मीडिया पर हावी नेताओं की लफ्फाज़ी और इस पर धंधेबाज़ों का कब्ज़ा!
राष्ट्रीय व्यवस्था और उसके संचालन के लिए चार स्तंभ माने गए हैं, जिसमें पहला है लोकसभा और विधानसभाओं से बनी विधायिका। दूसरा स्तंभ इन सबको सहयोग देने वाली कार्यपालिका है, जो प्रशासनिक इकाई के रूप में काम करती है। इन दोनों स्तंभों के संविधान के अनुसार चलने पर निगरानी रखने वाली तथा समाज के विवादों को सुलझाने वाली न्यायपालिका तीसरा स्तंभ है, जिसमें निचले स्तर से लेकर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक सम्मिलित हैं। इस क्रम में चौथा स्तंभ है मीडिया, जिसका दायित्व है कि वह निष्पक्ष भाव से सभी को देखते और समझते हुए जनमानस तक समाचार पहुंचाए। मीडिया विविध रूपों में अनादि काल से चला आ रहा है और संदेशवाहक, पत्रवाहक से लेकर रेडियो और अब टेलीविजन तक पहुंचा है।
रामायण काल में श्री रामचंद्र जी के संदेशवाहक बनकर हनुमान जी लंका में सीता जी के पास गए थे। पहचान पत्र के रूप में उनके पास राम की मुद्रिका, यानी अंगूठी मौजूद थी, जिसे देखकर सीता जी ने वानर रूपी संदेशवाहक को पहचाना था। इसी प्रकार महाभारत काल में युद्ध को टालने के लिए श्री कृष्ण जी संदेशवाहक बनकर दुर्योधन के पास गए थे और कहा था कि यदि पांच गांव पांच पांडवों को दे दो, तो युद्ध टल सकता है। दुर्योधन नहीं माना और बोला, "सुई की नोक के बराबर भी जमीन नहीं दूंगा।" संदेशवाहक श्री कृष्ण निराश होकर पांडवों के पास वापस आ गए। यह शायद भारत की संदेश भेजने की प्राचीनतम परंपराएं रही होंगी।
संदेशवाहकों से डाक व्यवस्था तक का सफर
संदेशवाहक की परंपरा पृथ्वीराज और आल्हा के जमाने तक तो सीमित थी ही, बाद में भी चलती रही। इसका प्रमाण है यह कथन कि, "सुनकर बातें हलकारे की, धांधू गयो सनाका खाए।" उन दिनों लिखने-पढ़ने और पत्र भेजने का रिवाज नहीं रहा होगा क्योंकि देश में तब तक लिपि का विकास नहीं हुआ होगा। इसलिए मुगल काल में भी संदेश या आदेश (ज़ुबानी) भेजा करते थे। शाहजहां के जमाने में फरियादी स्वयं अपनी फरियाद लेकर राजमहल जाता था और घंटा बजाता था, तो बादशाह को खबर हो जाती थी कि फरियादी फरियाद लाया है। देश में अंग्रेजों की हुकूमत आई, तो उन्होंने अपनी सुविधा के लिए दूरसंचार माध्यमों का विस्तार किया। आवागमन के लिए रेलें तथा बसें चलाईं और यह सब जब श्री नीलम संजीव रेड्डी ने 1977 में अपने 'देश के नाम संदेश' में कहा था, तो लोगों को अच्छा नहीं लगा था। संदेश भेजने के लिए "गिट-गर" (टेलीग्राफ), इसका आविष्कार मारकोनी ने किया था अथवा जगदीश चंद्र बोस ने, यह डिबेट का विषय है; लेकिन इसके दो शब्द 'गिट' और 'गर' जिसके माध्यम से टेलीग्राफ द्वारा टेलीग्राम के रूप में बड़े-बड़े संदेश भेज दिया करते थे और लोग जल्दी से जल्दी समाचार पा जाते थे। बाद में अंग्रेजों ने 'पोस्ट एंड टेलीग्राफ' विभाग खोलकर चिट्ठी भेजने का प्रबंध किया और चिट्ठी वाहक-जिसे हलकारा या डाकिया कहते थे-एक बलम अर्थात लाठी के आगे नुकीला लोहा लगाकर खेतों की मेड़ों पर दौड़ता हुआ गांवों तक पहुंचता था।
