तीन साल मोदी सरकार: बहुत याद आते हैं प्रभाष जोशी

तीन साल मोदी सरकार: बहुत याद आते हैं प्रभाष जोशीप्रभाष जोशी

आपको ये बात अटपटी सी लग सकती है कि चर्चा मोदी सरकार के तीन वर्षों की हो रही है और मैं याद स्वर्गीय प्रभाष जोशी जी को कर रहा हूँ। प्रभाष जी की भाषा में बोलें तो “अपन” उनको याद कर रहे हैं। बात थोड़ी टेढ़ी सी है। दरअसल पूरे भारतीय मीडिया में मुझे मोदी सरकार की आलोचना करने वाला एक भी लेख नहीं मिला। एक भी संपादक ऐसा नहीं मिला जिसने मोदी सरकार की आलोचना की हो। नहीं, यहाँ तक की तथाकथित सेक्युलर संपादक भी आलोचना नहीं कर रहे हैं।

दरअसल मैं पूर्वाग्रहों को आलोचना नहीं मानता। आलोचक वो होता है जिसका दिल और दिमाग खुला हो। वो नहीं जो कि पूर्वाग्रहों से ग्रसित हो और अन्दर की कुंठाओं को “न्यूट्रल” पत्रकारिता के नाम पर परोस रहा हो। जिनको प्रभाष जी स्मरण हैं, वो जानते हैं कि संघ और भाजपा से उनका वैचारिक धरातल पर छत्तीस का रिश्ता था, और उनकी कलम ने 6 दिसंबर और अयोध्या आंदोलन पर दिग्गज भाजपा नेताओं को पसीने छुड़ा दिए थे। कितने ही “कागद कारे “ऐसे थे जो इस “राष्ट्रवादी” राजनीती के धुर्रे उड़ा कर रख देते थे। लेकिन ऐसा क्या था प्रभाष जी की लेखनी में कि सरसंघचालक से ले कर अटल-आडवाणी तक सब उनको सर-आंखों पर रखते थे? ऐसा क्या “कंटेंट” था उनके “कागद कारे” (प्रभाष जी का कॉलम) में कि घनघोर संघी भी हर हफ्ते उनकी आलोचना का इंतज़ार करता था? सनद रहे कि प्रभाष जी जनसत्ता के संपादक थे, रामनाथ गोयनका जी पसंदीदा संपादकों में से एक थे और इमरजेंसी में कांग्रेसी तानाशाही के ज्वलंत विरोधी थे।

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वो “कंटेंट” उनकी कलम में नहीं, उनके चरित्र में था। वो कंटेंट उनकी आलोचना में नहीं बल्कि उनकी प्रमाणिकता में था। 'लिए लुकाठी हाथ...' वाली उनकी कलम थी। कबीर सी साफगोई थी। और पाठक से सीधा संवाद था, जिसमें उनकी व्यक्तिगत जिंदगी के सारे पन्ने, खुद के परिवार वालों को एम्बेरेस (परेशानी में डालने वाला) करने की हद्द तक, खुले पड़े थे। उस साफगोई में एक अजीब सी विश्वसनीयता थी, जिसको हर कोई महसूस करता था। उनकी ज़मीनी समझ उनके ज़मीनी जुड़ाव की वज़ह से थी। उनकी राजनैतिक समझ उनके सांस्कृतिक नज़रिए पर काली पट्टी नहीं बांध पाती थी। रोज़-रोज़ के राजनैतिक मुद्दों की जूती को वो रात भर अपनी इस प्रमाणिक समझ के मठ्ठे में भिगो के रखते थे, और सुबह होते ही उनकी कलम हर नेता को वो जूती भिगो-भिगो के देती थी। हर कोई हाय-हाय... करता था, लेकिन उस जूती की विश्वसनीयता और प्रमाणिकता पर ऊंगली कभी नहीं उठा पाता था, क्योंकि पाठकों की साख पर उनकी लेखनी खरी उतरती थी।

