खुशियों का पीछा करते-करते अपनों से दूर होने की मजबूरी

खुशियों का पीछा करते-करते अपनों से दूर होने की मजबूरी

डॉ. राहुल श्रीवास्तव,

जब भी मैं ड्राइवरों, मजदूरों, चौकीदारों, होटलों में काम करने वालों, रिक्शा चलाने वालों, घरेलू नौकरों और रेहड़ी लगाने वालों से पूछता हूं कि वे छोटे शहरों से बड़े शहर में क्यों आए? "अवसर", यही जवाब मिलता है मुझे इन सभी से। इन लोगों में से अधिकतर उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल से आए हैं। विचार-विमर्श में सुगमता के लिए इस लेख में हम इन्हें श्रेणी-1 के सदस्य कहेंगे।

लगभग यही जवाब मुझे मिलता है, जब मैं ऊपर लिखे राज्यों से आए प्रफेशनल्स और दफ्तरों में काम करने वालों से पूछता हूं। ये लोग अब यूरोप, अमेरिका और पूर्वी एशियाई देशों में काम कर रहे हैं। आमतौर पर इसे प्रतिभा पलायन कहा जाता है। कुछ प्रफेशनल्स विदेश न जाकर अपना राज्य छोड़कर महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली, आंध्र प्रदेश और केरल जैसे राज्य में बस जाते हैं। इन्हें हम इस लेख में श्रेणी-2 के सदस्य कहेंगे।


एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में एक राज्य से दूसरे राज्यों में जाने वाले या एक ही राज्य में एक स्थान से दूसरे स्थान में बसने वाले लगभग 13.9 करोड़ लोग हैं। मैं देश के कई राज्यों में काफी यात्राएं करता रहता हूं इसके अलावा खाड़ी और यूरोपिय देशों में भी मेरा जाना होता है। मैं अक्सर सोचा करता हूं कि क्या दोनों श्रेणियों के लिए 'अवसर' का मतलब एक जैसा होगा या अलग-अलग?

हालांकि दोनों मामलों में कौशल, संसाधनों की उपलब्धता, परिवार और समाज का समर्थन, शिक्षा, रोजगार के अवसरों का प्रकार स्पष्ट रूप में अलग-अलग है। अलग-अलग प्रवासी समूहों से बातचीत करने के बाद मैं संक्षेप में यहां पांच नतीजों की एक सूची बना रहा हूं:

1. दोनों प्रकार के प्रवास के पीछे 'रोजगार के बेहतर अवसर' वाला कारण मुख्य प्रेरक साबित हुआ। श्रेणी 1 के लोग रोजीरोटी कमाने के लिए एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं जबकि दूसरी श्रेणी के सदस्य बेहतर जीवनशैली और काम करने के वातावरण की तलाश में प्रवास करते हैं।

2. श्रेणी 1 के सदस्य बड़े शहरों में सेवा क्षेत्र में अपनी भागीदारी के लिए जाते हैं। वे अपने पीछे कम संसाधनों वाले गांव या छोटे शहर छोड़ आते हैं। देश के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में रोजगार के अपर्याप्त अवसर, खेती से होने वाली बहुत कम आय, मूलभूत ढांचे का धीमा विकास उन्हें अपना क्षेत्र छोड़ने के लिए विवश करते हैं। वहीं, दूसरी श्रेणी के सदस्यों पर दूसरे अधिक विकसित भारतीय राज्यों या विदेश में जाकर बसने का सार्वजनिक दबाव नहीं होता बल्कि रोजगार के बेहतर अवसरों की खोज के लिए यह उनका अपना चुनाव होता है।

3. क्या उन्हें अपने पैतृक स्थल की याद आती है? दोनों ही श्रेणी के सदस्यों ने इसका जवाब 'हां' में दिया। श्रेणी1 के सदस्यों को सामाजिक बंधन और रिश्तों की याद आती है वहीं दूसरी श्रेणी के लोग अपने दोस्तों और छोटे शहरों की सुविधाओं को याद करते हैं।

4. पर क्या वे अपने पैतृक स्थल लौटना चाहेंगे? दोनों जवाब में इनकार करते हुए कहते हैं 'ना'। पर दोनों की वजहें अलग-अलग हैं। श्रेणी1 के सदस्य हमेशा बड़े शहरों में अपनी आमदनी की तुलना अपने पैतृक स्थल से करते हैं, जबकि श्रेणी2 के सदस्य हमेशा अपनी जीवनशैली में अंतर की बात करते हैं।

