वंदे मातरम : आजादी के समय सबसे प्रेरक रहे गीत का विरोध अनुचित और अनैतिक

Dr SB Misra | Sept 15, 2026, 16:05 IST
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वंदे मातरम गीत को राष्ट्रगान क्यों नहीं बनाया गया? यदि थोड़े से अल्पसंख्यकों की आपत्ति के कारण इसे राष्ट्रगान नहीं बनाया गया, तो यह प्रजातंत्र का घोर अपमान था। यदि बंटवारे के बादभी आधे-अधूरे गीतको राष्ट्रगीत माना गया, तो और भी दु:खद रहा था। यहगीत आजादी में सबसे बड़ा प्रेरक था और कुछ चंद लोगों की आपत्ति के कारण कई पद्यांशहटा देना, वो भी बिना रचयिता की अनुमति के, यह अपराध कहा जाएगा।

1875 में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखित वंदे मातरम गीत कांग्रेस के जन्म के पहले का है, क्योंकि कांग्रेस की स्थापना 1885 में एक अंग्रेज अधिकारी सर एओ ह्यूम के द्वारा की गई थी। कांग्रेस का जन्म आजादी के लिए नहीं हुआ था, बल्कि अंग्रेज शासक और भारतीय प्रजा के बीच संबंध सुधारने के लिए हुआ था। वंदे मातरम का उद्गार भारत की आत्मा की आवाज थी और वंदे मातरम कहकर असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों ने, फिर चाहे भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, अशफाक उल्ला खान, राम प्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद और ऐसे ही अनगिनत योद्धाओं ने आजादी के लिए अपनी प्राणों की आहुति दी थी।



बाद के वर्षों में, कांग्रेस पार्टी ने वंदे मातरम को आजादी की लड़ाई का उद्घोष मानते हुए, इसे प्रमुख गीत माना था। जो गीत देश के कोने-कोने में हर व्यक्ति की जुबान पर जोश भरता था। कोई कारण नहीं कि उसे राष्ट्रगान ना बनाया गया होता। यह इतिहासकार बता सकते हैं कि इस गीत को राष्ट्रगान क्यों नहीं बनाया गया, यदि थोड़े से अल्पसंख्यकों की आपत्ति के कारण इस गीत को राष्ट्रगान नहीं बनाया गया, तो यह निश्चित रूप से प्रजातंत्र का घोर अपमान हुआ था। यदि बंटवारे के बाद भी आधे-अधूरे गीत को राष्ट्रगीत माना गया, तो और भी दु:खद रहा था। यह गीत आजादी में सबसे बड़ा प्रेरक था और कुछ चंद लोगों की आपत्ति के कारण कई पद्यांश हटा देना, वो भी बिना रचयिता की अनुमति के, यह अपराध कहा जाएगा।



यदि हम किसी काव्य रचयिता के गीत को आधा-अधूरा काट छांटकर सम्मान देते हैं, तो यह मान्य नहीं हो सकता। यह सराहनीय है कि 80 साल के बाद हमारी सरकार ने उस भूल का सुधार किया और राष्ट्रगीत को उसकी संपूर्णता में स्वीकार किया। अब यह देश की सबसे बड़ी पंचायत या सांसद द्वारा पारित नियम है इसलिए इसको मानना सबके लिए बाध्य है। फारूख अब्दुल्ला और उनके बेटे तथा वर्तमान में कश्मीर के मुख्यमंत्री, ने पूरे राष्ट्रगीत के समय खड़े रहकर इसके प्रति सम्मान व्यक्त किया, बल्कि यह भी कहा कि यह संसद का आदेश है और जो नहीं मानते, उनके लिए कहा, जब आपकी सरकार बने तो बदल देना।



जहां तक राष्ट्रगीत में आए शब्दों की बात है तो उनको लेकर आपत्ति नहीं होनी चाहिए, क्योंकि किसी धर्म विशेष के लोग यदि मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं करते तब उन्हें विविध कार्यक्रमों में लगाई जाने वाली भारत माता की तस्वीर के बारे में भी आपत्ति हो सकती है। जिस किसी देश में हम जाएं, तो वहां के राष्ट्रीय प्रतीक और राष्ट्रगान, वहां की बहुसंख्यक आबादी के आधार पर निर्धारित होंगे, ना कि अल्पसंख्यक आबादी के अनुसार, क्योंकि तब यह प्रजातंत्र का अनादर होगा। जब यही अल्पसंख्यक आक्रांता के रूप में आए थे और अपने आस्था के अनुसार मूर्तियां बर्दाश्त करने से परहेज किया था, मूर्तियां तोड़ी थीं, मंदिर तोड़े थे, लेकिन तब हालत दूसरी थी। देश का बहुसंख्यक समाज स्वतंत्र नहीं था, बंटा हुआ था और गुलाम बनने के लिए मजबूर था। कम से कम अब तो 80% आबादी की बात मानी जानी चाहिए।



