घट रही है भदावरी भैंस की संख्या, अगर अब भी ध्यान न दिया तो अपने ही क्षेत्र से गायब हो जाएगी भदावरी

वर्तमान में भदावरी नस्ल की भैंस अपने पंरपरागत क्षेत्रों में भी कम ही दिखाई देती है। कहना गलत नहीं होगा यदि यही हाल रहा तो यह नस्ल कुछ ही वर्षों में अपने पैतृक क्षेत्र से ही विलुप्त न हो जाये।

Dr. Satyendra Pal SinghDr. Satyendra Pal Singh   10 Aug 2021 7:49 AM GMT

घट रही है भदावरी भैंस की संख्या, अगर अब भी ध्यान न दिया तो अपने ही क्षेत्र से गायब हो जाएगी भदावरी

भदावरी भैंस। फोटो- केंद्रीय भैंस अनुसंधान संस्थान

भदावरी भैंस के दूध में भैंस की दूसरी नस्लों की तुलना में सबसे अधिक फैट होता है, लेकिन फिर भी पिछले कुछ वर्षों में भैंस की इस नस्ल की संख्या घटती जा रही है।

दुनिया में सर्वाधिक वसा प्रतिशत के लिये पहचानी जाने वाली भैंस की भदावरी नस्ल मध्य प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश के एक क्षेत्र विशेष की प्रमुख नस्ल है। इसकी उत्पति और उद्भव इस क्षेत्र का माना जाता है। यह नस्ल इस क्षेत्र की प्राकृतिक स्थितियों व जलवायु के अनुकूल है। आजादी से पहले आगरा, इटावा, भिण्ड, मुरैना और ग्वालियर जनपदों के कुछ हिस्सों को मिलाकर एक छोटा सा राज्य था, जिसे भदावर एस्टेट के रूप में जाना जाता था। भैंस की यह नस्ल भदावर राज्य में ही विकसित हुई इसीलिए इसका नाम भदावरी पड़ा।

वर्तमान में इस नस्ल की भैंस आगरा की बाह तहसील, भिण्ड के भिण्ड और अटेर तहसील, इटावा (चकनगर, वढ़पुरा) औरैया व जालौन में यमुना किनारे, मुरैना में चम्बल नदी के आस-पास और ग्वालियर के कुछ क्षेत्रों में देखी जाती है।

लेकिन जमीनी हकीकत के अनुसार पिछले कई वर्षों से भदावरी नस्ल की भैंसों की संख्या लगातार घटती जा रही है। इसका प्रमुख कारण इन क्षेत्रों में भदावरी नस्लों के सांड़ों का अभाव और किसानों का मुर्रा नस्ल की तरफ बढ़ता रूझान है। वर्तमान में भदावरी नस्ल की भैंस अपने पंरपरागत क्षेत्रों में भी कम ही दिखाई देती है। कहना गलत नहीं होगा यदि यही हाल रहा तो यह नस्ल कुछ ही वर्षों में अपने पैतृक क्षेत्र से ही विलुप्त न हो जाये।


भदावरी नस्ल के पशुओं का शारीरिक आकार मध्यम, रंग तांबिया और शरीर पर बाल कम होते हैं। टांगे छोटी व मजबूत होती हैं। घुटने के नीचे का हिस्सा हल्के-पीले रंग का होता है। सिर के अगले हिस्से पर आंखों के उपर वाली भाग सफेदी लिये हुये होता है। गर्दन के नीचे भाग पर दो सफेद धांरियां होती हैं जिन्हे कंठमाला अथवा जनेऊ कहते हैं। अयन अथवा इसके आसपास की त्वचा का रंग हल्का गुलाबी होता है। सींग नुकीले तलवार के समान होते हैं। इस नस्ल के पशुओं का औसत वजन 300 से 400 किग्रा तक होता है।

छोटे आकार एवं कम वजन होने के कारण इसे कम संसाधनों के साथ लघु सीमांत किसानों, भूमिहीन पशुपालकों द्वारा बखूबी पाला जा सकता है। इस नस्ल के पशु विषम परिस्थितियों में रहने की क्षमता रखते हैं और अति गर्म और आर्द्र जलवायु में भी आराम से रह सकते हैं। इस नस्ल के नर उच्च तापमान को सहन करने के साथ ही अच्छे भारोत्तोलक होते हैं। इस नस्ल के पशु कई बीमारियों के प्रति रोग प्रतिरोधी पाये गये हैं। भदावरी भैंस के बच्चों में भी मृत्युदर भैंसो की अन्य नस्लों की तुलना में काफी कम है।

