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पहाड़ों पर बर्फबारी, मैदानों में शीतलहर, भविष्य उज्ज्वल है

गाँव कनेक्शन | Jan 19, 2017, 14:03 IST
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कई साल बाद देश के उत्तरी भाग कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड में लगातार बर्फबारी हो रही है। टीवी पर देखकर ठंड लगती है लेकिन उन सैलानियों को देखिए जो बर्फ के गोले एक दूसरे पर फेंकते और आनन्द लेते हैं। अनेक पर्यटकों की साल भर की मुराद पूरी होती है कि स्नोफाल देखने को मिल गया। सम्पर्क बनाकर रखते हैं जैसे ही स्नोफाल शुरू हो फोन करो और कुछ घन्टों में वे पहुंच जाते हैं। होटल, टैक्सी और दुकानदार भी इन्तजार करते हैं। वैज्ञानिको को ग्लोबल वार्मिंग से ग्लेशियर पिघने और पर्वतों के बंजर और नंगे होने का डर कुछ हद बर्फबारी से घटता है।

पिछले साल की भीषण गर्मी मे जो बर्फ पिघलकर नदियों के माध्यम से पानी बनकर समुद्र में चली गई थी, उसकी एक सीमा तक पूर्ति हो जाएगी। सड़कें और रास्ते बन्द होने की तकलीफ स्थानीय जनता को जरूर झेलनी पड़ रही होगी लेकिन सेना के जवानों को कुछ चैन मिली होगी आतंकवादियों की घुसपैठ से। आमतौर पर देखा गया है कि जाड़े के दिनों में आतंकवादी घटनाओं में कुछ कमी आती है।

जब बर्फबारी नहीं होती तो केवल सैलानी ही मायूस नहीं होते उससे कहीं अधिक मायूस होते हैं वहां के स्थानीय निवासी। पर्यटन से होने वाली आय को छोड़ भी दें तो गर्मियों में स्िप्रंग यानी सोते सूखने लगते हैं, पीने के पानी की कमी के साथ ही सिंचाई के लिए पानी न मिलने से भोजन के लाले पड़ जाते हैं। वहां की हवा में जो कीटाणु और जीवाणु पैदा हो गए हैं उन्हें नष्ट करने का यह प्राकृतिक उपाय है नहीं तो बीमारियां फैलने का डर बना रहता है।


कई दशक पहले जब मैं निउफाउन्डलैंड में था और कई साल बर्फबारी देखी थी तो पाया कि उनके लिए यह सामान्य बात है क्योंकि घरों में सेन्ट्रल हीटिंग सिस्टम रहता था और ठंड को धोखा देने के लिए ‘विंडचीटर।’ उनके लिए ये महीने स्केटिंग और स्कीइंग के लिए होते हैं। हमारे यहां केवल जाड़े की नहीं दूसरे मौसमों की भी समस्याएं हैं इसलिए हर मौसम के लिए तैयारी पर्याप्त नहीं हो पाती है। हर मौसम की मार गरीबों पर पड़ती है।

यदि पहाड़ों पर हिमनद यानी ग्लेशियर सामान्य से अधिक सूखने लगे और उनसे नदियों में पानी आना घट गया तो मैदानी इलाकों में तबाही मच जाएगी। वहां की मिट्टी की नमी घटने से वहां पर हरियाली नहीं रहेगी, वनौषधियां नहीं उगेंगी और इसीलिए वैज्ञानिकों को डर है पर्वत पथरीले रेगिस्तान बन जाएंगे। प्रकृति अपना इंतजाम करती है और उसने कई साल बाद अच्छी बर्फबारी कर दी है।

अपने देश के नैनीताल में 20 साल रहने का मौका मिला तो यहां भी जाड़ा वैसा ही था लेकिन जाड़े से निबटने के उपाय नहीं थे। फिर भी मैदानी इलाकों की अपेक्षा आग तापने और गर्म कपड़ों की व्यवस्था मैदानी इलाकों से बेहतर देखी। एक और अन्तर देखा कि हमारे पहाड़ों की महिलाएं जंगल से लकड़ी और जानवरों का चारा लाती हैं और आदमियों को ‘घमतपुआ’ कहते हैं यानी धूप तापने वाले।

जिस तरह बीमारियों के रोगाणुओं और कीटाणुओं को नष्ट करने के लिए पहाड़ों पर बर्फबारी जरूरी है उसी तरह मैदानी भागों में शीतलहर भी जरूरी है। बरसात के दिनों वाले कीट, पतिंगे, मच्छर, मक्खियां आदि की आबादी का नियंत्रण हो जाता है। जिन लोगों के पास पहनने ओढ़ने के लिए पर्याप्त कपड़े नहीं हैं उनकी कठिनाई जरूर बढ़ जाती है। ठंडे देशों के लोग इसके लिए तैयार रहते हैं और आसानी से झेल लेते हैं। परिस्थितियों से निबटने के लिए हमारी तैयारी भी रहनी ही चाहिए।

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