समीक्षा- थोड़ा प्रगतिशील थोड़ा नीरस है बजट

समीक्षा- थोड़ा प्रगतिशील  थोड़ा नीरस है बजटयह बजट ग्रामीण जीवन के लिए जितना लेकर आया है, उतना युवाओं, स्वास्थ्य और व्यवसायियों के लिए नहीं।

डॉ. रहीस सिंह

वित्तमंत्री ने अपने बजट भाषण की शुरुआत में यह बताने का प्रयास किया कि मोदी सरकार ने अपने देश की शासन व्यवस्था में जो बदलाव किए हैं, वे ऐतिहासिक और अभूतपूर्व हैं।

उनका कहना था कि उन्होंने-स्वनिर्णय पर आधारित प्रशासन के स्थान पर नीति एवं व्यवस्था पर आधारित प्रशासन को अपनाया है, निर्णय लेने की प्रक्रिया में पक्षपात के स्थान पर पारदर्शिता को तरजीह दी है, एक विस्तृत और गैर-जिम्मेदार हकदारी के बजाय पूरी तरह निर्धारित सुपुर्दगी व्यवस्था को अपनाया है और अनौपचारिक अर्थतंत्र के बजाय एक औपचारिक व्यवस्था को अपनाया है। इसके साथ ही यह दावा किया गया कि मुद्रास्फीति पर काबू कर लिया गया। वित्त मंत्री जी के दावों को खारिज करना यदि उचित नहीं है तो पूरी तरह से स्वीकार कर पाना भी मुश्किल।

वित्त मंत्री ने अपने उपायों और भारतीय अर्थव्यवस्था को उनसे लगे झटकों को ढकने के लिए कहा कि वे ऐसे समय में बजट पेश कर रहे हैं जबकि पिछले एक वर्ष के दौरान दुनिया भर में बड़ी आर्थिक और राजनीतिक घटनाएं हुई हैं जिनके कारण वैश्विक आर्थिक व्यवस्था अत्यधिक अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा यह अनुमान लगाया गया है कि विश्व के सकल घरेलू उत्पाद में वर्ष 2016 में 3.1 प्रतिशत की और वर्ष 2017 में 3.4 प्रतिशत की वृद्धि होगी। उन्नत अर्थव्यवस्था वाले देशों में विकास की दर 1.6 से 1.9 प्रतिशत के बीच और उभरती हुई अर्थव्यवस्था वाले देशों में 4.1 प्रतिशत से 4.5 प्रतिशत के बीच होने की आशा है। वर्ष 2016 की तुलनात्मक रूप से निम्न प्रदर्शन के बाद अनेक उभरती हुई अर्थव्यवस्था वाले देशों में विकास की गति के वर्ष 2017 में फिर से पटरी पर आने की आशा है।

ये सब बातें आगामी वर्ष के अनुसार भरपूर संभावनाएं प्रस्तुत करने वाले सकारात्मक संकेत हैं। मुझे लगता है कि वित्त मंत्री ने विश्व अर्थव्यवस्था के संकेतकों को ठीक से देखा नहीं है और यदि देखा है तो उससे बचते हुए निकलने की कोशिश की है। असल बात तो यह है कि गत वर्ष वैश्विक आर्थिक संकेतकों में कहीं कोई नकारात्मक गतिविधियां नहीं दिखीं लेकिन नव वैश्विक परिवर्तनों, विशेषकर डोनाल्ड ट्रंप की संरक्षणवादी नीतियों, अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक युद्ध जैसी स्थिति, यूरोपीय संघ में बिखराव की प्रक्रिया और अमेरिकी फेड रिजर्व की अनुदार नीतियों (जैसा कि संकेत मिल रहा है) का शेष विश्व सहित भारत की अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

वित्तमंत्री ने उच्च मूल्य वर्ग के बैंक नोटों के विमुद्रीकरण पर विशेष फोकस किया और उसे अपनी सरकार साहसिक व निर्णायक पहल माना। उनका कहना था कि अनेक दशकों से कई लोगों के लिए कर वंचना उनकी जीवन शैली में शामिल हो गई है। इसके कारण जनता के व्यापक हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता रहा है। विमुद्रीकरण द्वारा एक नए क्षितिज का निर्माण हुआ जिसमें सकल घरेलू उत्पाद के विकास की दर तुलनात्मक रूप से अधिक होगी और अर्थव्यवस्था अधिक स्वच्छ व वास्तविक होगी।

सरकार इस पक्ष की तो शुरू से वकालत करती रही है, इसलिए बजट में इस विषय की पुनर्व्यंजना समझ से परे है। रही बात काले धन की तो नोटों की बैंक वापसी के आंकड़ों ने यह सिद्ध कर दिया है कि इससे आंशिक धन ही उस श्रेणी में आया है जिसकी वजह से सरकार ने पूरे देश को कतारों में लगा दिया। रही बात भ्रष्टाचार की तो, इस विषय पर सरकार को ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की ओर से जारी किए गए करप्शन परसेप्शंस इंडेक्स पर ध्यान देना चाहिए जहां भारत की रैंकिंग पिछले साल के मुकाबले तीन स्थान नीचे खिसक गई है। यानि भ्रष्टाचार बढ़ा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वयं सरकार द्वारा प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 में विमुद्रीकरण के नुकसान की बात स्वीकार की गई है जिसकी वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर लगभग एक प्रतिशत नीचे गिर गई है।

