RBSK 2.0 क्या है: अब स्कूलों और आंगनवाड़ी में होगी बच्चों की नई हेल्थ स्क्रीनिंग, लाइफस्टाइल बीमारियों पर फोकस
भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य शिखर सम्मेलन में RBSK 2.0 (राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम) की नई गाइडलाइंस जारी की हैं। इसका मकसद बच्चों की स्वास्थ्य जाँच को और बेहतर बनाना है ताकि आज की नई स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटा जा सके। अब इस कार्यक्रम में सिर्फ सामान्य बीमारियों की ही नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं और गैर-संचारी रोगों (NCDs) जैसे मधुमेह और हाई ब्लड प्रेशर के जोखिम की भी जाँच की जाएगी। इससे जन्म से लेकर 18 साल तक के बच्चों को ज्यादा व्यापक स्वास्थ्य सुविधाएं मिलेंगी।
RBSK 2.0 क्या है?
पहले RBSK कार्यक्रम "4Ds" पर काम करता था। इसमें जन्मजात दोष, बीमारियाँ, पोषण की कमी और विकास में देरी जैसी समस्याओं की पहचान की जाती थी। अब RBSK 2.0 में इसका दायरा बढ़ा दिया गया है। इसमें व्यवहार संबंधी समस्याएं, मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियाँ और लाइफस्टाइल बीमारियों के जोखिम को भी शामिल किया गया है।
स्कूल और आंगनवाड़ी में होगी जाँच
सरकार की मोबाइल हेल्थ टीमें पहले की तरह स्कूलों और आंगनवाड़ी केंद्रों में जाकर बच्चों की जाँच करेंगी। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि शहर हो या गाँव, हर बच्चे तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुँच सकें और सभी बच्चों की जाँच हो सके।
रेफरल सिस्टम होगा मजबूत
स्वास्थ्य मंत्रालय बच्चों के इलाज की प्रक्रिया को और आसान बनाने के लिए रेफरल सिस्टम को मजबूत कर रहा है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि जिन बच्चों को आगे इलाज की जरूरत है, वे बीच में छूटें नहीं और उन्हें समय पर सही इलाज मिल सके।
डिजिटल हेल्थ कार्ड की शुरुआत
सरकार ने डिजिटल हेल्थ को बढ़ावा देने के लिए डिजिटल हेल्थ कार्ड और रियल टाइम मॉनिटरिंग प्लेटफॉर्म शुरू किए हैं। इससे बच्चों के स्वास्थ्य रिकॉर्ड को ट्रैक करना आसान होगा और डॉक्टरों को सही समय पर जरूरी जानकारी मिल सकेगी।
अलग-अलग विभाग मिलकर करेंगे काम
नई गाइडलाइंस में स्वास्थ्य, शिक्षा और बाल विकास विभागों के बीच बेहतर तालमेल पर भी जोर दिया गया है। इससे सामुदायिक स्तर पर बच्चों को बेहतर और आसान स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकेंगी।
बच्चों को क्या फायदा होगा?
RBSK 2.0 के जरिए अब बच्चों और किशोरों को पहले से ज्यादा बेहतर और व्यापक स्वास्थ्य सेवाएं मिलेंगी। इससे बीमारियों की जल्दी पहचान होगी, समय पर इलाज मिलेगा और बच्चों की सेहत बेहतर बनी रहेगी।