By Dr SB Misra
भारत की खेती 10,000 साल पुरानी है, लेकिन आज किसान अपने ही खेत में असहाय खड़ा है। कैसे विकास के गलत मॉडल, रसायनिक खेती और नीतिगत खैरात ने किसान को आत्मनिर्भर से आश्रित बना दिया।
भारत की खेती 10,000 साल पुरानी है, लेकिन आज किसान अपने ही खेत में असहाय खड़ा है। कैसे विकास के गलत मॉडल, रसायनिक खेती और नीतिगत खैरात ने किसान को आत्मनिर्भर से आश्रित बना दिया।
By Dr SB Misra
गाँव में आज भी चिकित्सा व्यवस्था संतोषजनक नहीं है। 70% आबादी गाँवों में रहती है, लेकिन डॉक्टरों का सिर्फ़ 26% हिस्सा वहां उपलब्ध है। अस्पतालों की कमी, दवाइयों का अभाव, झोलाछाप डॉक्टरों का बोलबाला और तेजी से बढ़ती शहरी बीमारियां, ग्रामीण स्वास्थ्य को बड़ी चुनौती के रूप में खड़ी कर रही हैं।
गाँव में आज भी चिकित्सा व्यवस्था संतोषजनक नहीं है। 70% आबादी गाँवों में रहती है, लेकिन डॉक्टरों का सिर्फ़ 26% हिस्सा वहां उपलब्ध है। अस्पतालों की कमी, दवाइयों का अभाव, झोलाछाप डॉक्टरों का बोलबाला और तेजी से बढ़ती शहरी बीमारियां, ग्रामीण स्वास्थ्य को बड़ी चुनौती के रूप में खड़ी कर रही हैं।
By Dr SB Misra
एक समय था जब गाँवों की लाइफ साइकिल और बैलगाड़ी तक सीमित थी। आज वहां मोटरसाइकिल, कार और ट्रैक्टर की भरमार है, लेकिन ड्राइविंग ट्रेनिंग और ट्रैफिक नियमों की समझ पीछे छूट गई। नतीजा: दुर्घटनाएं बढ़ रहीं, और जिम्मेदारी कोई लेने को तैयार नहीं।
एक समय था जब गाँवों की लाइफ साइकिल और बैलगाड़ी तक सीमित थी। आज वहां मोटरसाइकिल, कार और ट्रैक्टर की भरमार है, लेकिन ड्राइविंग ट्रेनिंग और ट्रैफिक नियमों की समझ पीछे छूट गई। नतीजा: दुर्घटनाएं बढ़ रहीं, और जिम्मेदारी कोई लेने को तैयार नहीं।
By Dr SB Misra
मन में एक सवाल आना स्वाभाविक है कि आखिर धर्म मनुष्य के अस्तित्व के लिए कितना जरूरी है? आखिर मनुष्य कोई धर्म लेकर तो पैदा नहीं होता; उसे जिस परिवार में वह पैदा हुआ, उसके बड़े-बूढ़ों से धर्मज्ञान मिलता है।
मन में एक सवाल आना स्वाभाविक है कि आखिर धर्म मनुष्य के अस्तित्व के लिए कितना जरूरी है? आखिर मनुष्य कोई धर्म लेकर तो पैदा नहीं होता; उसे जिस परिवार में वह पैदा हुआ, उसके बड़े-बूढ़ों से धर्मज्ञान मिलता है।
By Dr SB Misra
आधुनिक भारत में हम भले ही तकनीक और विकास की राह पर आगे बढ़ गए हों, पर हमारी नैतिकता, शिक्षा और संस्कृति पीछे छूटती जा रही है। कैसे औपनिवेशिक मानसिकता, अंधी आधुनिकता और मूल्यों का ह्रास आज के समाज, राजनीति और शिक्षा- सबको प्रभावित कर रहा है।
आधुनिक भारत में हम भले ही तकनीक और विकास की राह पर आगे बढ़ गए हों, पर हमारी नैतिकता, शिक्षा और संस्कृति पीछे छूटती जा रही है। कैसे औपनिवेशिक मानसिकता, अंधी आधुनिकता और मूल्यों का ह्रास आज के समाज, राजनीति और शिक्षा- सबको प्रभावित कर रहा है।
By Dr SB Misra
आजकल दिन-प्रतिदिन उच्च शिक्षा की आवश्यकता पड़ती जा रही है — फिर चाहे कंप्यूटर, एयरोनॉटिक्स अथवा अन्य क्षेत्रों की बात हो। अब तो ए.आई. अर्थात आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का युग आने वाला है और उसके लिए उच्च शिक्षा का महत्व और भी बढ़ गया है।
