एक देश, एक कानून: कितना व्यावहारिक है समान नागरिक संहिता का विचार? कैसे तय होगा इसका स्वरूप?
देश की नागरिक संहिता के विषय में देशवासी एकमत नहीं हैं। कुछ का मानना है कि देश में समान नागरिक संहिता लागू की जाए, तो वहीं कुछ अन्य लोग सर्वधर्म समभाव के पक्षधर प्रतीत होते हैं। हिंदू समाज के बहुत से लोग देश में हिंदू राष्ट्र की स्थापना करना चाहते हैं, लेकिन यह भी उतना आसान नहीं प्रतीत होता। देश का मुस्लिम समाज अपना शरीयत कानून लागू करना चाहता है, जो बहुसंख्यक हिंदू समाज को स्वीकार नहीं होगा। सर्वमान्य नागरिक संहिता के लिए आवश्यक है कि विभिन्न समाज “गिव एंड टेक” (लेने-देने) की भावना से काम करें और सभी धार्मिक परंपराओं में जो अच्छी बातें हैं, उन्हें स्वीकार किया जाए तथा जो वर्तमान वैज्ञानिक युग में अमान्य प्रतीत होती हों, उन्हें न माना जाए।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: सनातन सोच और विभाजन का दंश
हमारे देश के मूल निवासियों के चिंतन को 'सनातन सोच' कहा जाता है। समय के साथ इस देश में शक, हुण, यवन आदि आते गए और उनका मूल निवासियों के साथ कभी संघर्ष नहीं हुआ। कालांतर में सनातन या हिंदू विचारकों की नई शाखाएं बनीं, जिनमें बौद्ध, जैन, आर्य समाज, ब्रह्म समाज आदि अनेक वर्ग सम्मिलित हैं और उनके साथ भी सभी का सह-अस्तित्व रहा। लेकिन जब इस देश में इस्लाम को मानने वाले मुस्लिम समाज का आगमन हुआ, वह भी एक आक्रांता के रूप में, तब उनके साथ सनातन का सामंजस्य नहीं बन पाया। इसका कारण यह था कि भारतीय सोच दया, क्षमा, शांति और अहिंसा के सिद्धांतों पर आधारित थी, जबकि इस्लाम का विस्तार शक्ति, संघर्ष तथा तलवार के बल पर हुआ था। बाद में अंग्रेजों के शासन के अंतर्गत भारत के मूल निवासी और मुस्लिम समाज, दोनों को ब्रिटिश हुकूमत में रहना पड़ा, लेकिन वे अलग-अलग कौमों के रूप में ही रहते रहे। जब देश की आजादी का समय आया, तो मुस्लिम समाज के बहुत से लोगों ने कहा कि उन्हें अलग देश चाहिए। मोहम्मद अली जिन्ना ने कहा था कि हिंदू और मुसलमान के रीति-रिवाज, धार्मिक मान्यताएं और उनके नायक सब अलग-अलग हैं, इसलिए हिंदू और मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते। यह गांधी जी के विचारों के बिल्कुल विपरीत था, जो नहीं चाहते थे कि भारत का बंटवारा हो और दोनों समाज अलग-अलग देशों में रहें। परस्पर अविश्वास के कारण द्वि-राष्ट्रवाद का जन्म हुआ, जिसके फलस्वरूप पाकिस्तान बना, जहाँ इस्लामिक नागरिक संहिता बनाने में कोई कठिनाई नहीं हुई।