लेकिन बात मोदी सरकार की है। आज के हालात की है। जब मैंने कहा कि मुझे एक भी आलोचना नहीं मिली, तो उसका अर्थ ये है कि या तो चापलूसों की रिपोर्ट मिली या फिर पूर्वाग्रहों की। चलिए बात रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर की रिपोर्ट से शुरु करते हैं। क्योंकि यही ऐसी ताजी-ताजी रिपोर्ट है जो खासमखास चर्चा में रही है। इसके अनुसार स्वतंत्र और दवाब-रहित पत्रकारिता के क्षेत्र में भारत को 136वें स्थान पर रखा गया है। कुल 180 देशों की सूची में 136वां स्थान होना निश्चित बुरा है। लेकिन जरा ठहरिए... 2009 में क्या स्थिति थी, पिछले साल क्या स्थिति थी? इन सालों में सूची में शामिल कुल देशों की संख्या कितनी थी और क्या इन सालों में ऐसा भी कोई देश है जो भारत से आगे निकला हो? अब आप पाएंगे कि ये महज आंकड़ों की बाजीगरी भर है। इस रिपोर्ट के अनुसार न तो भारत की पत्रकारिता की स्थिति 2009 में अच्छी थी और न ही 2017 में हैं। 2009 में भारत 105वें/175 पायदान पर था, 2016 में 133वें/180, 2017 में 136वें/180, यानि भारतीय मीडिया उतना ही कूड़ा या अच्छा मोदी के पहले था जितना मोदी के बाद है। चाटुकारों को चाटुकारिता के लिए छोड़ देते हैं और जरा पूर्वाग्रहों की बात करते हैं।

अब बात आती है अघोषित इमरजेंसी की... जो मूर्धन्य, मठाधीश पत्रकार अभिव्यक्ति की आज़ादी पर ख़तरे का रोना रो रहे हैं, वे ही लोग इसे लेख, ब्लॉग या सोशल मीडिया पर लिख-लिख कर व्यक्त भी कर रहे हैं। कितनी अजीब बात है...! "मुझे बोलने नहीं दिया जा रहा" कहने वाले रोज-रोज बोलकर ही ये बात फैला रहे हैं? किसने लिखने से रोका है? मोदी ने तीन साल में कबाड़ा कर दिया, मोदी हिटलर हैं, मोदी तानाशाह हैं... लेख छप रहे हैं, अख़बारों में, वेबसाइटों पर... अब ये सब लिखने वालों को बोलने की आज़ादी का ख़तरा है? सच में...! भारतीय अख़बारों में, या अन्य मीडिया संस्थानों में मोदी को गरियाने वालों की संख्या कम हो गई? कहाँ से? किस कोने से?? न सिर्फ छप रहा है बल्कि मोदी पढ़ भी रहे हैं। दो दिन पहले हमारा सर्वे आया जिसमें हर तीसरा व्यक्ति मानता है कि गौरक्षा के नाम पर होने वाली गुंडा-गर्दी, चीजों को गलत दिशा में ले जा रही है। इसी सर्वे में 40 फीसदी लोगों का मानना है कि पाकिस्तान को लेकर मोदी सरकार की नीति 'कंफ्यूजिंग' है। दो साल पहले हमारे सर्वे में सत्तर फीसदी से ज्यादा लोगों ने भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर कहा की मोदी सरकार किसान विरोधी है। जो जमीनी हक़ीक़त हमारे पास आई वो हमने सामने रख दी, हमसे तो किसी सरकारी नुमाइंदे या भाजपा के नेता ने नहीं कहा कि आपने क्या दिखा दिया?

दरअसल यहाँ चीजें 'मिसमैच' कर रही हैं। अब इनमें से जो लोग अमेरिका की मीडिया को याद कर-कर के बार-बार अपनी पीड़ा दिखा रहे हैं, उन्हें याद करना चाहिए कि ट्रम्प को अमेरिकी मीडिया अधिकतम 8 साल गरिया (कठोरतम आलोचना) सकती है, हमारे यहाँ की मीडिया एक व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनने से पहले 12 साल तक गरिया चुकी है, और अब तक कुल 15 साल हो चुके, शेष... गिनती जारी है। अगर किसी को लगता है कि मोदी सरकार का मीडिया मैनेजमेंट इस हद तक हो चुका है कि लगभग सभी बड़े मीडिया संस्थान बिक चुके हैं तो उन्हें सबसे पहले एक काम करना चाहिए... वे इन बिके हुए संस्थानों से अपने सभी संबंध ख़त्म कर लें। प्रण लें की ऐसे बिके हुए मालिकों के यहाँ वो कभी नौकरी नहीं करेंगे। लात मारें ऐसी नौकरी को...।

