Hemant Kumar Pandey

GUEST

Hemant Kumar Pandey

    दिल्ली की गलियों में बच्चों को उम्मीद की किरण दिखा रहे हैं ‘बैक पैक हीरोज’
    दिल्ली की गलियों में बच्चों को उम्मीद की किरण दिखा रहे हैं ‘बैक पैक हीरोज’

    By Hemant Kumar Pandey

    दिल्ली की गलियों में आजकल आपको बच्चों को पढ़ाते, उनके साथ खेलते कुछ बच्चे नज़र आ सकते हैं । ये हैं ‘बैक पैक हीरोज’, जिन्होंने फुटपाथ पर रहने वाले बच्चों को पढ़ाने का बीड़ा उठाया है।

    दिल्ली की गलियों में आजकल आपको बच्चों को पढ़ाते, उनके साथ खेलते कुछ बच्चे नज़र आ सकते हैं । ये हैं ‘बैक पैक हीरोज’, जिन्होंने फुटपाथ पर रहने वाले बच्चों को पढ़ाने का बीड़ा उठाया है।

    बिहार चुनाव में बेरोजगारी का मुद्दा हावी होने के बावजूद कैसे जीता एनडीए?
    बिहार चुनाव में बेरोजगारी का मुद्दा हावी होने के बावजूद कैसे जीता एनडीए?

    By Hemant Kumar Pandey

    तमाम एग्जिट पोल्स को धता बताते हुए बिहार में एनडीए को स्पष्ट बहुमत मिला। इसके कारणों की पड़ताल गांव कनेक्शन से जुड़े स्वतंत्र पत्रकार हेमंत कुमार पाण्डेय ने की है, जो पिछले कुछ महीनों से बिहार के अलग-अलग इलाकों खासकर सीमांचल व मिथिलांचल से लगातार रिपोर्टिंग कर रहे हैं। इन दोनों क्षेत्रों में द्वितीय और तृतीय चरण में चुनाव हुआ था, जहां पर एनडीए को निर्णायक बढ़त मिली है।

    तमाम एग्जिट पोल्स को धता बताते हुए बिहार में एनडीए को स्पष्ट बहुमत मिला। इसके कारणों की पड़ताल गांव कनेक्शन से जुड़े स्वतंत्र पत्रकार हेमंत कुमार पाण्डेय ने की है, जो पिछले कुछ महीनों से बिहार के अलग-अलग इलाकों खासकर सीमांचल व मिथिलांचल से लगातार रिपोर्टिंग कर रहे हैं। इन दोनों क्षेत्रों में द्वितीय और तृतीय चरण में चुनाव हुआ था, जहां पर एनडीए को निर्णायक बढ़त मिली है।

    बिहार: लाख की चूड़ियां बनाने वाले लहठी कारीगरों के पास न पैसा न बाजार, मजबूरी में बन रहे प्रवासी मजदूर
    बिहार: लाख की चूड़ियां बनाने वाले लहठी कारीगरों के पास न पैसा न बाजार, मजबूरी में बन रहे प्रवासी मजदूर

    By Hemant Kumar Pandey

    आपने मधुबनी पेंटिंग का नाम शायद जरुर सुना होगा, इसी जिले में लाख की खास तरह की चूड़ियां भी बनती हैं, जिन्हें लहठी कहा जाता है। मधुबनी के अलावा दरंभगा,समस्तीपुर और मुजफ्फरपुर में भी इन चूड़ियों का काम होता है लेकिन पिछले कुछ वर्षों से ये कारीगर मुश्किल में हैं, जानते हैं क्यों?

    आपने मधुबनी पेंटिंग का नाम शायद जरुर सुना होगा, इसी जिले में लाख की खास तरह की चूड़ियां भी बनती हैं, जिन्हें लहठी कहा जाता है। मधुबनी के अलावा दरंभगा,समस्तीपुर और मुजफ्फरपुर में भी इन चूड़ियों का काम होता है लेकिन पिछले कुछ वर्षों से ये कारीगर मुश्किल में हैं, जानते हैं क्यों?

    बाढ़ की त्रासदी ने जिन वृद्धों की राहों को मिटा दिया, अब वे अपने समाज और परिवार को नई दिशा दे रहे हैं
    बाढ़ की त्रासदी ने जिन वृद्धों की राहों को मिटा दिया, अब वे अपने समाज और परिवार को नई दिशा दे रहे हैं

    By Hemant Kumar Pandey

    साल 2008 में कोसी की बाढ़ ने बिहार के कई जिलों में भयंकर तबाही मचाई थी। इनमें सबसे अधिक प्रभावित होने वाले बुजुर्ग ही थे। लेकिन अब ये अपनी जरूरतों के लिए संतानों की ओर नहीं, बल्कि संतान इनकी ओर देख रहे हैं।

    साल 2008 में कोसी की बाढ़ ने बिहार के कई जिलों में भयंकर तबाही मचाई थी। इनमें सबसे अधिक प्रभावित होने वाले बुजुर्ग ही थे। लेकिन अब ये अपनी जरूरतों के लिए संतानों की ओर नहीं, बल्कि संतान इनकी ओर देख रहे हैं।

    बिहार: लॉकडाउन के बाद नदी के कटान के कारण फिर से घर वापसी को मजबूर कोसी क्षेत्र के प्रवासी मजदूर
    बिहार: लॉकडाउन के बाद नदी के कटान के कारण फिर से घर वापसी को मजबूर कोसी क्षेत्र के प्रवासी मजदूर

    By Hemant Kumar Pandey

    लॉकडाउन की मार सहने के बाद बीते महीने ही कोसी तटबंध के भीतरी इलाके से बड़ी संख्या में मजदूरों का पलायन बड़े शहरों की तरफ हुआ था, लेकिन एक महीने के भीतर ही एक बार फिर ये अपने घर वापस लौटने को मजबूर हो गए हैं।

    लॉकडाउन की मार सहने के बाद बीते महीने ही कोसी तटबंध के भीतरी इलाके से बड़ी संख्या में मजदूरों का पलायन बड़े शहरों की तरफ हुआ था, लेकिन एक महीने के भीतर ही एक बार फिर ये अपने घर वापस लौटने को मजबूर हो गए हैं।

    जिस विकास की बात बिहार सरकार करती है, उस विकास को कोसी की जनता पहचान ही नहीं पा रही
    जिस विकास की बात बिहार सरकार करती है, उस विकास को कोसी की जनता पहचान ही नहीं पा रही

    By Hemant Kumar Pandey

    बिहार: भले ही हर साल आने वाली बाढ़ के चलते तटबंध के भीतर की जमीन बाहर की तुलना में कुछ अधिक ऊंची हो गई हो, लेकिन यहां के लाखों लोगों के जीवन का स्तर नहीं उठ पाया है।

    बिहार: भले ही हर साल आने वाली बाढ़ के चलते तटबंध के भीतर की जमीन बाहर की तुलना में कुछ अधिक ऊंची हो गई हो, लेकिन यहां के लाखों लोगों के जीवन का स्तर नहीं उठ पाया है।