कालांतर में रेडियो का आगमन हुआ और देश के कोने-कोने के समाचार प्रसारित होने लगे तथा सरकारी और दूसरे संदेश जन-जन तक पहुंचने लगे। मुझे याद है, सवेरे 8:00 बजे एक आवाज सुनाई पड़ती थी- "सवेरे के आठ बजे हैं, अब आप देवकीनंदन पांडे से समाचार सुनिए।" वह नामी-गिरामी समाचार वाचक थे और लोग बड़े ध्यान से उनके द्वारा सुनाए गए समाचारों को सुनते थे। इसी तरह बच्चों के प्रोग्राम होते थे। मुझे याद है कि मेरे बच्चे जब स्कूल जाते थे, तब रेडियो का एक कार्यक्रम था जो रात को 9:00 बजे के करीब आता था। वे दोनों बहुत उत्सुक रहते थे, लेकिन मैं शर्त लगाता था कि पहले अपना होमवर्क पूरा करोगे, तब अपना प्रोग्राम सुनोगे। बड़ी लगन से वे लोग अपना होमवर्क समय से पहले पूरा कर लेते थे और वह कार्यक्रम सुनते थे। इसी तरह 'विविध भारती' नाम का कार्यक्रम रेडियो पर आता था और बहुत ही पॉपुलर था। यह सब इसलिए बता रहा हूं कि इन सभी कार्यक्रमों में नकारात्मक सोच कहीं नहीं रहती थी। आज की तरह बातचीत का स्तर बहुत नीचा नहीं होता था और नेगेटिव प्रचार या विज्ञापन के बजाय रचनात्मक विचारों और कार्यक्रमों पर जोर रहता था।
टीवी पत्रकारिता और अंधविश्वास का बढ़ता प्रभाव
टीवी से बहुत अपेक्षाएं थीं और यह आशा की जाती थी कि केवल सच्चाई बताई नहीं जाएगी, सच्चाई दिखाई जाएगी। लेकिन आजकल टीवी पर ज्योतिषी लोग तरह-तरह की भविष्यवाणियां बताते हैं और लोग सुनते हैं। कितने ही चैनल सवेरा होते ही ज्योतिष का कार्यक्रम आरंभ कर देते हैं और इस देश को कर्मवादी बनाने के बजाय भाग्यवादी बनाने की चेष्टा हो रही है। एक बार अटल जी ने कहा था, "मैं जन्म कुंडली में विश्वास नहीं करता, कर्म कुंडली में विश्वास करता हूं।" लेकिन आज जिस प्रकार से भारतीय समाज को अंधविश्वास के रास्ते पर ले जाने का प्रयास हो रहा है, उसका परिणाम क्या होगा, भगवान ही जाने। जो संचार माध्यम यह सब दिखाते हैं, उनमें से कुछ लोग तो ऐसे होने चाहिए जो की गई भविष्यवाणियों का सत्यापन करें और समाज को बताएं; या फिर समाज से फीडबैक लें कि कितने प्रतिशत भविष्यवाणियां सत्य निकलीं और कितनी केवल लफ्फाज़ी की संज्ञा देने लायक हैं।
अब तो राजनेता भी भविष्यवक्ता बनते जा रहे हैं और कहते हैं कि अगले साल नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं रहेंगे या फिर भारत की अर्थव्यवस्था पर सुनामी आने वाली है; क्या आप ऐसी भविष्यवाणियों पर विश्वास करना चाहेंगे? मुझे एक कहानी याद आती है; कहते हैं कि एक टिड्डी अपने पैर ऊपर करके लेटी हुई थी, तो किसी दूसरे साथी ने पूछा कि ऐसा क्यों कर रही है? तो उसका जवाब था कि आसमान टूट जाएगा, आसमान गिर जाएगा तो मेरे अंडे टूट जाएंगे। उसने सोचा कि यदि आसमान गिरा, तो मैं उसे अपने पैरों पर रोक लूंगी! इसी तरह आज के नए भविष्यवक्ता कहते हैं कि मुझे प्रधानमंत्री बना दो, मैं एक दिन में देश की गरीबी मिटा दूंगा। टीवी पर यह कहते हुए दिखाया जाता है कि प्रधानमंत्री चोर है, प्रधानमंत्री ने देश बेच दिया; शायद ये टीवी वाले यदि नेता मां-बहन की गालियां बकें, उसे भी दिखाएंगे। आश्चर्य यह नहीं कि नेता लोगों का स्तर क्या हुआ है, बल्कि आश्चर्य यह है कि टीवी वाले यह सब दिखा पा रहे हैं। कल्पना कीजिए, क्या इंदिरा जी के प्रधानमंत्रित्व काल में कोई ऐसी आज़ादी का प्रदर्शन कर सकता था? और यदि करता, तो परिणाम क्या होता?
