मधुमेह के खतरों से बचने के लिए भोजन की गुणवत्ता भी जरूरी

मधुमेह के खतरों से बचने के लिए भोजन की गुणवत्ता भी जरूरी

यह तो सब जानते हैं कि मधुमेह के रोगियों को खानपान पर ध्यान देना जरूरी है। लेकिन, एक नए अध्ययन में यह बात सामने आई है कि खानपान में सावधानी के साथ आहार की गुणवत्ता भी टाइप-2 मधुमेह के खतरों से बचाने में मददगार हो सकती है।

शोधकर्ताओं ने पाया कि केवल 25 प्रतिशत मधुमेह रोगी सुबह उठने के दो घंटे के भीतर नियमित रूप से नाश्ता करते हैं। इसी तरह, केवल 20 प्रतिशत मधुमेह रोगी नियमित आहार के बीच में अनावश्यक खाद्य उत्पादों को खाने से बचते हैं। महिलाओं के मामले यह बात उभरकर आई है कि घरेलू कामों में जुटे रहने के कारण अक्सर वे सुबह नाश्ता नहीं कर पाती हैं। यह भी कम चिंताजनक नहीं है कि लगभग 75 प्रतिशत रोगी अपने बढ़ते वजन की कोई परवाह नहीं करते।

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इस अध्ययन में टाइप-2 मधुमेह से ग्रस्त 40-70 वर्ष के 200 रोगियों की आहार संबंधी प्रवृत्तियों की पड़ताल की गई है। शरीर में पोषक तत्वों की स्थिति का पता लगाने के लिए रक्त में वसा की मात्रा, ग्लाइसेमिक सूचकांक और पोषण संबंधी जैव-संकेतकों, जैसे- हीमोग्लोबिन, कोलेस्ट्रॉल, जिंक, विटामिन-डी, कैल्शियम, एल्ब्यूमिन का मूल्यांकन किया गया है। ग्लाइसेमिक सूचकांक शरीर में कार्बोहाइड्रेट के पाचन और अवशोषण की दर को दर्शाता है।

प्रतीकात्मक तस्वीर साभार: इंटरनेट

यह अध्ययन राष्ट्रीय औषधीय शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान, हाजीपुर, राजेंद्र स्मारक चिकित्सा विज्ञान अनुसंधान संस्थान, पटना तथा जामिया हमदर्द, नई दिल्ली के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है। समय पर भोजन न करना, फलों और मछलियों का समुचित सेवन न करना, चावल, गेहूं के आटे से बने परांठे, नूडल्स, आलू, हरी मटर जैसी चीजों और अधिक वसा युक्त दूध के सेवन के काफी मामले देखने को मिले हैं। ऐसे खानपान से रोगियों में जिंक, विटामिन-डी और एल्ब्यूमिन की कमी पाई गई है और उनके सीरम कैल्शियम के स्तर में बढ़ोत्तरी देखी गई है।

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भोजन ग्रहण करने का तरीका, आहार की गुणवत्ता, पोषक तत्व, मोटापा, शारीरिक निष्क्रियता, नीरस जीवन शैली और मधुमेह से पूर्व की अवस्था जैसे जोखिम टाइप-2 मधुमेह होने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि टाइप-2 मधुमेह से ग्रस्त लोगों का आहार को लेकर लापरवाही भरा रवैया खतरनाक हो सकता है क्योंकि इसका सीधा संबंध बीमारियों और मृत्यु दर से होता है।

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प्रमुख शोधकर्ता डॉ कृष्णमूर्ति ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि "इस शोध में विशेष रूप से निम्न आय वर्ग के लोगों की आहार आदतों में सुधार के लिए उनके खानपान संबंधी व्यवहार को समझने का प्रयास किया गया है। हमने पाया कि टाइप-2 मधुमेह से ग्रस्त रोगियों द्वारा आमतौर पर ग्रहण किए जाने वाले भोजन का संबंध उनके कार्डियो- मेटाबोलिक जोखिम वाले कारकों और पोषक जैव-संकेतकों की स्थिति से होता है। कार्डियो-मेटाबोलिक जोखिम एक ऐसी स्थिति है, जिसमें एथेरोस्क्लेरोटिक कार्डियोवास्कुलर रोग और मधुमेह के विकास की संभावनाएं इंसुलिन प्रतिरोध के कारण बढ़ जाती हैं।"


मधुमेह बीमारी टाइप-1 और टाइप-2 दो प्रकार की होती है। टाइप-1 में इंसुलिन का बनना कम या फिर बंद हो जाता है। जबकि टाइप-2 मधुमेह से पीड़ित लोगों के रक्त में शर्करा की मात्रा इतनी ज्यादा बढ़ जाती है कि उसको नियंत्रण करना मुश्किल हो जाता है। टाइप-2 मधुमेह से ग्रस्त व्यक्ति में प्यास और भूख में वृद्धि, बार-बार मूत्र त्याग की इच्छा, वजन कम होना, थकान, धुंधली दृष्टि, संक्रमण एवं घावों का धीमी गति से भरना और कुछ क्षेत्रों में त्वचा का काला पड़ने जैसे लक्षण होते हैं। यह अध्ययन टाइप-2 मधुमेह के लिए जिम्मेदार आहार संबंधी प्रवृत्तियों को समझने में फायदेमंद हो सकता है।

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शोधकर्ताओं में डॉ कृष्णमूर्ति के अलावा, आमिर बशीर, डॉ कृष्णा पाण्डे, मोहम्मद अजहरुद्दीन, अंजलि कुमारी, इश्फाक रशीद, एन.ए. सिद्दिकी, चंद्रशेखर लाल एवं प्रदीप दास शामिल थे। यह शोध क्लीनिकल इपिडेमियोलॉजी ऐंड ग्लोबल हेल्थ जर्नल में प्रकाशित किया गया है। शोध में डॉ. विमल मिश्रा के साथ अमर दीप तिवारी भी शामिल थे। यह शोध जर्नल ऑफ जियोफिजिकल रिसर्च: एटमॉस्फियर में प्रकाशित हुआ है।

साभार: इंडिया साइंस वायर

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