‘पढ़ने में अच्छी थी वो, आगे स्कूल नहीं था तो घरवालों ने शादी कर दी’

‘पढ़ने में अच्छी थी वो, आगे स्कूल नहीं था तो घरवालों ने शादी कर दी’फोटो: विनय गुप्ता

लखनऊ। “अभी पिछले साल की बात है, हमारे क्लास में मुनीषा पढ़ने में बहुत अच्छी थी, यहीं रहती थी, आधा किलोमीटर दूर पास के गाँव में, मुनीषा का पढ़ाई में बहुत मन लगता था, मगर हमारा स्कूल आठवीं तक ही था, तो आठवीं तक ही पढ़ सकी। आगे कक्षाएं नहीं थी, तो उसके पिता रामदास ने पढ़ाई छुड़वा कर थोड़े ही समय बाद उसकी शादी भी करा दी।“ यह कहना है उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले से 25 किलोमीटर दूर कादरबाड़ी गाँव के पूर्व माध्यमिक विद्यालय गंगपुर पुख्ता के शिक्षक प्रवीण कुमार का।

यह सिर्फ एक छोटी सी तस्वीर

यह सिर्फ एक छोटी सी तस्वीर है ‘सर्व शिक्षा अभियान’ की, कैसे गाँव में लड़कियां अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ देती हैं और इसके बाद उन्हें पढ़ने का मौका नहीं मिलता। गाँव में आठवीं तक स्कूल होते हैं और हाईस्कूल तक पढ़ने के लिए दूर स्कूल जाना पड़ता है। ऐसे में गाँव के लोग अपनी बच्चियों को दूर स्कूल पढ़ने के लिए नहीं भेजते हैं। ऐसे में या तो वो बाल विवाह का शिकार होती हैं, या फिर पढ़ने की उम्र में घर के कामों में उन्हें लगा दिया जाता है। मगर इससे भी इतर भी एक और तस्वीर है।

हमारे क्षेत्र में तीन साल पहले हाईस्कूल खुला है, मगर वहां केवल एक महिला स्टाफ ही तैनात है, बाकी अन्य स्टाफ है ही नहीं। तीन साल हो गए, मगर वहां स्टाफ की भर्ती नहीं हुई।
प्रवीण कुमार, शिक्षक, पूर्व माध्यमिक विद्यालय गंगपुर पुख्ता, बदायूं

हाईस्कूल खुला, मगर वहां एक शिक्षक है

शिक्षक प्रवीण कुमार फोन पर आगे बताते हैं, “हमारे क्षेत्र में तीन साल पहले हाईस्कूल खुला है, मगर वहां केवल एक महिला स्टाफ ही तैनात है, बाकी अन्य स्टाफ है ही नहीं। तीन साल हो गए, मगर वहां स्टाफ की भर्ती नहीं हुई। वही महिला शिक्षक थोड़े बहुत बच्चों को पढ़ाती है। ऐसे में भला कैसे बच्चों को आगे पढ़ने-लिखने का मौका मिलेगा।“

हालात अच्छे नहीं, 7,429 विद्यालयों में सिर्फ एक शिक्षक

हाल ही में स्टेट कलेक्टिव फॉर राइट टू एजुकेशन (स्कोर) के तहत उत्तर प्रदेश के 35 जिलों के 700 विद्यालयों में सर्वे किया गया। इस सर्वे रिपोर्ट में सामने आया कि उत्तर प्रदेश में कुल 2,24,324 शिक्षकों की कमी है। इनमें शिक्षकों में 1,29,289 शिक्षकों की कमी राज्य स्तर पर है और 95,040 शिक्षकों की कमी सर्व शिक्षा अभियान में है। इतना ही नहीं, इस सर्वे में यह भी सामने आया कि प्रदेश के 7,429 विद्यालयों में सिर्फ एक शिक्षक है। और तो और, सर्वे में शिक्षक के बजाए किसी अन्य व्यक्ति द्वारा संचालन करने की बात भी सामने आई।

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स्कूल में शौचालय न होने से भी बालिकाएं शर्म करती हैं और पढ़ने के लिए नहीं आती हैं। हमारे क्षेत्र में ऐसे विद्यालय हैं, जहां शौचालय या तो हैं ही नहीं, और अगर हैं तो क्षतिग्रस्त पड़े हैं। ऐसी स्थिति में बालिकाएं स्कूल नहीं आती हैं।
मनोज कुमार वाषर्णेय, शिक्षक, पूर्व माध्यमिक विद्यालय गोठा, वजीरगंज, बदायूं

विद्यालयों में शौचालय न होना भी बड़ी रुकावट

स्कोर के सर्वे रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि प्रदेश के विद्यालयों में सिर्फ 66 फीसदी में ही छात्र और छात्राओं के लिए अलग से शौचालय बने हैं। बदायूं के वजीरगंज विकास क्षेत्र में पूर्व माध्यमिक विद्यालय गोठा के शिक्षक मनोज कुमार वाषर्णेय बताते हैं, “यह भी एक बड़ी समस्या है। स्कूल में शौचालय न होने से भी बालिकाएं शर्म करती हैं और पढ़ने के लिए नहीं आती हैं। हमारे क्षेत्र में ऐसे विद्यालय हैं, जहां शौचालय या तो हैं ही नहीं, और अगर हैं तो क्षतिग्रस्त पड़े हैं। ऐसी स्थिति में बालिकाएं स्कूल नहीं आती हैं।“

शिक्षा के अधिकार में बजट की कमी क्यों?

बड़ी बात यह है कि शिक्षा के अधिकार के क्रियान्वयन के लिए बजट में भी कमी की गई है। साल 2010-2011 से लेकर 2015-16 के बीच तक बजट में काफी कमी की गई। इस बीच जहां एक ओर राज्य निधि से 14 फीसदी की कमी की गई, वहीं केंद्र निधि से 32 फीसदी की कमी हुई। राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष जूही सिंह बताती हैं, “खामियां कई हैं और इन खामियों को दूर करने के लिए शिक्षा विभाग, स्वयं सेवी संस्थाओं समेत सरकारी तंत्र को मिलकर और काम करने की जरुरत है, तभी शिक्षा का स्तर सुधर सकता है।“

उन्होंने आगे कहा, “स्कूलों का समय-समय पर निरीक्षण करना भी जरूरी है। इसके अलावा जागरुकता अभियान बड़े पैमाने पर चले, लोग जागरुक होंगे तो वे अपनी बेटियों को पढ़ने के लिए स्कूल भेजेंगे और आगे तक पढ़ाएंगे। हालांकि बजट की कमी भी होना चिंताजनक है, शिक्षा के अधिकार के तहत कुल बजट का कम से कम 25 फीसदी मिलना चाहिए।“

खामियां कई हैं और इन खामियों को दूर करने के लिए शिक्षा विभाग, स्वयं सेवी संस्थाओं समेत सरकारी तंत्र को मिलकर और काम करने की जरुरत है, तभी शिक्षा का स्तर सुधर सकता है।
जूही सिंह, अध्यक्ष , उत्तर प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग

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