ऐसा करके वे पत्रकारों की युवा पीढ़ी को एक संदेश दे सकते हैं कि देखो, मोदी के सामने रेंगने वाले हमारे मालिकों की नौकरी हमने छोड़ दी है। लेकिन ये ऐसा नहीं करेंगे। वे कह नहीं सकते, लेकिन कहना यही चाह रहे हैं कि मुझे छोड़कर मोदी ने सबको ख़रीद लिया है। ये ढकोसलेबाजी है। चित भी मेरी और पट भी मेरी।

स्वतंत्रता संग्राम में लोग भूखों मरते थे, लेकिन पत्रकारिता जारी थी। इमरजेंसी में लोग जेल में ठूस दिए गए लेकिन समझौता नहीं किया। आज की दौर में चीखने वाले इस पीढ़ी के कितने लोग दावा कर सकते हैं कि वे तत्कालीन सरकार के खिलाफ लिखते हुए जेल गए? इमरजेंसी के खिलाफ जेल जाने वालों में वही दक्षिणपंथी लोग थे जिनकी अगली पीढ़ी को भक्त कहकर अनसुना करने की हिदायतें दीं जा रही हैं। अगर आज अघोषित इमरजेंसी है तो छोड़िए नौकरी और लड़िए... अगर आपमें नैतिक साहस बकाया है, नहीं तो उपदेश देना बंद कीजिये।

यह ठीक है कि मीडिया की भूमिका एंटी-इनकमबैंट की होती है, जिसमें जब सरकारें बदली तो पत्रकारों को अपनी दिशा भी बदलनी होती है। लेकिन अगर तीन साल में भी विपक्ष के घपले-घोटालों की ख़बरें सामने आ रही हैं तो मीडिया को क्या इन्हें नहीं दिखाना चाहिए? पाँच साल में विपक्ष को ब्लैंक चेक नहीं दिया जा सकता है। जो लोग आज प्रभाष जोशी बनने की कोशिश कर रहे हैं वे अच्छे लोग हैं लेकिन इन कोशिशों में ये ध्यान भी रखा जाना चाहिए कि जिन संस्थानों में वे काम कर रहे हैं, वे उस समय के इंडियन एक्सप्रेस या जनसत्ता कतई नहीं हैं। प्रभाष जी वाला नैतिक साहस आज किसी भी “सेक्युलर “ संपादक में नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस पर इंदिरा जी के समय मुकद्मे चले तो उसकी आवाज़ दबाने के लिए, उन पर भी कई मुकद्दमे चले। लेकिन उन मुकद्दमो में सच्चाई नहीं थी। आज जो केस मीडिया मालिकों पर चल रहे हैं उनमे मनीलॉन्डरिंग, उगाही, विदेशी मुद्रा जैसे गंभीर आरोपों के केस हैं। पहले के मीडिया मालिकों के यहाँ ईडी के छापे नहीं पड़ते थे। उनके करम इतने भी फूटे नहीं थे। उनकी हिम्मत उनकी और उनके संपादकों की इमानदारी से आती थी।

एक समय हुआ करता था कि इंदिरा जी ने वीसी शुक्ला को रामनाथ गोयनका जी को “समझाने” के लिए भेजा, रामनाथ जी पहले से ही इस बात को भांप गए और उन्होंने वीसी शुक्ला को अपने दफ़्तर में अंदर करके दरवाजे बंद कर लिया। यह देखकर शुक्ला जी का घबराना स्वाभाविक था। लेकिन जैसे-तैसे शुक्ला जी ने इंदिरा जी का संदेश रामनाथ जी को दिया तो रामनाथ जी ने अपने ऑफिस में रखे एक लौटे को हाथ में लेकर कहा कि "जब मैं अपने गाँव से निकला था तो सिर्फ ये लौटा था, जब जाउंगा तो ये भी नहीं होगा। जाओ, जाकर इंदु से कह देना", तो ये होता है नैतिक साहस, आध्यात्मिक साहस। सिर्फ आप में साहस हो और संस्थान में, या संस्थान के मालिक में साहस न हो आप क्या कर सकते हैं? इसलिए केवल काली स्क्रीन करने से रवीश शायद प्रभाष जोशी बनने की कोशिश कर लें, लेकिन वो भी जानते हैं कि उनका चैनल किसी भी कोने से इंडियन एक्सप्रेस नहीं है और उनके मालिक आकाश-पाताल भी नाप लें तो रामनाथ गोयनका के पैर की धूल भी नहीं। रवीश की बातों में प्रमाणिकता हो सकती है, लेकिन दुर्भाग्य से उनके प्लेटफार्म में प्रमाणिकता नहीं है। जिनके प्लेटफार्म में प्रमाणिकता है, दुर्भाग्य से वहाँ रवीश नहीं हैं।

