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अक्टूबर महीने में शुरू कर सकते हैं साइलेज बनाने का काम, गर्मियों में मिलेगा फायदा

अच्छे दुग्ध उत्पादन के लिए दुधारु पशुओं के लिए पौष्टिक दाने और चारे के साथ हरा चारा खिलाना बहुत जरुरी है। हरे चारा पशुओं के अंदर पोषक तत्वों की कमी को पूरा करता है। एक दुधारू पशु जिस का औसत वजन 550 किलोग्राम हो, उसे 25 किलोग्राम की मात्रा में साइलेज खिलाया जा सकता है।

Diti BajpaiDiti Bajpai   7 Sep 2018 1:01 PM GMT

अक्टूबर महीने में शुरू कर सकते हैं साइलेज बनाने का काम, गर्मियों में मिलेगा फायदा

लखनऊ।लखनऊ। जुलाई से लेकर अक्टूबर तक पशुपालक के पास पर्याप्त मात्रा में हरा चारा और घास उपलब्ध होती है। यह हरा चारा खराब किए बिना पशुपालक उन दिनों के लिए सुरक्षित कर सकते है जब हरे चारे की कमी होती है।

''हरे चारे की सबसे ज्यादा कमी होती है तो वो गर्मियों का समय है। पशुपालक अपने घर के आस-पास गड्ढ़ा करके साइलेज को बना सकता है। इसको खिलाने से पशुओं के दुग्ध उत्पादन भी अच्छा होता है और लागत भी बहुत ज्यादा नहीं आती है।'' पशुचिकित्सक डॉ जलाद्दुीन।

अच्छे दुग्ध उत्पादन के लिए दुधारु पशुओं के लिए पौष्टिक दाने और चारे के साथ हरा चारा खिलाना बहुत जरुरी है। हरे चारा पशुओं के अंदर पोषक तत्वों की कमी को पूरा करता है। एक दुधारू पशु जिस का औसत वजन 550 किलोग्राम हो, उसे 25 किलोग्राम की मात्रा में साइलेज खिलाया जा सकता है। भेड़-बकरियों को खिलाई जाने वाली मात्रा 5 किलोग्राम तक रखी जाती है।

डॉ जलाद्दुीन आगे बताते हैं, ''भूसे की जगह अगर साइलेज खिलाता है तो एक से ढ़ेड किलो तक ज्यादा उत्पादन होता है। साइलेज सुपाच्य और अधिक पोषक तत्व के कारण पशुओं को खिलाने से उनके दुग्ध उत्पादन में वृद्धि होती है। इसके लिए सरकार यूरिया, पॉलिथिन और हजारा (पानी के छिड़काव) किसानों को मुफ्त उपलब्ध कराती है। इसके लिए ग्राम प्रधान के माध्यम से चयन होता है।''

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प्रशिक्षण के बारे में डॉ जलाद्दुीन बताते हैं, अगर कोई भी किसान इसे शुरू करता है तो पहले प्रशिक्षण ले लें। यह प्रशिक्षण अपने निकटतम ब्लॉक स्तरीय पशुचिकित्सक से भी ले सकते है। किसानों के साइलेज एक अच्छा विकल्प है।''

साइलेज बनाना

साइलेज उस पदार्थ को कहते हैं जो कि अधिक नमी वाले चारे को हवा रहित नियंत्रित रखा जाता है। साइलेज बनाने के लिए गड्ढे की आवश्यकता होती है जिसे साइलो कहते हैं। जब हरे चारे को हवा की अनुपस्थिति में किण्वन किया जाता है तो लैक्टिक अम्ल पैदा होता है। यह हरे चारे को अधिक समय तक सुरक्षित रखने में सहायक होता है।


साइलेज बनाने के लिए उत्तम फसलें

अच्छा साइलेज बनाने के लिए यह आवश्यक है कि फसल का चुनाव अच्छी प्रकार से किया जाय और उसे ठीक अवस्था में काटकर कुट्टी की जाए। जिस चारे की फसल में शर्करा अच्छी तरह नहीं मिलेगी तो अच्छा साइलेज नहीं बनेगा। अच्छा साइलेज बनाने के लिए चारा फसलों की कटाई फूल आने की अवस्था में करनी चाहिए। अनाज वाली हरी फसलें जैसे मक्का, बाजरा, ज्वार, जई साइलेज बनाने के लिए सही है। इन फसलों में शर्करा की मात्रा अधिक होने के कारण प्राकृतिक किण्वन अच्छा होता है। अलावा दलहनी फसलों के साथ अगोला और धान कर हरा पौधा (सहादा) मिलाकर उसके ऊपर लगभग 3-5 प्रतिशत शीरा मिलाकर उत्तम किस्म का साइलेज तैयार कर सकते हैं।

