स्कूल में हत्याएं हो रही हैं, अब क्या बच्चों के लिए भी गाइडलाइंस बनाएंगे?

स्कूल में हत्याएं हो रही हैं, अब क्या बच्चों के लिए भी गाइडलाइंस बनाएंगे?फोटो साभार: इंटरनेट

लखनऊ। बीते साल 6 सितंबर को गुरुग्राम के रायन इंटरनेशनल स्कूल में 11वीं के एक छात्र ने स्कूल के टॉयलेट में मात्र सात साल के प्रद्युम्न की हत्या कर दी थी, खूब हंगामा हुआ और स्कूल की गाइडलाइंस में इजाफा किया गया कि स्कूल के टॉयलेट के बाहर ‘आया’ यानि अटेंडेंट जरूर तैनात किया जाए।

चार महीने बाद 16 जनवरी को लखनऊ के ब्राइटलैंड स्कूल में 7वीं की एक छात्रा ने स्कूल के टॉयलेट में ही कक्षा एक के छात्र के मुंह में कपड़ा ठूंसकर चाकू से मार डालने की कोशिश की, मगर शुक्र है छात्र की जान बच गई। मगर गाइडलाइंस बनने के बाद भी हादसा स्कूल के टॉयलेट में ही हुआ।

इस घटना के सिर्फ तीन दिन बाद 20 जनवरी को हरियाणा के यमुनानगर स्थित विवेकानंद स्कूल के 12वीं के एक छात्र ने स्कूल से निष्कासित किए जाने पर अपने पिता की रिवॉल्वर से प्रिंसिपल ऋतु छाबड़ा को गोलियों से छलनी कर दिया, अस्पताल में प्रिंसिपल की मौत हो गई।

बच्चों की सुरक्षा के लिए स्कूल के लिए गाइडलाइंस बनाई गई हैं, वहीं सुप्रीम कोर्ट ने स्कूल बस के लिए भी गाइडलाइंस तय की, ताकि बच्चे सुरक्षित रहें, मगर जब बच्चे ही स्कूल में हत्या जैसे गंभीर अपराधों को अंजाम देने लगे तो सवाल यह उठता है कि क्या अब बच्चों के लिए भी गाइडलाइंस बना दी जाएंगी? मात्र पांच महीनों में स्कूल के अंदर तीन बड़ी घटनाएं, आखिर स्कूल के अंदर इन घटनाओं को कैसे रोका जा सकता है? हम कहां चूक कर रहे हैं?

जिम्मेदारी दोनों की बराबर है, किसी एक की नहीं

स्कूलों की गाइडलाइंस के बावजूद इन घटनाओं के सामने आने के बारे में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के क्रिएटिव कॉन्वेंट स्कूल के स्कूल प्रबंधक योगेंद्र सचान बताते हैं, “बच्चों की सुरक्षा के लिए स्कूलों में गाइडलाइंस जरूरी हैं, मगर कई जगह स्कूल में सभी गाइडलाइंस फॉलो की जाती हैं तो कई स्कूलों में कुछ ही गाइडलाइंस फॉलो की जाती हैं, मगर स्कूलों में ऐसी घटनाओं के सामने आने की बात केवल गाइडलाइंस तक ही सीमित नहीं है।“

दूरियां बढ़ रही हैं…

सचान आगे बताते हैं, “आज के समय में माता-पिता की व्यस्तता के बीच अपने बच्चों से दूरियां बढ़ रही हैं, माता-पिता बच्चों की पढ़ाई के लिए अच्छी सुविधाओं पर पैसे खर्च करते हैं और अच्छे परिणाम चाहते हैं, सारी जिम्मेदारियां स्कूल पर ही छोड़ देते हैं, मगर बच्चों की जितनी जिम्मेदारी स्कूल की है, उतनी ही जिम्मेदारी माता-पिता की भी है। दोनों ओर से बच्चे की बराबर देखभाल से ही बच्चे का भविष्य बनता है। बच्चों पर कुछ रोकटोक भी जरूरी है तो बच्चों का प्रोत्साहन किया जाना भी जरूरी है और यह दोनों तरफ से ही संभव है। “

