भारत में अनाज के बंपर उत्पादन का मतलब है बंपर बर्बादी की तैयारी

हर साल बहुत बड़ी मात्रा में अनाज बर्बाद होता है, लेकिन इस समस्या का स्थायी समाधान खोजना कभी भी हमारी राजनीतिक प्राथमिकताओं में क्यों नहीं रहा, यह बात समझ से परे है।

भारत में अनाज के बंपर उत्पादन का मतलब है बंपर बर्बादी की तैयारी

मुझे अक्सर हैरानी होती है कि क्या हमारे देश के नीति निर्माता हाइवे बनाने के अलावा कुछ और नहीं सोच पाते? हर बार जब मैं सुनता हूं कि सरकार इन्फ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने के लिए पूंजी लगा रही है तो आखिर में यही पता चलता है कि बहुत बड़ी मात्रा में पैसा महज सुपर हाइवे बनाने में झोंका जा रहा है। मैं सड़कों के विकास के खिलाफ नहीं हूं लेकिन उनके अलावा भी ढेरों क्षेत्र हैँ जहां सार्वजनिक क्षेत्र के निवेश की जरूरत है।

पिछली बार 24 अक्टूबर 2017 को जब वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए आर्थिक पैकेज का ऐलान किया था तो उन्होंने 2022 तक 83,677 किलोमीटर सड़कें बनाने के लिए 6.92 लाख करोड़ रुपए देने की बात कही थी। इसके अलावा उन्होंने बैंकों के लिए 2.11 लाख करोड़ रुपए के पूंजी निवेश की भी घोषणा की थी। मूलत: यह पैसा बैंकों को उनके डूबे हुए कर्ज से उबारने के लिए दिया गया था, साथ ही इस संकट से निबटने के लिए 1.35 लाख करोड़ रुपयों के निवेश का वादा किया गया था, इसके अलावा उन्हें दूसरे स्रोतों से भी पैसा मिलना था।

पर अगर वित्त मंत्री ने इन 6.92 लाख करोड़ रुपयों में से 1 लाख करोड़ रुपए देश भर में खाद्य भंडार बनाने के लिए दिए होते तो हर साल जो खाद्यान्नों का विशाल भंडार बर्बाद होता है शायद उसकी समस्या हल हो जाती। गोदामों में सड़ रहे अनाज या पानी में डूबी अनाज से भरी बोरियों की तस्वीरें भुलाए नहीं भूलतीं। अन्न की बर्बादी की इस विशाल समस्या का स्थायी समाधान खोजना कभी हमारी राजनीतिक प्राथमिकताओं में क्यों नहीं रहा, यह मैं आज तक नहीं समझ पाया हूं।

अब इसी साल की बात लीजिए। इस साल गेहूं की रिकॉर्ड पैदावार हुई है। इस साल सरकार ने रिकॉर्ड गेहूं खरीदा भी। मेरी बात का भरोसा कीजिए समुचित भंडारण व्यवस्था के अभाव में इस साल अन्न की रिकॉर्ड बर्बादी भी होगी।

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देश में करीब 90 लाख टन अनाज खुले में पड़ा है।

इस साल पंजाब में गेहूं की सरकारी खरीद पिछले सभी आंकड़ों के पार 126.91 लाख टन रही। पड़ोसी हरियाणा में 87.39 लाख टन गेहूं खरीदा गया। मध्य प्रदेश में सरकारी एजेंसियों ने 72.87 लाख टन गेहूं की खरीद की। गेहूं का सरप्लस उत्पादन करने वाले इन तीनों राज्यों ने कुल मिलाकर 18 जून तक 287.17 लाख टन गेहूं खरीदा है। अब इन राज्यों के सामने इतनी अधिक मात्रा में खरीदे गए अनाज को सुरक्षित रूप से भंडारण करने का मुश्किल काम है।

पंजाब में, हाल ही में खरीदा गया करीब 70 लाख टन अनाज खुले में रखा जाएगा। पिछले साल का खरीदा गया करीब 20 लाख टन गेहूं का भंडार खुले में पड़ा है। दूसरे शब्दों में अकेले पंजाब में करीब 90 लाख टन गेहूं का स्टॉक असुरक्षित है। हरियाणा में, 44 लाख टन गेहूं भी खुले में स्टोर किया गया है जो अब मॉनसून की मार झेलेगा। लगभग 30 वर्षों से मैं देख रहा हूं कि किस तरह बेशकीमती खाद्यान्नों का लापरवाही से प्रबंधन हो रहा है। इसमें से बहुत बड़ी मात्रा में अनाज सड़ जाता है, जो अनाज बाहर स्टोर रहता है उसमें एफ्लाटॉक्सिन नाम की फफूंद लग जाती है और वह इंसानों के खाने के काबिल नहीं रह जाता। हालांकि, यह तथ्य उजागर नहीं किया जाता।