हम समाचार देखने के लिए टीवी खोलते हैं और सवेरे आरंभ होता है-दो नौजवानों ने एक नौजवान को मार डाला, किसी ने तेज रफ्तार गाड़ी चलाकर पांच लोगों को रौंद दिया, कुछ लोगों ने किसी के घर में घुसकर अपराध किया। अब आप सोचिए, इन समाचारों का उद्देश्य क्या है? इनमें न तो कुछ रचनात्मक बात है और न कुछ सीख देने वाली। यदा-कदा सरकारी कार्यवाही की बात तो बताई जाती है और समाज के कुछ लोगों द्वारा पीड़ित की मदद करने का समाचार भी बताया जाता है, लेकिन नकारात्मक समाचारों की भरमार रहती है। यदि एक रचनात्मक समाचार दिखाया भी गया, तो उसके बाद विज्ञापनों की झड़ी लग जाती है। मैं समझता हूं कि 3 मिनट के समाचार के बाद 5 मिनट का विज्ञापन होता है। एक समय था जब समाचार के बीच में रेडियो पर कोई विज्ञापन नहीं होते थे, क्योंकि रेडियो का काम दौलत कमाना नहीं हुआ करता था।
हमें शहरों में हड़ताल और नारेबाजी की तस्वीरें मीडिया में अक्सर दिखाई पड़ती हैं और उनका विषय रहता है-महंगाई, बेरोजगारी आदि। यह सब सत्य और उचित भी है, लेकिन गांवों में, जहां 70% आबादी रहती है, उनके बीच में जाने और उन लोगों का विचार जानने के लिए हमारा मीडिया ज़हमत नहीं उठाता। शहरी लोगों को सफेदपोश (व्हाइट कॉलर) वाली नौकरी चाहिए, लेकिन उन्हें हिंदी और अंग्रेजी का इमला (Dictation) बोलकर तो देखिए! किसी स्कूल में घुस जाइए, परिषदीय विद्यालय में, और छात्रों के साथ बात करिए, उन्हें इमला दीजिए और देखिए कि वे कितना लिख पाते हैं। क्या ऐसे छात्र और नवयुवक सफेदपोश नौकरी के काबिल बनाए जा सकते हैं? बेकार घूम रहे लोगों में डॉक्टर और इंजीनियर भी हैं, टेक्नीशियन भी हैं, लेकिन उन्हें शहर में नौकरी चाहिए और सरकार को भी शहर में नौकरी देना शायद आसान होता है। यदि नहीं, तो कल-कारखाने, विश्वविद्यालय, कंपनियों के दफ्तर गांवों में क्यों नहीं खोले जाते? यदि गांवों में रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जाएं, तो ग्रामीणों की बेरोजगारी भी घट सकती है। गांवों में चाहिए अच्छे बढ़ई, लोहार, दर्जी, कुम्हार और ऐसे ही नाना प्रकार के कामों के जानकार; क्या इन सब के लिए हवाई अड्डे की आवश्यकता होती है? गांवों में अच्छे कारीगर इन विषयों को लेकर ढूंढने से नहीं मिलते और जो मिलते हैं, वे आज अपने ज्ञान में अधकचरे हैं। हमारी शिक्षा प्रणाली में क्या सुधार किए जाएं कि समाज के लिए प्रत्येक क्षेत्र में उपयोगी काम करने वाले लोग तैयार हों और आंखें बंद करके डिग्री लेकर बेरोज़गार आगे न बढ़ते चले जाएं? नियोजित शिक्षा प्रणाली ही बेरोजगारी पर नियंत्रण पा सकती है। हमारा मीडिया इन सब बातों का-चाहे बेरोजगारी हो या महंगाई-विस्तार से वर्णन करता है, लेकिन उसके कारणों में नहीं जाता और सोचता है कि सारी जिम्मेदारी सरकार की है; तो फिर राष्ट्र निर्माण का चौथा स्तंभ उपयोगी कैसे बनेगा
