बिचौलियों के चक्कर में न पड़े किसान, बाजार में सीधे बेचें बकरी होगा फायदा

Diti BajpaiDiti Bajpai   26 Dec 2017 12:50 PM GMT

बिचौलियों के चक्कर में न पड़े किसान, बाजार में सीधे बेचें बकरी होगा फायदाकिसानों को प्रशिक्षण देते वैज्ञानिक डा अनुपम कृष्ण दीक्षित

मथुरा। ''जानकारी के अभाव में ज्यादातर किसान बिना वजन किए बकरियों को बाजार में बेच देते है, जिससे किसानों को बकरे के उचित दाम नहीं मिल पाते हैं। इस तरह किसान को आर्थिक नुकसान भी होता है। इसलिए बकरी का वजन करके और नौ महीनें के बाद ही बाजार में बकरी को बेचना चाहिए क्योंकि बकरी के दाम उसके वजन पर निर्भर करते है।'' ऐसा बताते हैं, डॅा अनुपम कृष्ण दीक्षित।

डॅा दीक्षित केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान में प्रधान वैज्ञानिक है। डॅा दीक्षित बताते हैं, ''किसान को बकरी पालन में तभी दोगुना लाभ होगा जब किसान बकरियों को घूमंतू व्यापरी या फिर स्थानीय व्यापारी को बेचने की बजाय सीधे बाजार में या बूचड़खाने में बेचे। व्यापारी किसानों से कम दामों पर बकरी खरीद लेते है और दोगुने दामों में बाजारों में बेचते है, जिससे व्यापरियों को फायदा है। इसके लिए किसानों को जागरुक होना पड़ेगा।''

ये भी पढ़ें:- बकरी से अधिक मुनाफा कमाने के लिए पोषण का रखें ध्यान

बरेली के इज्जतनगर स्थित भारतीय पशु अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) द्वारा किसानों की आय दोगुनी करने के लिए चल रही फार्मर फस्ट परियोजना के तहत बरेली के 35 किसानों को चार दिवसीय बकरी एवं भेड़ पालन प्रशिक्षण के लिए मथुरा के केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान (सीआईआरजी) लाया गया है। इस प्रशिक्षण में किसानों को दूसरे चरण में भेड़ बकरियों की ड्रेसिंग, टीकाकरण, पोषण प्रंबधन के साथ-साथ अर्थशास्त्र एवं विपणन की जानकारी दी गई।

बकरी पालन कम लागत और सामान्य देख-रेख में गरीब किसानों और खेतिहर मजदूरों के जीविकोपार्जन का एक साधन बन रहा है। 19वीं पशुगणना के अनुसार पूरे भारत में बकरियों की कुल संख्या 135.17 मिलियन है, जिसमें से उत्तर प्रदेश में इनकी संख्या 42 लाख 42 हजार 904 है। एनडीडीबी 2016 के आंकड़ों के मुताबिक प्रतिवर्ष 5 मीट्रिक टन बकरी का दूध उत्पादन होता है, जिसका अधिकांश हिस्सा गरीब किसानों के पास है।

ये भी पढ़ें:- आवारा कुत्तों से होती है बकरी में जानलेवा बीमारी

''हम कई साल से बकरी पाल रहे है। बकरी को वजन करके ज्यादा दाम मिलेंगे इसकी कोई जानकारी नहीं थी। अभी हमारे पास तीन बकरी है अब जब उसको बेचने जाऐंगे तो वजन जरुर कराऐंगे।'' ऐसा बताते हैं, लल्लू राम। लल्लू बरेली जिला मुख्यालय से करीब 30 किमी. दूर मझगवां ब्लॅाक के निसोई गाँव के रहने वाले है। ये पिछले कई वर्षों से बकरी पालन कर रहे है।

प्रशिक्षण के दौरान डॅा दीक्षित ने किसानों को जानकारी देते हुए बताया, ''बरबरी बकरी 14 महीने में दो बार बच्चे देती है, जिसमें 50 प्रतिशत मादा और 50 प्रतिशत नर बच्चे होते है। अगर किसान बकरी व्यवसाय को आगे बढ़ाना चाहते है, तो वह ध्यान रखें कि वो मादा बकरी को न बेचे। उससे वो अपने व्यसाय को और आगे बढ़ा सकते है। इसके अलावा ईद में बकरियों के दाम अच्छे मिलते है। तो त्यौहारों के समय ही बकरियों की बिक्री करनी चाहिए।

ये भी पढ़ें:- ‘बकरियों की 70 प्रतिशत बीमारियां साफ-सफाई से होती हैं दूर’

भेड़ और बकरियों के लिए आहार कितना महत्वपूर्ण है इसके बारे में भी किसानों को बताया गया। केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान के पशु पोषण विभाग के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ रवींद्र कुमार ने बताया, ''किसान जब बकरी को चरा कर लाता है तो वो सोचता कि उसका आहार पूरा हो गया है। जबकि ऐसा नहीं होता है। चराने के बाद भी उनको चारा-दाना पूरक आहार के रुप में दिया जाना चाहिए ।इससे उसका वजन तो बढ़ता ही साथ ही उसका दूध उत्पादन की क्षमता भी काफी अच्छी होती है।'' अपनी बात को जारी रखते हुए डॉ रवींद्र बताते हैं, ''बरेली से आए किसानों को प्रशिक्षण में मेमनों का आहार, ग्याभिन होने पर पशु का आहार के बारबताया है और किस उम्र में कितना आहार दिया जाता है इसके बारे में जानकारी दी गई।''

ये भी पढ़े:- ‘फार्मर फर्स्ट’ से होगी किसानों की आय दोगुनी, सीआईआरजी में दिया जा रहा बकरी पालन प्रशिक्षण, देखे तस्वीरें

प्रशिक्षण के किसानों को गोलीनुमा, पेलेट फीड बनाने की विधि के बारे में प्रयोगात्मक प्रक्षेत्र में बताया गया। फीड को बनाने की मशीनों के बारे में भी जानकारी दी गई। बरेली जिला मुख्यालय से मंझगवां ब्लॅाक के स्माइलपुर गाँव में रहने वाले लल्लू (40 वर्ष) बताते हैं, आईवीआरआई की तरफ से हम ट्रेनिंग में आए है। इसमें हमें कई नई-नई चीज़ों के बारे में पता चला है। यहां जो भी जानकारी मिली है उसी तरह से हम बकरी पालन शुरु करेंगे।''

ये भी पढ़ें- वीडियो : न चराने का झंझट, न ज्यादा खर्च : बारबरी बकरी पालन का पूरा तरीका समझिए

ये भी पढ़ें- बकरी पालकों को रोजगार दे रहा ‘द गोट ट्रस्ट’

More Stories


© 2019 All rights reserved.

Top