इस साल पंजाब और हरियाणा में खरीदे गए 215 लाख टन गेहूं में से करीब 134 लाख टन या आधे से अधिक खाद्यान्न अस्थायी भंडारगृहों में रखा गया है। आज से 52 साल पहले पंजाब और हरियाणा ने हरित क्रांति का नेतृत्व किया था, अगर इसके बाद भी अनाज के कटोरे कहलाने वाले ये राज्य अपने यहां समुचित गोदाम बनाने के लिए निवेश की गुहार लगा रहे हैं तो इससे साफ पता चल जाता है कि किस बेरहमी से अन्न की बर्बादी हो रही है। इससे यह भी पता चलता है कि फसल कटाई के बाद उसे नष्ट होने से बचाने के सारे उपदेश केवल किसान के लिए ही हैं, जबकि असल गुनाहगार तो सरकार है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स की 119 देशों की सूची में भारत सौवें पायदान पर है, ऐसे में अनाज की इस तरह बर्बादी जघन्य अपराध से कम नहीं है।

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पिछले कुछ समय में मध्य प्रदेश गेहूं का प्रमुख उत्पादक राज्य होकर उभरा है। हाल ही में प्रकाशित एक खबर में अधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि करीब 50 लाख टन गेहूं और दालों (मध्य प्रदेश में दालों की भी सरकारी खरीद होने लगी है) को खुले में रखना पड़ेगा। इस दौरान, उत्तर प्रदेश में भी 50 लाख टन से ज्यादा अनाज खरीदा गया, और पर्याप्त भंडारण सुविधाएं न होने से इसका अधिकतर हिस्सा भी खुले आसमान के नीचे रखा जाएगा। मैंने गांव कनेक्शन में ऐसी खबरें देखीं हैं जिनमें उत्तर प्रदेश में खाद्यान्न भंडारण के संकट का जिक्र किया गया है। बंपर उत्पादन होता है तो खाद्यान्न की बर्बादी भी बढ़ जाती है- बहुतायात का यह विरोधाभास बड़ा अजीब है जो खाद्य प्रबंधन के सभी नियमों को ताक पर रख देता है। मैं नहीं जानता कि नीति निर्माता अनाज की ऐसी भंयकर क्षति की ओर से कैसे आंखे फेर लेते हैं। आखिरकार अनाज के भंडार बनाना अंतरिक्ष विज्ञान जैसा कोई जटिल काम तो है नहीं।

पंजाब में 32 स्थानों पर 17.5 लाख टन गेहूं के भंडारण के लिए अनाज भंडार बनाने का प्रस्ताव था, पर भारतीय खाद्य निगम से गारंटी न मिल पाने की वजह से इसका काम अटका हुआ है। अगर ये भंडार बन भी गए तो समुद्र में एक बूंद भर साबित होंगे क्योंकि देश में करीब 90 लाख टन अनाज खुले में पड़ा है। इससे भी बढ़कर मुझे यह समझ नहीं आता कि कैसे पिछली सरकार देश भर में 2.5 लाख पंचायतों के लिए पंचायतघर बनवा सकती है, जबकि सबसे ज्यादा जरूरत गांवों में गोदाम बनाने की है। मुझे यह भी समझ नहीं आता कि सरकार देश में 100 जगहों पर अनाज के गोदाम बनाने की शुरूआत क्यो नहीं कर सकती? जब सरकार सड़कें बनाने के लिए 6.92 लाख करोड़ खर्च कर सकती है तो पंचायत घर की जगह उसे सड़ते हुए अनाज की चिंता क्यों नहीं है।

इससे साफ पता चलता है हमारे पास पैसे की कोई कमी नहीं है। अनाज का संरक्षण करना हमारी सरकारी नीति की प्राथमिकता नहीं है और यही हमारे रास्ते की सबसे बड़ी अड़चन है।

(लेखक प्रख्यात खाद्य एवं निवेश नीति विश्लेषक हैं, ये उनके निजी विचार हैं। ट्विटर हैंडल @Devinder_Sharma ) उनके सभी लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें )

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