खुद की पढ़ाई के साथ ही अपने घर वालों को भी पढ़ाते हैं ये 'नन्हे शिक्षक'

Chandrakant MishraChandrakant Mishra   22 Sep 2018 6:20 AM GMT

मुरादाबाद। कद भले ही छोटा हो मगर काम बड़े-बड़े...बात हो रही है विकास खंड कुंदरकी के गाँव हुसैनपुर छिरावली के बच्चों की। गाँव के बच्चों ने अपने कंधों पर सभी को साक्षर बनाने की जिम्मेदारी उठा रखी है। ये बच्चे अपनी पढ़ाई के साथ-साथ गाँव के उन अभिभावकों को जागरूक करते हैं जिनके बच्चे स्कूल नहीं जाते। इतना ही नहीं रोज शाम को अपने से छोटे बच्चों को मुफ्त में पढ़ाते भी हैं। वहीं गाँव की कुछ बेटियां अनपढ़ महिलाओं को पढ़ना-लिखना सिखा रही हैं। बच्चों के इस प्रयास में विद्यालय प्रबंध समिति के सदस्य भी सहयोग कर रहे हैं।


ये भी पढ़ें : छोटी उम्र में बड़ी कोशिश : बच्चियों ने ख़ुद रोका बाल विवाह, पकड़ी पढ़ाई की राह

गाँव का पिंकल पूर्व माध्यमिक विद्यालय में आठवीं का छात्र है। पिंकल रोज सुबह मोहल्ले के सभी बच्चों को लेकर स्कूल जाता है और शाम होते ही उन्हीं बच्चों को अपने घर पर बुलाकर पढ़ाता है। इसके अलावा पिंकल उन बच्चों को भी स्कूल ले जाने का काम कर रहा है जो बीच में पढ़ाई छोड़ चुके थे।

पिंकल ने बताया, "मुझे पढ़ाना बहुत अच्छा लगता है। पढ़ाने के साथ-साथ खुद की भी तैयारी हो जाती है। मैं तो बच्चों से रोज स्कूल जाने के लिए कहता हूं। गाँव के जो लोग अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजते उन्हें पढ़ाई का महत्व समझाने की कोशिश करता हूं।

पिंकल के पास पढ़ने वाले रवि के पिता रामपाल ने बताया, "पहले मेरा बेटा स्कूल से आने के बाद गाँव में घूमता था। कई बार स्कूल भी नहीं जाता था, लेकिन जबसे पिंकल ने मेरे बच्चे को पढ़ाना शुरू किया है मेरी चिंता खत्म हो गई है। मुझे अच्छा लगा रहा है कि मेरे गाँव के बच्चे पढ़ाई को लेकर इतने जागरक हैं।"

ये भी पढ़ें : अध्यापकों की कमी होने पर ग्रामीणों ने संभाली पढ़ाई की जिम्मेदारी, स्कूल में बढ़ा बच्चों का नामांकन

"पहले हमारे विद्यालय में स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या ज्यादा थी, लेकिन विद्यालय प्रबंध समिति के सदस्यों और कुछ जागरूक बच्चों की बदौलत छात्रों की संख्या हर साल बढ़ती जा रही है। वर्तमान समय में 308 छात्र-छात्राएं पंजीकृत हैं, "अबरार हुसैन, प्रधानाचार्य

दोस्तों की पढ़ाई फिर शुरू कराई

पिंकल की तरह इसी गाँव का गुलाम मोहम्मद भी ड्रॉप आउट बच्चों को फिर से पढ़ने के लिए प्रेरित कर रहा है। गुलाम मोहम्मद गाँव के ही स्कूल में सातवीं का छात्र है। गुलाम मोहम्मद के कई दोस्तों ने पढ़ाई छोड़ दी थी। बच्चे पढ़ना चाहते थे, लेकिन उनके परिवारीजन खेत में काम करने को कहते।


ये भी पढ़ें : इस स्कूल में पड़ोस के गांव से भी पढ़ने आते हैं बच्चे

गुलाम मोहम्मद ने बताया, " मेरे साथ पढ़ने वाले कई दोस्तों ने पढ़ाई छोड़ दी थी। जब मैंने स्कूल न आने की वजह पूछी तो उन्होंने बताया कि घरवाले कहते हैं, पढ़ाई करके क्या करेगा हमारे साथ खेती में हाथ बंटा। इसके बाद मैंने उनके घरवालों को समझाया। पहले तो उन्होंने मुझे भगा दिया, लेकिन मैंने हार नहीं मानी। बार-बार उनके घर गया और उन्हें समझाया तो वे अपने बच्चों को फिर से स्कूल भेजने लगे। इसके साथ-साथ मैं रोज शाम को मोहल्ले के छोटे-छोटे बच्चों को पढ़ाता भी हूं।"

अनपढ़ महिलाओं को बना रही साक्षर

गाँव की सोफिया आठवीं की छात्रा हैं। सोफिया ने गाँव की अनपढ़ महिलाओं को साक्षर बनाने का बीड़ा उठाया है। सोफिया ने बताया, "मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता था कि मेरी मम्मी दस्तखत करने की जगह अंगूठा लगाती थीं। मैंने उन्हें हिंदी और इंग्लिश में दस्तखत करना सिखाया। मैं नहीं चाहती हूं कि मेरे गाँव की कोई लड़की या महिला अनपढ़ रहे। मैंने मम्मी के साथ-साथ मोहल्ले की कई महिलाओं को पढ़ना-लिखना सिखाया है।"

ये भी पढ़ें : प्रधानाध्यापक की पहल : दिमागी बुखार से प्रभावित इस क्षेत्र के बच्चों के लिए उपलब्ध करा रहे आरओ का पानी


"हम लोगों की कोशिश रहती है गाँव का कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे। कई बार जब अभिवावक अपने बच्चों को पढ़ने नहीं भेजते हैं तो हम लोग उन्हें शिक्षा का अधिकार और बाल मजदूरी के कानून का डर दिखाकर स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करते हैं, "वीर सिंह, अध्यक्ष, विद्यालय प्रबंध समिति

सोफिया के दादा इश्तयाक को अपनी पोती पर गर्व है। इश्तयाक ने बताया, "मेरी पोती ने अपनी मां को पढ़ाने के साथ-साथ गाँव की कई महिलाओं को पढ़ना लिखना सिखाया है। जब गाँव के लोग मेरी पोती की तारीफ करते हैं तो मुझे बड़ा अच्छा लगता है। मैं चाहता हूं कि गाँव की कोई भी निरक्षर न रहे।"

फैक्ट्री में काम छोड़ किताबें उठाईं

"मेरे गाँव के जो बच्चे स्कूल न जाकर काम करने जाते हैं, मैं उनके माता-माता को ये बात समझाने की कोशिश करता हूं कि अभी आपके बच्चे की पढ़ाई की उम्र है। अगर वे अभी से मजदूरी करने लगेंगे तो आगे चलकर उन्हें बहुत परेशानी होगी।", यह कहना है आठवीं में पढ़ने वाले अतुल का। अतुल के साथ के कुछ बच्चे पढ़ाई छोड़ फैक्ट्री में काम करने जाते थे। अतुल की मेहनत से गाँव के करीब सात बच्चों ने फैक्ट्री की नौकरी छोड़ फिर से पढ़ाई शुरू कर दी है।

ये भी पढ़ें : यकीन कीजिए, इस सरकारी विद्यालय में 1100 छात्र-छात्राएं हैं...



More Stories


© 2019 All rights reserved.

Share it
Top