नीलेश मिसरा के कविता संग्रह ‘मैं अक्सर सोचता हूँ’ को सर्वश्रेष्ठ हिंदी बेस्टसेलर के लिए मिला दैनिक जागरण कृति सम्मान
भारत के लोकप्रिय कहानीकार, गीतकार और लेखक नीलेश मिसरा को उनके चर्चित कविता संग्रह ‘मैं अक्सर सोचता हूँ’ के लिए प्रतिष्ठित दैनिक जागरण कृति सम्मान से सम्मानित किया गया है। कविता श्रेणी में वर्ष 2025 के हिंदी बेस्टसेलर साहित्य में सर्वश्रेष्ठ कृति के रूप में यह सम्मान उन्हें भारत में हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित समारोह के दौरान प्रदान किया गया।
28 मई को दिल्ली में मिला सम्मान
28 मई 2026 की शाम नई दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (IIC) में आयोजित एक समारोह में नीलेश मिसरा को ‘दैनिक जागरण कृति सम्मान – बेस्ट ऑफ हिंदी बेस्टसेलर 2025’ से सम्मानित किया गया। उन्हें ‘उत्तम में सर्वोत्तम : कविता’ श्रेणी में यह पुरस्कार प्रदान किया गया। यह सम्मान दैनिक जागरण के उस विशेष आयोजन के अवसर पर दिया गया जो भारत में हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्षों की ऐतिहासिक यात्रा का प्रतीक था। राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश और दैनिक जागरण के कार्यकारी संपादक विष्णु प्रकाश त्रिपाठी ने नीलेश मिसरा को यह सम्मान प्रदान किया।
2025 की सर्वश्रेष्ठ बेस्टसेलर कृति का सम्मान
‘मैं अक्सर सोचता हूँ’, नीलेश मिसरा का पहला कविता संग्रह है जिसे स्लो इम्प्रिंट ने गाँव कनेक्शन और एकदा के सहयोग से प्रकाशित किया है। यह पुस्तक बेहद निजी अनुभवों और गहरी संवेदनाओं से भरी हुई है। यह नीलेश मिसरा के रचनात्मक जीवन के एक ऐसे आयाम को सामने लाती है जो हमेशा से भाषा के भीतर जीवित रहा है।
नीलेश मिसरा की लेखकीय दुनिया
जो लोग नीलेश मिसरा को मुख्य रूप से एक कहानीकार या बॉलीवुड गीतकार के रूप में जानते हैं उनको यह सम्मान इस बात की याद दिलाता है कि उनकी लेखकीय दुनिया वास्तव में कितनी व्यापक है। नीलेश मिसरा दो महत्वपूर्ण नॉन-फिक्शन पुस्तकों के लेखक हैं। इनमें ‘173 Hours in Captivity’ शामिल है, जिसे आईसी-814 विमान अपहरण की पहली व्यापक और विस्तृत कहानी माना जाता है। दूसरी पुस्तक ‘End of the Line’ है जो नेपाल के शाही परिवार की हत्या की घटना पर आधारित है। उन्होंने लोकप्रिय ‘याद शहर’ श्रृंखला की भी रचना की है। यह श्रृंखला ‘यादों का इडियट बॉक्स’ से विकसित हुई और पहली बार हिंदी ऑडियो स्टोरीटेलिंग को पुस्तक रूप में पाठकों तक लेकर आई।
‘मैं अक्सर सोचता हूँ’: पत्रकारिता नहीं, कल्पना नहीं, एक भीतरी यात्रा
‘मैं अक्सर सोचता हूँ’ उनकी अब तक की अन्य रचनाओं से बिल्कुल अलग है। यह न तो पत्रकारिता है और न ही कथा-साहित्य। यह उस व्यक्ति की भीतरी दुनिया की झलक है, जिसने तीन दशकों तक भारत की खुशियों, दुखों और खामोशियों को ध्यान से सुना और महसूस किया, और फिर उसी अनुभव को अपने भीतर की ओर मोड़ दिया। इस संग्रह की कविताओं में वही सहज, सच्ची और बेबाक ईमानदारी दिखाई देती है, जो उनकी हर रचना की पहचान रही है। ये कविताएँ किसी प्रभाव या प्रदर्शन की कोशिश नहीं करतीं, बल्कि स्वाभाविक रूप से पाठक के मन तक पहुँचती हैं, ठीक वैसे ही जैसे उनकी सर्वश्रेष्ठ रचनाएँ हमेशा पहुँचती रही हैं।
हिंदी भाषा के प्रति आजीवन समर्पण का सम्मान
भारत में हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे होने के अवसर पर प्रदान किया गया दैनिक जागरण कृति सम्मान केवल एक पुस्तक का सम्मान नहीं है बल्कि हिंदी भाषा के प्रति एक जीवनभर की प्रतिबद्धता का सम्मान भी है- वह हिंदी जो बोली जाती है, लिखी जाती है, गाई जाती है और सुनाई जाती है।
कहां उपलब्ध है पुस्तक
‘मैं अक्सर सोचता हूँ’ का प्रकाशन स्लो इम्प्रिंट, गाँव कनेक्शन और एकदा के सहयोग से किया गया है। यह पुस्तक फिलहाल अमेज़न और आपके नज़दीकी बुक स्टोर्स पर उपलब्ध है।