भदावरी भैंस की नस्लों से औसतन एक ब्यांत में 1200 से 1400 किग्रा तक दूध प्राप्त होता है। भदावरी भैस प्रतिदिन औसतन 4 से 5 किग्रा तक दूध दे देती है। भदावरी नस्ल की भैंस के दूध में विश्व में सर्वाधिक मात्रा में वसा का प्रतिशत पाया जाता है। इस भैंस के दूध से सर्वाधिक 8.5 से लेकर 14 प्रतिशत तक वसा की मात्रा प्राप्त की जा सकती है। यह नस्ल मोटा चारा-दाना खाकर उसको अच्छी वसा प्रतिशत में बदलने की क्षमता रखती है।

गांवों में एक कहावत है कि भदावरी भैंस के आठ दिन के दूध में एक दिन के दूध की मात्रा के बराबर घी निकलता है। अर्थात प्रतिदिन 5 किग्रा दूध देने वाली भैस से आठ दिन में 5 किग्रा घी निकल आता (12.5 प्रतिशत के बराबर) है। दूरदराज के गांवों में जहां दूध बिक्री कर पाना मुश्किल होता है। वहीं पशुपालकों को दूध की कीमत भी बहुत कम मिल पाती है। इन दूरदराज के गांवों के पशुपालक किसान कम खर्चे एवं कम देखभाल में भदावरी नस्ल का पालन करके दूध से अधिक मात्रा में घी बनाकर अच्छी आमदनी प्राप्त कर सकते हैं।

भदावरी भैंस और भदावरी नस्ल का सांड़।

इस नस्ल के संरक्षण का कार्य भदावरी भैस संरक्षण एवं संर्वधन परियोजना के तहतः भारतीय चारागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान, झांसी पर नेटवर्क परियोजना के माध्यम से किया जा रहा है। इस परियोजना के अंतर्गत भदावरी नस्ल के संरक्षण एवं सुधार हेतु उत्तम सांड़ों का विकास किया जा रहा है।

परियोजना में भदावरी सांड़ों का वीर्य हिमीकरण करके उसको भविष्य में इस्तेमाल के लिए सुरक्षित ही नहीं रखा जा रहा है अपितु इस नस्ल के प्रजनन क्षेत्र आगरा, इटावा, मुरैना, ग्वालियर, ललितपुर, झांसी आदि जिलों में भी भारतीय चारागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान, झांसी द्वारा परियोजना के तहतः राज्य सरकारों द्वारा संचालित कृत्रिम गर्भाधान केंद्रों पर उपलब्ध कराया जा रहा है।

परियोजना का मुख्य उद्देश्य प्रजनन हेतु उच्च कोटि के सांड और उनका वीर्य किसान-पशुपालकों को कृत्रिम गर्भाधान के लिए उपलब्ध कराना है। भदावरी नस्ल के पशुओं के संरक्षण को और अधिक बढ़ावा देने के लिए झांसी से मध्य प्रदेश पशुधन एवं कुक्कट विकास परिषद, भोपाल, पशुधन विकास परिषद, लखनऊ, बैफ, पंडित दीन दयाल उपाध्याय पशुचिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय एवं गो-अनुसंधान संस्थान (दुवासु) मथुरा आदि स्थानों पर ले जाया जा रहा हैं। जिनका उपयोग प्रजनन एवं वीर्य हिमीकरण हेतु किया जा रहा है।

आज भदावरी नस्ल को बढ़ावा देने के लिए कृत्रिम गर्भाधान के माध्यम से इनका का संरक्षण एवं संर्वधन करने की जरूरत है जिससे उनके उत्पादन एवं वर्तमान स्थिति में सुधार किया जा सके। जलवायु परिवर्तन की परिस्थितियों की चुनौतियों को देखते है कहना गलत नहीं होगा कि भदावरी जैसी भैंस की नस्ल भविष्य का दुधारू पशु है।

(डॉ सत्येंद्र पाल सिंह, कृषि विज्ञान केंद्र, शिवपुरी, मध्य प्रदेश के प्रमुख और वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं, यह उनके निजी विचार हैं।)

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