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क्यों दिशाहीन हो रहे हैं देश के नौजवान?
क्यों दिशाहीन हो रहे हैं देश के नौजवान?

By Dr SB Misra

भारत ही नहीं, दुनिया के कई देशों में आज नौजवान उद्दंडता, विद्रोह और अनुशासनहीनता की राह पर दिखाई दे रहे हैं। बेरोज़गारी, दिशाहीन शिक्षा, सामाजिक संस्कारों का अभाव और उचित मार्गदर्शन न मिलना, युवा ऊर्जा को रचनात्मक के बजाय विध्वंसक बना रहा है।

भारत ही नहीं, दुनिया के कई देशों में आज नौजवान उद्दंडता, विद्रोह और अनुशासनहीनता की राह पर दिखाई दे रहे हैं। बेरोज़गारी, दिशाहीन शिक्षा, सामाजिक संस्कारों का अभाव और उचित मार्गदर्शन न मिलना, युवा ऊर्जा को रचनात्मक के बजाय विध्वंसक बना रहा है।

नोट बदले, सिस्टम नहीं बदला: काले धन की जड़ें अब भी मज़बूत
नोट बदले, सिस्टम नहीं बदला: काले धन की जड़ें अब भी मज़बूत

By Dr SB Misra

नोटबंदी को काले धन पर निर्णायक प्रहार बताया गया था, लेकिन क्या यह वास्तव में अपने उद्देश्य में सफल रही? यह लेख पड़ताल करता है कि कैसे काला धन केवल नोटों में नहीं, बल्कि ज़मीन, संपत्ति, सोना, राजनीति और विदेशों में छिपा रहा।

नोटबंदी को काले धन पर निर्णायक प्रहार बताया गया था, लेकिन क्या यह वास्तव में अपने उद्देश्य में सफल रही? यह लेख पड़ताल करता है कि कैसे काला धन केवल नोटों में नहीं, बल्कि ज़मीन, संपत्ति, सोना, राजनीति और विदेशों में छिपा रहा।

विरोध की राजनीति में संवाद की भाषा: अटल जी की विरासत
विरोध की राजनीति में संवाद की भाषा: अटल जी की विरासत

By Dr SB Misra

अटल बिहारी वाजपेयी सिर्फ़ एक प्रधानमंत्री नहीं थे, बल्कि भारतीय राजनीति में संवाद, सहिष्णुता और नैतिक साहस की दुर्लभ मिसाल थे। छात्र जीवन में साम्यवादी संगठन से लेकर संघ, जनसंघ, जनता पार्टी और अंततः भाजपा तक उनका सफ़र विचारधाराओं की जकड़न से ऊपर मानवीय मूल्यों की खोज है।

अटल बिहारी वाजपेयी सिर्फ़ एक प्रधानमंत्री नहीं थे, बल्कि भारतीय राजनीति में संवाद, सहिष्णुता और नैतिक साहस की दुर्लभ मिसाल थे। छात्र जीवन में साम्यवादी संगठन से लेकर संघ, जनसंघ, जनता पार्टी और अंततः भाजपा तक उनका सफ़र विचारधाराओं की जकड़न से ऊपर मानवीय मूल्यों की खोज है।

पानी की आत्मकथा: बादल से धरती और फिर समुद्र तक
पानी की आत्मकथा: बादल से धरती और फिर समुद्र तक

By Dr SB Misra

ग्रामीण भारत की जल-व्यवस्था कभी सामुदायिक तालाबों और कुओं पर टिकी थी। आज वही संरचनाएँ उपेक्षा और अतिक्रमण का शिकार हैं। अगर गाँवों की जल-धरोहर बचाई जाए, तो देश के जल संकट से निपटा जा सकता है।

ग्रामीण भारत की जल-व्यवस्था कभी सामुदायिक तालाबों और कुओं पर टिकी थी। आज वही संरचनाएँ उपेक्षा और अतिक्रमण का शिकार हैं। अगर गाँवों की जल-धरोहर बचाई जाए, तो देश के जल संकट से निपटा जा सकता है।

जब गाँव बदले, खेती बदली और किसान अकेला पड़ गया
जब गाँव बदले, खेती बदली और किसान अकेला पड़ गया

By Dr SB Misra

भारत की खेती 10,000 साल पुरानी है, लेकिन आज किसान अपने ही खेत में असहाय खड़ा है। कैसे विकास के गलत मॉडल, रसायनिक खेती और नीतिगत खैरात ने किसान को आत्मनिर्भर से आश्रित बना दिया।

भारत की खेती 10,000 साल पुरानी है, लेकिन आज किसान अपने ही खेत में असहाय खड़ा है। कैसे विकास के गलत मॉडल, रसायनिक खेती और नीतिगत खैरात ने किसान को आत्मनिर्भर से आश्रित बना दिया।

ग्रामीण भारत की बड़ी चुनौती: आज भी अधूरी चिकित्सा व्यवस्था
ग्रामीण भारत की बड़ी चुनौती: आज भी अधूरी चिकित्सा व्यवस्था