आजकल दिन-प्रतिदिन उच्च शिक्षा की आवश्यकता पड़ती जा रही है — फिर चाहे कंप्यूटर, एयरोनॉटिक्स अथवा अन्य क्षेत्रों की बात हो। अब तो ए.आई. अर्थात आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का युग आने वाला है और उसके लिए उच्च शिक्षा का महत्व और भी बढ़ गया है।
By Dr SB Misra
आज के समय में गाँव-गाँव में प्राइमरी स्कूल खुले हैं और हर पंचायत में एक सीनियर प्राइमरी यानी कक्षा 6, 7, 8 के लिए विद्यालय मौजूद है। पहले की अपेक्षा अच्छे भवन हैं, अधिक संख्या में अध्यापक, कुर्सी, मेज, ब्लैकबोर्ड सब कुछ है। लेकिन फिर भी शिक्षा का स्तर दयनीय है।
आज के समय में गाँव-गाँव में प्राइमरी स्कूल खुले हैं और हर पंचायत में एक सीनियर प्राइमरी यानी कक्षा 6, 7, 8 के लिए विद्यालय मौजूद है। पहले की अपेक्षा अच्छे भवन हैं, अधिक संख्या में अध्यापक, कुर्सी, मेज, ब्लैकबोर्ड सब कुछ है। लेकिन फिर भी शिक्षा का स्तर दयनीय है।
By Divendra Singh
कैसे पिछले 80 वर्षों में गाँवों का भौतिक विकास हुआ, लेकिन इसके साथ-साथ ग्रामीण संस्कृति, पारंपरिक जीवनशैली और परिवार भाव में कमी आई।
कैसे पिछले 80 वर्षों में गाँवों का भौतिक विकास हुआ, लेकिन इसके साथ-साथ ग्रामीण संस्कृति, पारंपरिक जीवनशैली और परिवार भाव में कमी आई।
By Dr SB Misra
भारत में संचार माध्यमों की यात्रा अनोखी रही है। कभी हल्कारा और डुग्गी के जरिए संदेश पहुँचाए जाते थे, तो आज डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हावी है। जानिए कैसे स्वतंत्रता संग्राम, अखबार, रेडियो, टीवी और विज्ञापनों ने संचार की विश्वसनीयता को आकार दिया।
भारत में संचार माध्यमों की यात्रा अनोखी रही है। कभी हल्कारा और डुग्गी के जरिए संदेश पहुँचाए जाते थे, तो आज डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हावी है। जानिए कैसे स्वतंत्रता संग्राम, अखबार, रेडियो, टीवी और विज्ञापनों ने संचार की विश्वसनीयता को आकार दिया।
By Dr SB Misra
भारत विभाजन को लेकर आज भी बहस जारी है। उस समय तीन प्रमुख हस्ताक्षरों - नेहरू, जिन्ना और माउंटबेटन - ने इतिहास की दिशा तय की। गांधी जी कट्टर विरोधी थे और आख़िरी क्षण तक विभाजन रोकने की कोशिश करते रहे। लेकिन क्या बँटवारा टाला जा सकता था? और असली जिम्मेदारी किसकी थी - नेताओं की महत्वाकांक्षा, अंग्रेज़ों की रणनीति या हालात की मजबूरी? यह लेख उन्हीं सवालों पर गहराई से नज़र डालता है।
भारत विभाजन को लेकर आज भी बहस जारी है। उस समय तीन प्रमुख हस्ताक्षरों - नेहरू, जिन्ना और माउंटबेटन - ने इतिहास की दिशा तय की। गांधी जी कट्टर विरोधी थे और आख़िरी क्षण तक विभाजन रोकने की कोशिश करते रहे। लेकिन क्या बँटवारा टाला जा सकता था? और असली जिम्मेदारी किसकी थी - नेताओं की महत्वाकांक्षा, अंग्रेज़ों की रणनीति या हालात की मजबूरी? यह लेख उन्हीं सवालों पर गहराई से नज़र डालता है।
By Gaon Connection
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By Divendra Singh
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