भारत में यह तय करने में बहुत कठिनाई होती रही है कि सारे देश के लिए नागरिक संहिता कैसी हो। इसीलिए हमारे संविधान में यह इच्छा जाहिर की गई है कि किसी धर्म या वर्ग के बजाय सबके लिए 'समान नागरिक संहिता' लागू करने का प्रयास किया जाएगा। यदि गांधी जी की बात मान ली गई होती, तो शायद हिंदू-मुस्लिम समाज के बीच की दूरी घट जाती और सामंजस्य आसान रहता। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। 1946 में “सेपरेट इलेक्टोरेट” (पृथक निर्वाचन मंडल) के अंतर्गत हुए चुनाव में मुस्लिम लीग ने सभी मुस्लिम सीटें जीत लीं और कांग्रेस के सभी मुस्लिम उम्मीदवार हार गए। नतीजा यह हुआ कि अंतरिम सरकार में मुस्लिम समस्याओं पर कांग्रेस का पक्ष रखने वाला कोई मुस्लिम प्रतिनिधि था ही नहीं। इसके बाद विभाजन के फलस्वरूप लाखों लोग पूर्वी या पश्चिमी पाकिस्तान चले गए और जो बचे, वे या तो इस जमीन से लगाव के कारण अथवा अपनी परिस्थितियों के कारण यहीं रुक गए। इस तरह भारत में पाकिस्तान से भी बड़ा मुस्लिम समाज बना रहा। पाकिस्तान के लोगों को अब शायद अपनी भूल का एहसास हो रहा होगा। मौलाना अबुल कलाम आजाद ने जिन्ना को विभाजन से पहले समझाने का प्रयास भी किया था कि यदि बंटवारा नहीं होगा, तो अविभाजित देश के अंदर मुसलमानों की ताकत ज्यादा रहेगी और बंटवारे के बाद वह घट जाएगी, लेकिन जिन्ना की समझ में यह बात नहीं आई। बंटवारे के बाद आम आदमी ने यही समझा होगा कि पाकिस्तान मुसलमानों का और हिंदुस्तान हिंदुओं का देश बनेगा, लेकिन हमारे नेता दूरदर्शी थे। विशेषकर नेहरू, गांधी और पटेल ने इस देश को एक धर्मनिरपेक्ष (सेकुलर) राष्ट्र बनाया और सेकुलर आधार पर समान नागरिक संहिता की नींव डाली। यह बात अलग है कि परस्पर विरोधी मानसिकता होने के कारण भारत में बचे हुए मुसलमानों के साथ हिंदुओं का पूर्ण सामंजस्य नहीं बन पाया, क्योंकि इस्लाम के मानने वाले यह मानते हैं कि जो इस्लाम को नहीं मानता, वह काफिर है। दूसरी ओर, हिंदू 'वसुधैव कुटुंबकम्' को मानता है; यहीं से असहिष्णुता, अविश्वास और असहज जीवन का जन्म होता है। अनेक मुस्लिम विद्वानों ने यह प्रस्ताव रखा कि उनकी तरफ से यह घोषित कर दिया जाए कि भारत के हिंदू काफिर नहीं हैं, अन्यथा मुसलमान और काफिर कभी भाई-भाई नहीं हो सकते।
अब समय आ गया है कि बीच का रास्ता निकालना ही होगा, और वह रास्ता संविधान की भावना के अनुसार 'मार्कसमान नागरिक संहिता' का होगा या फिर 'सर्वधर्म समभाव' का। यदि कुछ भी नहीं बना, तो बहुसंख्यक हिंदू समाज 'हिंदू राष्ट्र' की आवाज उठाता रहेगा। सभी परिस्थितियों में चुनौतियां हैं, लेकिन स्थिति में बदलाव तो लाना ही पड़ेगा। अभी हाल ही में मुस्लिम समाज ने बकरीद के समय जब यह घोषणा की कि वे गाय का वध नहीं करेंगे और सड़क पर नमाज नहीं अदा करेंगे, तथा यहाँ तक कहा कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए, तब यह भाईचारे की तरफ एक बड़ा कदम था। ऐसे अनेक कदम दोनों तरफ से उठाए जाएंगे, तो समान नागरिक संहिता लागू करना आसान हो जाएगा। कठिनाई यह है कि कुछ हिंदू नेता गाय को केवल 'पशु' मानने को तैयार नहीं हैं, क्योंकि वे कहते हैं कि गाय के साथ हमारा नाता माता और पुत्र का है। यह परिकल्पना संपूर्ण देश स्वीकार कर लेगा, इसमें संदेह है। इसलिए मुस्लिम समाज द्वारा लाया गया प्रस्ताव स्वीकार कर लेना चाहिए, भले ही गाय को पशु कहने के बजाय 'राष्ट्रीय प्राणी' अथवा 'राष्ट्रीय जीव' कहा जाए।