जहां तक राष्ट्रगीत में शब्दों का सवाल है, तो राष्ट्रगान में भी कुछ ऐसे शब्द हैं, जिन पर आपत्ति हो सकती है दूसरे लोगों को। हमारे राष्ट्रगान में एक शब्द आता है अधिनायक, जिसका मतलब है तानाशाह। तो हमारे देश में तानाशाही की व्यवस्था 1975 के अलावा कभी नहीं रही। कुछ लोगों का मानना है कि रवींद्रनाथ टैगोर ने यह गान जॉर्ज पंचम के स्वागत में किया था लेकिन दूसरे लोग यह मानते हैं कि यह सत्य नहीं है और स्वयं टैगोर ने इसका प्रतिवाद किया था। इसी तरह राष्ट्रगान में एक शब्द आता है-पंजाब, सिंधु, लेकिन सिंधु तो हमारे देश में है नहीं, पाकिस्तान का भाग है और पंजाब भी आधा-अधूरा है, और बाकी पाकिस्तान के पास है। यदि उस समय के कर्णधारों ने अधिनायक शब्द को ईश्वर के लिए माना हो, तो सबको मान्य नहीं होगा।



जो भी हो अब संसद के द्वारा राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान दोनों स्वीकार किए गए हैं और उनका अनादर दंडनीय अपराध माना जाएगा। मैं समझता हूं प्रजातंत्र में विश्वास रखने वाले लोग संसदीय व्यवस्था का विरोध नहीं करेंगे और जैसा फारूख अब्दुल्ला साहब ने कहा, यदि आपकी मेजॉरिटी हो जाए, तो उसे बदल दीजिएगा। अब तो ना राष्ट्रगान और ना राष्ट्रगीत में प्रयोग किए गए शब्दों की व्याख्या की आवश्यकता है और ना कोई औचित्य। अब संसद के निर्णय को फिर चाहे वह आजाद भारत की पहले सांसद ने लिया हो या फिर वर्तमान सांसद ने, हमें यथावत स्वीकार करना चाहिए और अशांत की गुंजाइश ना बने, इसका प्रयास तो होना ही चाहिए।



राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान की ही बात नहीं है, दूसरे अनेक राष्ट्रीय प्रतीक हैं जिनका यथोचित सम्मान होना चाहिए। पहले हमारे देश में पशुओं में शेर को राष्ट्रीय पशु माना जाता था, लेकिन अब टाइगर को माना जाता है। इसी प्रकार पक्षियों में मोर चाहे नर हो या मादा यानी पीकॉक को राष्ट्रीय पक्षी माना जाता है, लेकिन बहुत से लोग गाँव में विशेष कर मोर को पलते हैं, शायद यह सोचकर कि मोर सांपों को खा जाता है और उनकी रक्षा करता है, लेकिन मुख्य कारण तो उसके पंखों की सुंदरता और उसके दुर्लभ उपलब्धता रही होगी। पुराने समय में भगवा ध्वज हमारे देश का राष्ट्रीय ध्वज माना जाता था, लेकिन अब तिरंगा और बीच में अशोक चक्र हमारा राष्ट्रध्वज है। यह देखकर कई बार कष्ट होता है कि झंडे के रंगों का झोला बना लेते हैं, वैसे तो राष्ट्रीय ध्वज में लपेटकर जीवन की अंतिम यात्रा राष्ट्र के सपूतों के लिए सौभाग्य और बलिदान का चिन्ह होती है।



आवश्यकता इस बात की है कि देश के समस्त निवासी संविधान के अनुसार जीवन बिताते हुए संसद द्वारा पारित नियमों और आदेशों का पालन किया करे। प्रत्येक देश में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक आबादी रहती है। जिनको शांति और सद्भाव के साथ जीवनयापन करना होता है। प्रजातांत्रिक व्यवस्था में अल्पसंख्यक समुदाय की आस्था का सम्मान तो होता है, लेकिन अल्पसंख्यक आस्थाओं के आधार पर राष्ट्रनीति निर्धारित नहीं होती, यह दु:खद है कि हमारे देश में कुछ लोगों का मानना है कि सम्पति पर अल्पसंख्यकों का पहला अधिकार है। या फिर बहुसंख्यकों के लिए हिन्दू कोड बिल और अल्पसंख्यकों के लिए सरिया कानून चल सकते हैं, यह न तो न्याय संगत है, न तर्कपूर्ण। सम्पूर्ण देश के लिए एक भारतीय कोड बिल बनाया गया होता, तब न तो राष्ट्रगीत पर बहस होती और पर्सनल कानून की बात आती। सेकुलर प्रजातांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण ढंग से रहना हो, तो कानून के रास्ते में मजहबी कानून नहीं आने चाहिए।

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