प्रधानाध्यापक की पहल : दिमागी बुखार से प्रभावित इस क्षेत्र के बच्चों के लिए उपलब्ध करा रहे आरओ का पानी

साल 2005 इस क्षेत्र में दिमागी बुखार से 56 बच्चों की मौत हो गई थी, बच्चों को इस जल जनित बीमारी से बचाने के लिए न केवल जागरूक किया जाता है, स्कूल के बच्चों के साफ आरओ का पानी भी उपलब्ध कराया जाता है।

रामकोला (कुशीनगर)। किसी बच्चे की दिमागी बुखार से मौत न हो, इसलिए हर बच्चे के लिए विद्यालय में आरओ का पानी मंगाया जाता है, यही नहीं यहां के हर बच्चे को पता है कि दिमागी बुखार कैसा फैलता है और इससे कैसे बचा जा सकता है।

पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में हर साल दिमागी बुखार से बच्चों की मौत हो जाती है, लेकिन कुशीनगर जिले के रामकोला ब्लॉक के बनकट गाँव के प्राथमिक व पूर्व माध्यमिक विद्यालय के बच्चे इस जलजनित बीमारी से सुरक्षित हैं और जागरूक भी। इस बारे में विद्यालय के प्रधानाध्यापक सूर्य प्रताप बताते हैं, "जब मेरी यहां पर नियुक्ति हुई तो मुझे पता चला कि ये जो एरिया है यहां पर दूषित पानी की समस्या है, हैंडपंप में दूषित पानी आता है, मैंने देख भी लिया था कि अगर हैंडपंप का पानी अगर जग में रख दिया जाए तो पांच मिनट में उसका कलर चेंज होने लगता है। 2005 में इसी पंचायत के 56 बच्चों की मौत दिमागी बुखार से हो गई थी।"


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वो आगे बताते हैं, "इसलिए जब से मैं यहां आया बच्चों को पानी से कोई परेशानी न हो इसलिए बच्चों को लिए आरओ का पानी मंगाता हूं, इसके लिए कोई बजट नहीं आता है, अपने पास ही हम पानी के लिए खर्च करते हैं, हम हर दिन असेंबली में बच्चों को जलजनित बीमारियों के बारे में बताते हैं कि कैसे साफ पानी पिए, कैसे घर और आसपास में सफाई रखें, बच्चों को बताया जाता है और उनसे पूछा जाता है।"

बच्चे अंग्रेजी में देते हैं अपना परिचय

सातवीं कक्षा में पढ़ने वाली शहनाज खातून पढ़-लिखकर डॉक्टर बनना चाहती हैं, अंग्रेजी में अपना परिचय देते हुए वो कहती हैं, "हमें अपने स्कूल में टीचर बहुत अच्छे से पढ़ाते हैं, वो हर विषय को बहुत अच्छे से पढ़ाते हैं, मैं डॉक्टर बनना चाहती हूं, क्योंकि जब मैं जब दूसरों को दर्द में देखती हूं तो परेशान हो जाती हूं, इसलिए मैं डॉक्टर बन लोगों का दर्द दूर करना चाहती हूं।"

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तीन भाषाओं में होती है संगीतमयी प्रार्थना, असेंबली में पूछे जाते हैं जनरल नॉलेज के सवाल

प्रधानाध्यापक सूर्य प्रताप बताते हैं, "हर दिन सुबह तीन भाषाओं प्रार्थना होती है, सबसे पहले संस्कृत में, फिर इंग्लिश में उसके बाद हिंदी में संगीत के साथ प्रार्थना होती है, उसके बाद असेंबली में ही बच्चों से जनरल नॉलेज के सवाल पूछे जाते हैं, बच्चों को पूरा अवसर दिया है। बच्चों का कांफिडेंस लेवल बढ़ाने के लिए बच्चों को मंच पर बुलाया जाता है, उन्हें बकायदा टॉपिक दे दिया जाता है, उसे तैयार करते हैं सभी बच्चों के सामने ही बोलते हैं।"

कुशीनगर में विद्यालयों की संख्या

प्राथमिक विद्यालय ग्रामीण क्षेत्र - 2169

शहरी क्षेत्र - 10

पूर्व माध्यमिक विद्यालय ग्रामीण क्षेत्र- 819

शहरी क्षेत्र - दो


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बढ़ गया स्कूल में नामांकन

दिसम्बर 2012 पहले 86 बच्चों का नामांकन था, जिसमें से 20-25 बच्चे ही पढ़ने आते थे, बच्चों के बैग में कॉपी किताबों के बजाय थाली हुआ करती थी, जब यहां पर आया तो विद्यालय की अवस्था बहुत खराब थी न तो बाउंड‍्री थी, बहुत मेहनत करना पड़ा, परिश्रम करना पड़ा, मेहनत का ही नतीजा है कि प्राथमिक और जूनियर को मिलाकर बच्चों की संख्या 600 को पर कर गई है, जनपद में विद्यालय का नाम हुआ है, विद्यालय इंग्लिश मीडियम भी हो गया है।

अभिभावक भी समझ रहे अपनी जिम्मेदारी

कुछ साल पहले तक जहां अभिभावकों को लगता कि सरकारी विद्यालयों में पढ़ाई नहीं होती, लेकिन अब लोगों का नजरिया बदल रहा है। "ग्राम सभा के अंदर सभी अभिभावकों के अंदर अपने विद्यालय के प्रति सकरात्मक नजरिया बढ़ा है, हमारे ऊपर विश्वास बढ़ा है, जिसका नतीजा है कि कांवेंट विद्यालयों से बच्चे यहां पढ़ने आ रहे हैं, अब अध्यापकों को लगता है कि उन्हें अपना पूरा समय देना है, पहले लोगों के अंदर यही नजरिया था कि सरकारी स्कूलों में खाना मिलता है और कुछ नहीं बस यही भावना हम लोगों के अंदर बदलने में लगे हैं, "प्रधानाध्यापक ने बताया।

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हम लोग अपने घर पर जाकर भी साफ-सफाई के बारे में बताते हैं, मुझे पढ़ना अच्छा लगता है तभी मैं किसी भी दिन अबसेंट नहीं होती हूं।
नीता भारती, कक्षा- पांच, प्राथमिक विद्यालय बनकट, कुशीनगर


सुबह सात बजे पहुंच जाते हैं सारे बच्चे

विद्यालय के अध्यापक प्रमोद कुमार बताते हैं, "2015 में मेरी यहां पर नियुक्ति हुई थी तब से बहुत बदलाव हो गया है, जहां दूसरे विद्यालय आठ बजे शुरू होते हैं, हमारे बच्चे सात बजे तक स्कूल पहुंच जाते हैं, अब कोई भी बच्चा अनुपस्थित नहीं होता है।"

कमजोर बच्चों के लिए चलती है एक्स्ट्रा क्लास

विद्यालय में कई ऐसे बच्चे हैं जो पढ़ने में कमजोर हैं, उन बच्चों के लिए छुट्टी के बाद हर दिन एक्स्ट्रा क्लास चलती है, जिससे वो बेहतर ढंग से पढ़ाई कर सकें। एक्स्ट्रा क्लास चलने से बच्चों की पढ़ाई में सुधार भी हुआ है। शुरू में बच्चे एक्स्ट्रा क्लास में आने से आनाकानी करते थे, लेकिन अब एक दूसरे को देखकर कोई भी बच्चा एक्स्ट्रा क्लास को मिस नहीं करना चाहता है।

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