतंत्रता सेनानियों में सम्मिलित थे विनायक दामोदर सवरकर, केशव बलिराम हेडगेवार, जैसे राष्ट्रवादी और सनातनी लोग। इनके साथ ही अशोक मेहता, राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन जैसे समाजवादी स्वनामधन्य नेता सामिल थे। कोई अकेली पार्टी उपरोक्त सभी किये गए प्रयासों और कामों का श्रेय नहीं ले सकती। वैसे यह इतिहासकरों की विषयवस्तु है कि देश की आजादी का इतिहास तटस्थ और निष्पक्ष भाव से स्कूल कालेजों में और देश के नौजवानों को बताया जाए।

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