साइलेज बनाने की विधि

साइलेज बनाने के लिए ऐसे हरे चारे जिसमें शुष्क पदार्थ की मात्रा 25-30 प्रतिशत हो, कुट्टी बनाकर साइलेज बनाने वाले गड्ढों में दबा दबा कर इस तरह भरा जाना चाहिए कि कटे हुए चारे के बीच में कम से कम हवा रहे। हवा बाहर निकलने से किण्वन जल्दी शुरू हो जाता है। कुट्टी बनाने से कम जगह से अधिक चारा भरा जा सकता है। चारे को साइलो की दीवारों से 2-3 फुट ऊंचाई तक भरे, जिससे दबने पर बना हुआ साइलेज जमीन के स्तर से ऊपर रहे और बरसात का पानी गड्ढों में ना जाए। गड्ढ़ों को भरने के बाद पॉलिथीन की चादर से ढक कर हवा रहित करना चाहिए। गड्ढ़े के ऊपर गीली मिट्टी या गोबर का लेप करके हवा रहित किया जा सकता है।

खिलाने की विधि

अच्छी प्रकार से बनाया हुआ साइलेज 30 से 35 दिन में पशुओं को खिलाने योग्य हो जाता है। सबसे पहले मिट्टी को सावधानीपूर्वक हटा लेना चाहिए और इसके बाद पॉलिथीन की चादर को एक किनारे से हटाना चाहिए। साइलेज को आवश्यकतानुसार सावधानी से निकालकर पशु को खिलाना चाहिए जिससे कि साइलेज का कम से कम मात्रा हवा के संपर्क में आए। अन्यथा साइलेज खराब होने की संभावना रहती है।

अच्छा साइलेज बनाने के लिए आवश्यक बातें-

  • साइलेज बनाने वाला गड्ढ़ा उस स्थान पर होना चाहिए जहां बरसात का पानी ना जा सके।
  • हरे चारे में नमी का प्रतिशत65 से 75 के बीच होना चाहिए।
  • हरे चारे को कुट्टी बनाकर ही गड्ढों में भरना चाहिए।

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  • 'हे' बनानाअक्टूबर महीने में शुरू कर सकते है साइलेज बनाने का काम, गर्मियों में मिलेगा फायदा

सुखाए हुए हरे चारे को हे कहते है। 'हे' इस प्रकार बनाना चाहिए कि चारे का हरापन बना रहे और इसके पोषणमान में हानि न हो। उत्तर भारत में हे तैयार करने का सबसे उपयुक्त समय मार्च-अप्रैल है। उस समय आसमान में धूप अच्छी और आद्रता कम होती है जिससे चारा जल्दी से सूखकर अच्छा 'हे' तैयार हो जाता है।

'हे' बनाने की विधि

'हे' बनाने में हरे चारे को अच्छी प्रकार और समान रूप से धूप और हवा में सुखाना चाहिए। जमीन पर फैलाकर सुखाने से भी हे तैयार किया जा सकता है। इसके लिए चारे को काटने के बाद जमीन पर 25-30 सेंटीमीटर मोटी परतों में फैलाकर धूप में सुखाया जाता है। अधिक धूप तेज न हो तो हरे चारे को अधिक पतली

सतहों में फैलाया जाता है। जब चारे की अधिकांश ऊपरी पत्तियां सूख जाती हैं और इनमें थोड़ा कुरकुरापन आ जाता है तो चारे को छोटे-छोटे ढ़ेरों में इकट्ठा कर लिया जाता है। मार्च-अप्रैल के महीने में चारे को इतना सूखने में 3-4 घंटे लगते हैं। बनाये गये ढेरो की पत्तियां जब सूख जाए परंतु मुड़ने पर एकदम ना टूटने लगें, इसमें पहले ही चारे को पलट देना चाहिए। चारे के ढेरों को ढीला रखा जाता है जिससे उसमें हवा आती-जाती रहे। उलट-पलट का यह काम

दूसरे दिन सुबह ही कर लेना चाहिए क्योंकि उस समय पत्तियों में कुरकुरापन कम होता है। दूसरे दिन शाम को इन छोटी-छोटी ढ़ेरियों को इकट्ठा कर लेना चाहिए।

इन सूखे ढेरों को अगले दिन तक पड़े रहने देना चाहिए, जिससे कि भंडारण से पहले चारा पूरी तरह सूख जाए। तैयार की हुई हे को छप्पर या किसी अन्य सुरक्षित स्थान में भंडारित कर लेना चाहिए।

'हे' बनाने के लिए उपयुक्त फसलें

बरसीम, रिजका, लोबिया, सोयाबीन, जई, सूडान घास आदि हे बनाने के लिए उत्तम फसलें है। इसके अतिरिक्त अक्टूबर में मक्का और ज्वार से भी हे तैयार कर सकते है।


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