स्वतंत्रता के बाद के प्रयास और कानूनगत विसंगतियाँ
आजादी के समय देश की कोई एक नागरिक संहिता नहीं थी और अभी भी नहीं है। यदि देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू प्रयास करते, तो उसी समय समान नागरिक संहिता लागू हो सकती थी। लेकिन उन्होंने जो प्रयास 1956 में किया, उसके परिणाम स्वरूप हिंदू समाज में तो सुधार हुआ और जातीय भेदभाव घटा, जब उन्होंने 'हिंदू कोड बिल' लागू किया। वास्तव में हिंदू कोड बिल डॉ. आंबेडकर 1951 में ही लागू कराना चाहते थे, लेकिन तब वह संभव नहीं हो पाया था। जब 1956 में हिंदू कोड बिल बना, तो मुस्लिम समाज को शरीयत कानून पर चलने की छूट दे दी गई और वह छूट 'पर्सनल लॉ' के रूप में बनी रही। हालांकि, फौजदारी (क्रिमिनल) कानूनों को शरीयत के हिसाब से चलाने का मुस्लिम समाज ने आग्रह नहीं किया, जिसमें चोरी के लिए हाथ काटना, कोड़े लगाना और बड़े अपराधों में सिर धड़ से जुदा करने जैसी सजाएं होती हैं। लेकिन सिविल कानून, जिन्हें पर्सनल कानून कहा गया, वे पूरी तरह पर्सनल नहीं थे; चाहे वह बहुविवाह हो, तलाक हो या गुजारा भत्ता, इन सभी कानूनों का सीधा सरोकार समाज से होता है। इनमें सुधार करने का एक बड़ा मौका उच्चतम न्यायालय ने राजीव गांधी के प्रधानमंत्री काल में दिया था, जब 'शाहबानो प्रकरण' में तीन तलाक को अमान्य ठहराते हुए गुजारा भत्ता देने का आदेश पारित किया गया था। लेकिन तत्कालीन सरकार ने उच्चतम न्यायालय के फैसले को ही कानून बदलकर निरस्त कर दिया और 'तलाक, तलाक, तलाक' कहकर विवाह विच्छेद करने की कुप्रथा मुस्लिम समाज में बनी रह गई, जो अब जाकर समाप्त हुई है।
इन्हीं राजनीतिक परिस्थितियों के बीच, इंदिरा जी के प्रधानमंत्रित्व काल में संविधान की प्रस्तावना में 'सेकुलर' (पंथनिरपेक्ष) और 'समाजवाद' शब्दों को जोड़ा गया, लेकिन नागरिक संहिता को अनेक लोग फिर भी सर्वधर्म समभाव के रूप में ही देखते और समझते रहे। एक सेकुलर देश में 'सर्वधर्म समभाव' की अवधारणा थोड़ी अटपटी लगती है, क्योंकि सेकुलर का तात्पर्य ही यह होता है कि सरकार का सरोकार किसी धर्म विशेष से नहीं रहेगा; ऐसे में सरकार सभी धर्मों को एक समान (धार्मिक दृष्टिकोण से) बढ़ावा कैसे दे सकती है? परिणाम यह हुआ कि न तो समान नागरिक संहिता बन सकी और न ही सर्वधर्म समभाव की अवधारणा पूरी तरह स्वीकार्य हो पाई। सनातनी लोग तो एक बार के लिए सर्वधर्म समभाव को मान सकते हैं, क्योंकि सिद्धांत रूप में उनका मानना है- “सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया।" लेकिन इस्लाम धर्म के मानने वालों के लिए सर्वधर्म समभाव की कल्पना कठिन होगी, क्योंकि वहां अन्य धर्मवलंबियों को काफिर कहा गया है, जिसकी धार्मिक व्याख्याएं अलग हैं। अब हमारे देश में समान नागरिक संहिता कैसे बनेगी और उसका स्वरूप क्या होगा, यह एक अत्यंत जटिल प्रश्न है।
वर्तमान चुनौतियाँ और भविष्य का मार्ग: समान नागरिक संहिता बनाम हिंदू राष्ट्र