5. दोनों ही श्रेणियों में घर वापसी पर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रिया होती है। श्रेणी 1 के लोग बीमार होने पर या बड़े शहरों में उनकी जरूरत न होने पर ही वापस लौटते हैं। शायद ही इस श्रेणी का कोई सदस्य अपने घर वापस लौटकर खुशी से रहता हो, यह सोचकर कि अपनों से दूरी की वजह से उन्हें आर्थिक और सामाजिक तौर पर जोखिम का सामना करना पड़ता है। जहां तक बात है श्रेणी दो के सदस्यों की, वापस लौटने पर उनका स्वागत होता है और इसे उनके देशप्रेम के रूप में देखा जाता है। ये लोग बजाय छोटे कस्बों या गांवों में रहने के विदेश से भारत लौटने पर बड़े शहरों में रहना पसंद करते हैँ ।


श्रेणी 1 के सदस्यों के साथ बातचीत करने पर मुझे 10 से 20, 20 से 30, 30 से 40 और 40 वर्ष से ज्यादा उम्र के लोगों के सोचने के तरीकों में अंतर दिखा।

1. कम उम्र के लोग अधिक कमाने के सपने के साथ गांवों और छोटे शहरों से बड़े शहरों की ओर प्रवास करते हैं। वहीं ऐसे लोग जो अपने 30 से 40 बरस बड़े शहरों में गुजार चुके हैँ अक्सर अपने पैतृक जगहों पर छूट गए रिश्तों को याद करते हैं।

2. प्रवासी कमाई पर ज्यादा ध्यान देते हैं, ऐसा करने में वे अक्सर अपनी सुरक्षा को भी नजरअंदाज कर देते हैं। ये लोग धीरे-धीरे आर्थिक तौर से उन्नति कर जाते हैं। उम्र के साथ-साथ उनकी रोजगार की प्राथमिकता, कौशल, आत्मसम्मान और काम करने का वातावरण बदलता जाता है।

3. छोटे शहरों में युवाओं के लिए ऐसे कई व्यायवसायिक पाठ्यक्रम हैं जो उनकी शहरी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। लेकिन उन बुजुर्ग प्रवासियों के लिए कोई व्यवस्था नहीं है जो छोटे शहरों या गांवों में जाकर रहने के इच्छुक हों।

4. बढ़ती लागत, कृषि में बढ़ता घाटा, अप्रत्याशित और प्रतिकूल जलवायु स्थितियां, ग्रामीण परिवारों में प्रति व्यक्ति जमीन का कम होता जाना ये वे कारक हैं जिनकी वजह से किसानों के परिवार के युवा पारंपरिक खेती छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं। ऐसे इक्के-दुक्के उदाहरण हैं जहां कुछ किसान एकीकृत कृषि पद्धति को अपनाकर अच्छी कमाई कर रहे हैं।

मैं यह लेख क्यों लिख रहा हूं? क्योंकि पिछले एक घंटे से मैं दिल्ली एनसीआर में 52 वर्ष के रेडियो टैक्सी ड्राइवर गिरीश ठाकुर से बातचीत कर रहा था। उन्होंने बताया कि वह दिल्ली में 20 वर्ष से ज्यादा समय से रह रहे हैं और उन्होंने काफी कमा लिया है लेकिन बिहार के अपने पैतृक स्थल भागलपुर से उनका सामाजिक संपर्क पूरी तरह से टूट गया है। अपने संबंधों को जीवित रखने के लिए वह साल में कम से कम दो बार भागलपुर जाते रहते हैं। वह यह जानकर बहुत खुश हुए कि मैं पशु चिकित्सक हूं और बिहार में काम कर रहा हूं। बातचीत के दौरान गिरीश यह जानने को बहुत उत्सुक थे कि क्या वह गांव में कोई व्यवसाय शुरू कर सकते हैं खासकर बकरी पालन के बारे में उन्होंने मुझसे पूछताछ की। मैंने इस बारे में व्हाट्सऐप पर उनसे जानकारी साझा की और जरूरत पड़ने पर उनकी मदद करने का वादा भी किया। लेकिन इस घटना ने मुझे मजबूर कर दिया कि मैं प्रवासी जनसंख्या के मुद्दों पर विचार करूं, खासकर बड़े शहरों में रहने वाले बुजुर्ग लोगों के बारे में जो वापस अपनी जड़ों में लौटकर अपने सामाजिक दायरे को बहाल करना चाहते हैं।

(लेखक पशुओं के स्वास्थ्य के लिए काम करने वाली कंपनी हेस्टर बायोसाइंसेज लिमिटेड के असिस्टेंट वाइस प्रेजिडेंट हैं।)

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