मोदी सरकार की भांडगिरी में मीडिया का एक बड़ा तबका लगा है। ये सच है। ये भी सच है कि ये वो ही तबका है जो कांग्रेस की सरकार के समय उसकी भांडगिरी में लगा हुआ था। ज्यादातर मीडिया मालिकों के लिए जो कुर्सी में बैठा है वो ही भगवान है, और ये बीमारी नयी कतई नहीं है। इंदिरा गाँधी की इमरजेंसी के समय भी इक्का-दुक्का ही रामनाथ गोयनका जैसी हिम्मत रखते थे। लेकिन आज मानो दोहरी मार है। कई बार लगता है की आज के हालातों में मोदी की विश्वसनीयता भारतीय मीडिया की विश्वसनीयता पर भारी है। इसका ज़िम्मेदार कौन है? इसके ज़िम्मेदार चाटुकार पत्रकार और भांड मालिक तो हैं ही, लेकिन उतने ही बड़े ज़िम्मेदार वो सेक्युलर संपादक भी हैं जो अपने पूर्वाग्रहों को ख़बर बना कर चलाते हैं।

मोदी के भाट-चारणों की संख्या कम नहीं है पर सच्चाई यह भी है कि अपने वैचारिक पूर्वाग्रहों के कारण मीडिया का एक धड़ा हर ऐसी ख़बर को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाने में लगा है जो मोदी को नीचे ला सकती है। सेना का राजनीतिकरण मीडिया कर रहा है या मोदी सरकार? सेना द्वारा तख्ता-पलट के संदेह वाली ख़बर जब चलाई गयी थी तब मोदी प्रधान मंत्री की दौड़ में भी नहीं थे। ईवीएम पर उंगली उठाने वालों ने ये कतई नहीं सोचा कि इस संस्था को यहाँ तक लाने में कितना समय लगा। आज सेना के बाद लोग चुनाव आयोग पर सबसे ज्यादा विश्वास करते हैं। लेकिन केवल मोदी विरोध में सेना को नीचा दिखाना हो या चुनाव आयोग को गरियाना हो, इन मुद्दों पर क्या हो रहा है, सबको समझ में आ रहा है।

पहले आप भगवान थे जो समाचार पत्रों में लिख देते थे, फिर बाद के समय में टीवी पर आकर ज्ञान देने लगे। लोग बस पढ़ते और सुन पाते थे। लेकिन अब समय बदल गया है। आज वो पाठक या दर्शक आपसे सोशल मीडिया पर प्रश्न पूछ रहा है तो आप उसे कभी 'ट्रोल' कहते हैं कभी 'भक्त' कह कर उसका मजाक उड़ा रहे हैं? इतना ही नहीं, स्वयं बेहद गैर-जिम्मेदाराना ढंग से झूठे तथ्यों को सोशल मीडिया पर लाना और बेशर्मी की हद तक उस पर माफी न मांगना और कार्यवाई होने पर लोकतंत्र ख़तरे में होने का राग अलापना, मीडिया के इस हिस्से की आदत हो गई है। ट्रोलिंग बुरी नहीं है, बुरा है तो गाली-गलौच करना। और ये भी मानकर नहीं चलना चाहिए कि ट्रोलिंग सिर्फ एक ओर से होती है, सब करते हैं। आप दूसरों पर असहिष्णु होने का आरोप लगाते हैं लेकिन आप स्वयं किसी के तार्किक प्रश्न का जवाब नहीं दे सकते उल्टा उसे मोदी का पेड ट्रोल कह देते हैं, ये आपकी सहिष्णुता है?