नागरिक संहिता का समाधान देश की आजादी के साथ ही हो जाना चाहिए था, क्योंकि जब हमने देश का बंटवारा स्वीकार किया और पाकिस्तान में इस्लामी कानून लागू हुए, तो बहुतों को यह लगा होगा कि भारत में हिंदू कानून लागू होने चाहिए। आखिर पाकिस्तान के हिंदुओं ने वहां के कानूनों का पालन किया और वहां रहते रहे, तो हमारे देश में भी मेजॉरिटी (बहुसंख्यक) के कानून को लागू किया जा सकता था; अन्यथा गांधी जी के अखंड भारत के सिद्धांत पर अधिक दृढ़ रहना चाहिए था। वैसी स्थिति में चाहे जितना संघर्ष होता, लेकिन वह उस खून-खराबे से कम ही होता जो बंटवारे के बाद हुआ। यह एक विचित्र व्यवस्था थी कि पाकिस्तान में तो इस्लामी कानून चलेंगे, लेकिन भारत में सेकुलर कानून होंगे; और सारे देश में सेकुलर कानून भी केवल हिंदुओं के लिए लागू होंगे, जबकि मुस्लिम समाज को बहुत से मामलों में छूट रहेगी। इसका परिणाम आजाद भारत में असहज संबंध, निरंतर संघर्ष और दंगे-फसादों के रूप में सामने आया। कठिनाई तब आती है जब हिंदू समाज वर्तमान आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए सती प्रथा और बाल विवाह जैसी अनेक कुरीतियों को कानूनन समाप्त कर देता है, लेकिन मुस्लिम समाज अपने पर्सनल लॉ में कोई परिवर्तन नहीं करना चाहता, क्योंकि उनका मानना है कि उनका कानून इंसानों ने नहीं बनाया और जिसे ईश्वर ने बनाया है, उसे बदला नहीं जा सकता।
सामाजिक समन्वय के लिए कोई न कोई व्यावहारिक तरीका तो निकालना ही होगा, क्योंकि दुनिया के अधिकांश देशों में बहुसंख्यक आबादी का सामाजिक ढांचा ही उनके देश की नागरिक संहिता का आधार बनता है, फिर चाहे वह इस्लामिक देश हों या ईसाई देश। अब भारत के पास विकल्प रहेगा— 'समान नागरिक संहिता' अथवा 'हिंदू राष्ट्र'। इन दोनों में 'समान नागरिक संहिता' निश्चित रूप से एक बेहतर और लोकतांत्रिक व्यवस्था होगी। गांधी जी का 'रामराज्य' भी एक विकल्प हो सकता है, लेकिन आधुनिक प्रजातांत्रिक व्यवस्था में इसे इसके मूल स्वरूप में स्वीकार किया जाना कठिन है। वैसे रामराज्य के बारे में कहा गया है: “दैहिक दैविक भौतिक तापा, राम राज काहूहि नहिं ब्यापा।” यदि ऐसा संभव हो कि देश के किसी भी नागरिक को दैहिक, दैविक और भौतिक कष्ट न झेलना पड़े, तो इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता। परंतु वर्तमान समय की लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह सीधे तौर पर सर्वमान्य नहीं होगा; वह राजतंत्र का समय था जब जनता की औपचारिक राय लेने की आवश्यकता नहीं होती थी। अतः प्रजातांत्रिक व्यवस्था के रहते हुए समान नागरिक संहिता का लक्ष्य ऐसा होना चाहिए, जिसमें देश के सभी धर्मावलंबियों की मान्यताओं की अच्छी बातों को स्वीकारते हुए जनहित का ध्यान रखा जाए। यह संहिता समता, समानता और आधुनिक न्यायशास्त्र पर आधारित होनी चाहिए, जो सही मायनों में पूरे देश के लिए एक समान नागरिक संहिता के रूप में काम कर सके।