By Dr SB Misra

गाँव में आज भी चिकित्सा व्यवस्था संतोषजनक नहीं है। 70% आबादी गाँवों में रहती है, लेकिन डॉक्टरों का सिर्फ़ 26% हिस्सा वहां उपलब्ध है। अस्पतालों की कमी, दवाइयों का अभाव, झोलाछाप डॉक्टरों का बोलबाला और तेजी से बढ़ती शहरी बीमारियां, ग्रामीण स्वास्थ्य को बड़ी चुनौती के रूप में खड़ी कर रही हैं।

गाँव में आज भी चिकित्सा व्यवस्था संतोषजनक नहीं है। 70% आबादी गाँवों में रहती है, लेकिन डॉक्टरों का सिर्फ़ 26% हिस्सा वहां उपलब्ध है। अस्पतालों की कमी, दवाइयों का अभाव, झोलाछाप डॉक्टरों का बोलबाला और तेजी से बढ़ती शहरी बीमारियां, ग्रामीण स्वास्थ्य को बड़ी चुनौती के रूप में खड़ी कर रही हैं।

सड़कें बनीं, वाहन बढ़े… लेकिन सुरक्षा कहाँ? ग्रामीण भारत में बढ़ती दुर्घटनाओं पर सवाल
सड़कें बनीं, वाहन बढ़े… लेकिन सुरक्षा कहाँ? ग्रामीण भारत में बढ़ती दुर्घटनाओं पर सवाल

By Dr SB Misra

एक समय था जब गाँवों की लाइफ साइकिल और बैलगाड़ी तक सीमित थी। आज वहां मोटरसाइकिल, कार और ट्रैक्टर की भरमार है, लेकिन ड्राइविंग ट्रेनिंग और ट्रैफिक नियमों की समझ पीछे छूट गई। नतीजा: दुर्घटनाएं बढ़ रहीं, और जिम्मेदारी कोई लेने को तैयार नहीं।

एक समय था जब गाँवों की लाइफ साइकिल और बैलगाड़ी तक सीमित थी। आज वहां मोटरसाइकिल, कार और ट्रैक्टर की भरमार है, लेकिन ड्राइविंग ट्रेनिंग और ट्रैफिक नियमों की समझ पीछे छूट गई। नतीजा: दुर्घटनाएं बढ़ रहीं, और जिम्मेदारी कोई लेने को तैयार नहीं।

मानव अस्तित्व और धर्म: जनहित में कैसा हो हमारा आध्यात्मिक स्वरूप?
मानव अस्तित्व और धर्म: जनहित में कैसा हो हमारा आध्यात्मिक स्वरूप?

By Dr SB Misra

मन में एक सवाल आना स्वाभाविक है कि आखिर धर्म मनुष्य के अस्तित्व के लिए कितना जरूरी है? आखिर मनुष्य कोई धर्म लेकर तो पैदा नहीं होता; उसे जिस परिवार में वह पैदा हुआ, उसके बड़े-बूढ़ों से धर्मज्ञान मिलता है।

मन में एक सवाल आना स्वाभाविक है कि आखिर धर्म मनुष्य के अस्तित्व के लिए कितना जरूरी है? आखिर मनुष्य कोई धर्म लेकर तो पैदा नहीं होता; उसे जिस परिवार में वह पैदा हुआ, उसके बड़े-बूढ़ों से धर्मज्ञान मिलता है।

विकास की दौड़ में पीछे छूटती भारतीय संस्कृति
विकास की दौड़ में पीछे छूटती भारतीय संस्कृति

By Dr SB Misra

आधुनिक भारत में हम भले ही तकनीक और विकास की राह पर आगे बढ़ गए हों, पर हमारी नैतिकता, शिक्षा और संस्कृति पीछे छूटती जा रही है। कैसे औपनिवेशिक मानसिकता, अंधी आधुनिकता और मूल्यों का ह्रास आज के समाज, राजनीति और शिक्षा- सबको प्रभावित कर रहा है।

आधुनिक भारत में हम भले ही तकनीक और विकास की राह पर आगे बढ़ गए हों, पर हमारी नैतिकता, शिक्षा और संस्कृति पीछे छूटती जा रही है। कैसे औपनिवेशिक मानसिकता, अंधी आधुनिकता और मूल्यों का ह्रास आज के समाज, राजनीति और शिक्षा- सबको प्रभावित कर रहा है।

उच्च शिक्षा का असली लक्ष्य - विशेषज्ञता, न कि भीड़ बढ़ाना
उच्च शिक्षा का असली लक्ष्य - विशेषज्ञता, न कि भीड़ बढ़ाना

By Dr SB Misra

आजकल दिन-प्रतिदिन उच्च शिक्षा की आवश्यकता पड़ती जा रही है — फिर चाहे कंप्यूटर, एयरोनॉटिक्स अथवा अन्य क्षेत्रों की बात हो। अब तो ए.आई. अर्थात आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का युग आने वाला है और उसके लिए उच्च शिक्षा का महत्व और भी बढ़ गया है।

आजकल दिन-प्रतिदिन उच्च शिक्षा की आवश्यकता पड़ती जा रही है — फिर चाहे कंप्यूटर, एयरोनॉटिक्स अथवा अन्य क्षेत्रों की बात हो। अब तो ए.आई. अर्थात आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का युग आने वाला है और उसके लिए उच्च शिक्षा का महत्व और भी बढ़ गया है।

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