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बच्चे कभी दोषी नहीं होते

स्कूल में बच्चों की ऐसी हिंसक घटनाएं सामने के बाद बच्चों को दोष दिए जाने के सवाल पर लखनऊ के ही क्राइस्ट चर्च इंटर कॉलेज के प्रिंसिपल राजेश चत्री कहते हैं, “बच्चे कभी दोषी नहीं होते, दोषी होते हैं स्कूल में टीचर और घर में मां-बाप। स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा के लिए गाइडलाइंस बहुत जरूरी हैं, स्कूल के सीसीटीवी कैमरे से आप यह जरूर पता लेंगे कि उस बच्चे को किसने मारा, मगर उस घटना के पीछे की वजह कम नहीं होगी। बच्चों में ऐसी हिंसात्मक घटनाओं को रोकने के लिए जरूरी है कि माता-पिता और शिक्षक अपनी जिम्मेदारियों को बराबरी से समझें।“

मां-बाप और शिक्षक से बड़ा काउंसलर कोई नहीं

कई बड़े स्कूलों में बच्चों के लिए काउंसलर रखे जाने के सवाल पर प्रिंसिपल चत्री आगे कहते हैं, “मां-बाप और टीचर से बड़ा काउंसलर कोई नहीं है। अगर शिक्षक माता-पिता के साथ और माता-पिता शिक्षक के साथ बच्चे की समस्याओं पर ध्यान दें, और साथ मिलकर बच्चे को समझाएं, उसको प्रोत्साहन दें तो ऐसे बच्चे कभी हिंसक प्रवृत्ति नहीं अपनाते हैं। माता-पिता और शिक्षक, एक-दूसरे को नीचा दिखाने के बजाए अगर अपनी जिम्मेदारियों को निभाएं तो निश्चित रूप से बच्चे का भविष्य उज्जवल बनता है।“

हम बच्चों को सीखा क्या रहे हैं?

लखनऊ के जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) मुकेश कुमार मिश्रा ‘गाँव कनेक्शन’ से बातचीत में बताते हैं, “एक बच्चा की पहली पाठशाला घर में उसके माता-पिता ही होते हैं, अगर घर के लोग आपस में खराब व्यवहार करते हैं तो भी बच्चा सीखता है, और अगर अच्छा व्यवहार करते हैं तो भी बच्चा सीखता है, बच्चा जो देखेगा, वो सीखेगा। हम बच्चों को क्या सीखा रहे हैं, यह मायने रखता है। बच्चों में हिंसक प्रवृत्तियों के बढ़ने का एक कारण यह भी है।“

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बच्चे को मालूम था, रिवॉल्वर कहां रखी है

मुकेश कुमार आगे बताते हैं, “हरियाणा में 12वीं के बच्चे ने अपने पिता की रिवॉल्वर से प्रिंसिपल की स्कूल में हत्या कर दी, यह एक संवेदनशील घटना है, यानि बच्चे को मालूम था कि घर में रिवॉल्वर कहां रखी है, पिता ने हथियार को सुरक्षित क्यों नहीं रखा?” उन्होंने आगे कहा, “जरूरी यह है कि विद्यालय और मां-बाप, दोनों ही ओर से बच्चे की समय-समय पर काउंसलिंग करें, बच्चे के साथ अच्छा व्यवहार करें और बच्चे की समस्याओं को साथ मिलकर दूर करें। तभी बच्चों में हिंसक प्रवृत्तियों को रोका जा सकता है।“

मुकेश कुमार ने कहा, “सिर्फ इतना ही नहीं, ऐसी घटनाओं को बढ़ने से रोकने के लिए समाजशास्त्रियों, मनोवैज्ञानिकों, काउंसलर्स, शिक्षाविदों और प्रशासनिक स्तर के अधिकारियों के साथ बैठक कर इसका समाधान निकालना चाहिए और सिर्फ बातचीत तक ही नहीं, इसे धरातल स्तर पर स्कूलों में उतारा जाना चाहिए।“

पढ़ाई बोझ नहीं है

स्कूलों में बच्चों में बढ़ते पढ़ाई के बोझ के सवाल पर क्रिएटिव कॉन्वेंट स्कूल के स्कूल प्रबंधक योगेंद्र सचान बताते हैं, “यह सिर्फ शिक्षक के ऊपर निर्भर होता है कि वह कमजोर से कमजोर बच्चे को कैसे पढ़ाता है। ऐसे में बच्चों के ऊपर पढ़ाई का बोझ नहीं है, शिक्षक अगर बच्चों पर पूरा ध्यान दें और माता-पिता थोड़ा घर में पढ़ने पर ध्यान दें तो बच्चा अच्छा करने की जरूर कोशिश करेगा। दोनों ओर से सहयोग जरूरी है। “

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मेरा बेटा पढ़ता नहीं था, मगर मैं ध्यान देती थी