ग्रामीण शिक्षा, रोजगार और मीडिया की जिम्मेदारी
गांवों की समस्याएं, उनके समाधान, वहां पर शिक्षा-चिकित्सा की व्यवस्था और ऐसे ही तमाम समाचारों की मीडिया में उपेक्षा रहती है। यह सच है कि स्कूलों में फीस माफ है, ड्रेस और किताबें मुफ्त दी जाती हैं, लेकिन शिक्षा का स्तर क्या है, इसका इंस्पेक्शन (निरीक्षण) या तो होता ही नहीं और यदि होता है, तो वह औपचारिकता मात्र है। स्कूलों के पक्के भवन बनाने, साज़-सज्जा देने और शहरी अध्यापक नियुक्त करने से शिक्षा का स्तर नहीं सुधरने वाला। चिकित्सा के लिए प्राथमिक चिकित्सालय तो खोले गए हैं, लेकिन उनमें डॉक्टर और नर्स आते हैं या नहीं, इसे देखने वाला कोई नहीं। अब प्रधानों को कुछ दायित्व देने की बात है, तो संभव है कि उसमें ये समस्याएं और विषय सम्मिलित हों, तब कुछ राहत हो सकती है। मीडिया में इस बात पर चर्चा नहीं होती कि ग्रामीण अपना गेहूं ₹25 प्रति किलो बेचता है और उससे बना हुआ दलिया ₹50-60 प्रति किलो के भाव से खरीदता है। इसी प्रकार बाकी सभी ग्रामीण उत्पादों की हालत है और ग्रामीण खैरात पर जीवित रहता है। उसके स्वभाव में 'उत्तम खेती, मध्यम बान' वाला विचार कभी नहीं आता। वह अपने बच्चों को नौकरी दिलाना चाहता है, लेकिन ग्रामीण शिक्षा और गरीबी उसे आगे बढ़ने नहीं देती। इन विषयों पर चिंतन और लेखन बहुत कम देखने को मिलता है; इसके बगैर 70% आबादी की बेरोजगारी दूर नहीं हो सकती।
मीडिया विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की स्थिति पर खूब चर्चा करता है, लेकिन चौथा स्तंभ होने के नाते अपना आत्म-विश्लेषण नहीं करता। यह सच है कि इंदिरा जी के जमाने वाले अंकुश में चलने वाला मीडिया अपना दायित्व नहीं निभा पाएगा, जब साहसी संपादकों ने संपादकीय की जगह खाली छोड़ दी थी। लेकिन यह भी सच है कि वर्तमान स्वच्छंद और निरंकुश वातावरण में भी मीडिया अपना दायित्व नहीं निभा सकेगा, जहां पर खुलेआम गाली-गलौज, गैर-जिम्मेदाराना बातचीत, उदंड व्यवहार और अवांछित कार्यक्रम होते रहते हैं; और मीडिया उन्हें रिपोर्ट तो करता है, लेकिन उनके गुण-दोष के आधार पर मूल्यांकन नहीं करता। इस प्रकार वह अपने कर्तव्य का निर्वाह नहीं कर पा रहा है। फिर चाहे उसे आप 'गोदी मीडिया' कहिए या फिर 'डरपोक मीडिया' कहिए। डरपोक तो नहीं है, अन्यथा खुलेआम यह सब नहीं छापा या दिखाया जाता जो पचने योग्य नहीं है। मीडिया को अपने धर्म का पालन करने के लिए अपना व्यवहार और कृतित्व निश्चित करना होगा।