बजट में अगले वर्ष के लिए सरकार का एजेंडा टीईसी इंडिया अर्थात ट्रांसफार्म, इनर्जाइज एण्ड क्लीन इंडिया पर रहेगा। इसके तहत प्रशासन की गुणवत्ता और जनता के जीवन की गुणवत्ता में आमूल परिवर्तन लाना, युवाओं व कमजोर तबकों में शक्ति का संचार करना व उन्हें उनकी वास्तविक क्षमता को पहचानने में समर्थ बनाना और देश के भ्रष्टाचार, काला धन एवं अपारदर्शी राजनीतिक वित्तपोषण की बुराइयों को समाप्त करना है। इस दिशा में सरकार ने सबसे अधिक जोर किसानों एवं ग्रामीण आबादी पर दिया है। बजट में वित्त मंत्री ने इस संदर्भ में कहा है कि वे किसानों की आय को अगले पांच वर्षों में दोगुना करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। किसानों के लिए वर्ष 2017-18 के लिए कृषि ऋण हेतु लक्ष्य 10 लाख करोड़ निर्धारित किया गया है।

इसमें किसानों को सहकारी ऋण ढांचे से लिए गए ऋण सम्बंध में प्रधानमंत्री द्वारा घोषित 60 दिनों के ब्याज के भुगतान से छूट का लाभ भी प्राप्त होगा। लगभग 40 प्रतिशत छोटे एवं सीमांत किसान सहकारी ढांचे से ऋण करते हैं, इसलिए यह माना जा सकता है कि इससे किसानों को बड़ी राहत मिलेगी। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि इस श्रेणी में आने वाला किसाना जो तकावी प्रकार का ऋण लेता है वह फसल कटने के बाद ही उसे वापस कर पाता है और कोई भी फसल इस अवधि के अंदर कटकर नकदी में नहीं बदल पाती, इसलिए यह घोषणा निरर्थक है। फसल बीमा योजना के तहत वर्ष 2016-17 में फसल क्षेत्र के 30 प्रतिशत को कवरेज प्राप्त था जो वर्ष 2017-18 में 40 प्रतिशत और 2018-19 में 50 तक बढ़ाने की घोषणा की गयी है। यह कदम निश्चित तौर पर किसानों के लिए अधिक लाभदायक होगा।

वर्ष 2019 में महात्मा गांधी की 150वीं जयंती तक एक करोड़ परिवारों को गरीबी से निजात दिलाने, 50,000 ग्राम पंचायतों को गरीबी से मुक्त बनाने के लिए अंत्योदय मिशन शुरू करने का निर्णय एक बेहतर कदम माना जा सकता हे। मनरेगा के जरिए 5 लाख तालाबों का कार्य शुरू करने का निर्णय, महिलाओं की आबादी को इससे अधिक से अधिक जोड़ने का प्रयास और मनरेगा के लिए वर्ष 2017-18 के लिए बजट प्रावधान को पिछले वर्ष के 38,500 करोड़ के मुकाबले 48,000 करोड़ रुपये करना निश्चित तौर पर ग्रामीण सामाजिक आर्थिक संरचना के परिवर्तन में निर्णायक साबित हो सकता है। इसके साथ ही यदि इसमें 2019 तक 1 करोड़ मकानों को बनाने के लक्ष्य, दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना के तहत 1 मई 2018 तक 100 प्रतिशत ग्रामीण विद्युतीकरण के लक्ष्य को पूरा करने सम्बंधी प्रयास शामिल कर लिया जाए, तो बजट ग्रामीण जीवन के लिए सर्वाधिक अनुकूल जाता दिखेगा।

बहरहाल यह बजट ग्रामीण जीवन के लिए जितना लेकर आया है, उतना युवाओं, स्वास्थ्य और व्यवसायियों के लिए नहीं। मध्यम वर्ग को निश्चित तौर पर इससे निराशा हुयी होगी क्योंकि उसे उम्मीद थी कि बजट में प्रत्यक्ष कर स्लैब बढ़ाया जाएगा। सम्भव है कि वह 5 लाख की सीमा तक पहुंचा जाए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ लेकिन 3 लाख से 5 लाख की आय वालों को 10 प्रतिशत की बजाय 5 प्रतिशत कर देने की छूट देकर टच थेरेपी का काम सरकार ने किया है। अभी ऐसे बहुत से हिस्से हैं, जिन्हें एक साथ समायोजित करना मुश्किल है, लेकिन समग्रता में यह बजट दीर्घकालिक वैकासिक व्यवस्था जुड़ प्रतीत होता है जिसमें जोखिमों की काफी हद तक अनदेखी की गयी है।

(लेखक आर्थिक व राजनीतिक विषयों के जानकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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