स्कूलों में बढ़ रही हिंसक घटनाओं पर लखनऊ के बादशाह नगर निवासी गृहणी शिखा शुक्ला (45) बताती हैं, “हरियाणा की घटना चौंकाने वाली है कि कैसे एक बच्चा रिवॉल्वर से स्कूल में प्रिंसिपल की हत्या कर सकता है।“ वह आगे कहती हैं, “मेरा बच्चा भी पढ़ता नहीं था, खेलकूद में लगा रहता था, मगर मैं घर पर भी अपने बच्चे की पढ़ाई पर ध्यान देती थी, पढ़ाई के लिए स्कूल में जाकर शिक्षकों से बात करती थी, शिक्षकों के अनुसार भी बच्चे को पढ़ाती थी, धीरे-धीरे बच्चे ने समझा और पढ़ाई पर ध्यान देना शुरू किया।“ शिखा आगे कहती हैं, “अगर माता-पिता और शिक्षक साथ मिलकर बच्चे पर ध्यान दें तो बच्चे की पढ़ाई के साथ-साथ उसको अनुशासन, व्यवहार में बेहतर परिवर्तन लाया जा सकता है।“

बच्चों में अवसाद के लक्षणों को पहचानें

बच्चों में बढ़ती हिंसक प्रवृत्तियों के सवाल पर डॉ. राम मनोहर लोहिया संयुक्त चिकित्सालय के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. देवाशीष बताते हैं, “जरूरी है कि माता-पिता अपने बच्चों को समय दें, अपने बच्चों से बातचीत करें और हंसे-खेलें।“ आगे बताया, “बच्चों में हिंसात्मक प्रवृत्ति तभी बढ़ती है जब वे अवसाद से ग्रसित हो जाते हैं, इसलिए माता-पिता को अपने बच्चों में अवसाद के लक्षणों को पहचानना चाहिए और उसका समाधान निकालना चाहिए।“

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अभिभावकों-शिक्षकों के बीच बनें गाइडलाइन

दूसरी ओर लखनऊ के अवध कॉलिजिएट के स्कूल प्रबंधक सरबजीत सिंह कहते हैं, “अभिभावकों और शिक्षकों के बीच भी गाइडलाइन बननी चाहिए क्योंकि स्कूल में किसी छोटी बात पर भी कभी-कभी अभिभावक उग्र हो जाते हैं, वहीं दूसरी ओर अभिभावकों की भी शिकायत स्कूल तक सही पहुंचे ताकि बच्चे पर पूरा ध्यान दिया जा सके। इससे स्कूल और अभिभावकों के बीच रिश्ता बेहतर नहीं बन पाता, इसलिए अच्छा होगा कि बच्चे के भविष्य के लिए यह कदम उठाया जाए।“

सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं, मूल्यों की शिक्षा दें

स्कूलों में बढ़ रही हिंसक घटनाओं पर गहरी चिंता जताते हुए सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंड्ररी एजुकेशन (CBSE) के पूर्व निदेशक अशोक गांगुली बताते हैं, “स्कूलों में बच्चों के लिए अच्छा वातावरण बनाना बहुत जरूरी है, बच्चों पर पढ़ाई का दबाव नहीं होना चाहिए और उन्हें व्यवहारिक मूल्यों की भी शिक्षा दी जानी चाहिए, मगर अब ऐसा नहीं दिखता है, अभिभावक और शिक्षक दोनों ही केवल पढ़ाई पर ध्यान देते हैं, अन्य मूल्यों पर नहीं, ऐसे में बच्चे अक्सर अवसाद का शिकार होते हैं और ऐसी हिंसक घटनाएं सामने आती हैं।“

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सिर्फ 90 प्रतिशत अंक चाहिए, आखिर क्यों?

अशोक गांगुली आगे बताते हैं, “आज के समय की पढ़ाई में बच्चों के ऊपर माता-पिता 90 प्रतिशत अंक लाने का दबाव बनाते हैं, और नहीं लाने पर बच्चों पर सवाल उठाते हैं, यह स्थिति खतरनाक है, हर बच्चे की अपनी काबिलियत है, हर बच्चा महत्वपूर्ण है, वह 90 प्रतिशत नहीं लाता तो वह नाकाबिल नहीं है, अगर बच्चा फेल भी होता है, तो तब भी वह नाकाबिल नहीं है, इसलिए ऐसा दबाव माता-पिता और शिक्षक बच्चों पर हटाएं, स्कूलों में बच्चों को बेहतर माहौल मिलना चाहिए और हर एक बच्चे पर ध्यान दिया जाना चाहिए।“

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