ये भी बड़ी अजीब बात है कि दोनों तरफ के लोग एक ही बात कर रहे हैं। सत्ता पक्ष कहता है कि विपक्ष फालतू के मुद्दू उठाकर विकास की उनकी कोशिशों को डिरेल करना चाहता है, वहीं (कथित) उदारपंथी और विपक्ष भी यही बात कहता है कि विकास पर फोकस करने के बजाय मोदी सरकार इधर-उधर के मुद्दों पर ध्यान भटकाए रहती है। है न अजीब बात! दोनों विकास में मुद्दों की बात करना चाहते हैं लेकिन दोनों ही कर नहीं पा रहे हैं। कितनी विचित्र स्थिति है!

ऐसे में सच्चाई क्या है? सच्चाई इन दोनों के बीच में है। सरकार सबकुछ अच्छा ही कर रही है, ऐसा नहीं है। वहीं सरकार सबकुछ बुरा ही कर रही है, ऐसा भी नहीं है। दोंनों के पास अपनी बात सिद्ध करने के लिए ठोस कुछ नहीं है। ऐसे में, मैं सबसे ज्यादा आज प्रभाष जी को मिस कर रहा हूँ। वे हर रविवार अपने कॉलम में पूरे तथ्यों के साथ आलोचना करते थे। आसान शब्दों में कहा जाए तो भिगो-भिगो के मारने वाली आलोचना। लेकिन ध्यान रखिए कि उनकी लेखनी में वस्तुनिष्ठता, तथ्यपरखता, निष्पक्षता होती थी। मोदी जी भी शायद उन्हें सबसे पहले पढ़ना पसंद करते क्योंकि उनमें पूर्वाग्रह कतई नहीं था। नैतिक साहस और पूर्वाग्रह दो अलग-अलग चीजें हैं। नैतिक बल आध्यात्मिकता से आता है, नितांत व्यक्तिगत चीज है। आज के लिखने वालों में पूर्वाग्रह बहुत अधिक है। आलोचना होनी चाहिए, नैतिक साहस के साथ लेकिन पूर्वाग्रह से मुक्त। यही कारण है कि सरकार को आइना दिखाने वालों को आज कोई गंभीरता से नहीं लेता। "निंदक नियरे राखिए..." सिर्फ सरकारों के लिए है क्या? नहीं, सबके लिए है। पत्रकारों के लिए भी... कोई उनकी आलोचना करता है तो उसे सुनना चाहिए।

इसीलिए मैंने कहा कि आज प्रभाष जी की कमी खल रही है। सिर्फ सरकार को आइना दिखाने के लिए नहीं बल्कि मीडिया को भी आइना दिखाने के लिए। इससे न सिर्फ बर्तमान माहौल बिगड़ रहा है बल्कि पत्रकारों की अगली पीढ़ी भी सोशल मीडिया पर सिर्फ और सिर्फ मोदी विरोध या फिर सिर्फ और सिर्फ मोदी समर्थन को चैंपियनशिप जर्नलिज़्म की निशानी मान ले रही है।

अंत में पाठक, श्रोता या दर्शक मूर्ख नहीं है। वह अच्छे को अच्छा देखना चाहता है और बुरे को बुरा। आप जबर्दस्ती इनकी अदला-बदली करेंगे तो स्वयं की विश्वसनीयता कम करेंग, और कुछ नहीं। आपके पाठक या दर्शक उसी के हिसाब से घटेंगे या बढ़ेंगे। और आप ये नहीं कह सकते कि पाठक, दर्शक या श्रोता मूर्ख हैं। वो मूर्ख नहीं हैं। आपकी खुद की समझ मूर्खतापूर्ण है। अपने पूर्वाग्रहों को आलोचना का जामा पहनाना बंद कीजिये। प्रमाणिक तरीके से आलोचना कीजिये। प्रभाष जोशी बनना इतना आसान नहीं है।

- यशवंत देशमुख

(लेखक जाने-माने चुनाव विश्लेषक और चुनाव सर्वेक्षण कराने वाली संस्था सी-वोटर के प्रमुख हैं)

- ऑफ प्रिंट से साभार


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