पढ़िए क्यों बंद हो गई उत्तर प्रदेश में कामधेनु डेयरी योजना

प्रदेश में करीब हर जिले में औसतन 60 के करीब डेयरियां खोली गईं हैं। इन डेयरियों को सरकार की तरफ से काफी अनुदान मिला, पशुओं की खरीद में सहयोग मिला और सरकारी विभागों की तरफ से तकनीकी और संचालन की पूरी जानकारी भी दी गई। लेकिन तब भी ये योजना सफल नहीं हो पाई।

पढ़िए क्यों बंद हो गई उत्तर प्रदेश में कामधेनु डेयरी योजना

लखनऊ। दुग्ध व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए पिछली सरकार की तरफ से वर्ष 2013 में कामधेनु योजना, वर्ष 2014 में मिनी कामधेनु योजना और वर्ष 2015 में माइक्रो कामधेनु योजना की शुरुआत की गई थी। लेकिन दूध के दाम सही न मिलने और क्रियान्वयन ठीक से न होने के कारण आधे से ज्यादा डेयरियां बंद हो गई।

ओरैया जिले के बिजयापुर कस्बा में पुरेंद्र प्रताप सिंह ने मिनी कामधेनु और माइक्रो डेयरी खोली थी। लेकिन दूध के दाम सही न मिलने और डेयरी के गायों में मौत होने से उन्हें डेयरी बंद करनी पड़ी। "आधे से ज्यादा गाय बांझ हो गई और कुछ थनैला रोग के लगने से मर गई। योजना में दूसरे राज्यों से पशुओं को लाना था लेकिन वो पशु यहां की जलवायु में नहीं रह पाए, जिससे वो मर गए।" पुरेंद्र ने बताया, "जो पशु मरे उनका बीमा भी नहीं मिला। लगातार घाटा ही हो रहा था। इसलिए डेयरी को बंद करना पड़ा।"

सरकारी आकड़ों के मुताबिक राज्य में कामधेनु योजना के तहत 300 डेयरियां, मिनी कामधेनु के तहत 1500 डेयरियां और माइक्रो कामधेनु योजना के तहत करीब 2500 डेयरियां संचालित हैं। प्रदेश में करीब हर जिले में औसतन 60 के करीब डेयरियां खोली गईं हैं। इन डेयरियों को सरकार की तरफ से काफी अनुदान मिला, पशुओं की खरीद में सहयोग मिला और सरकारी विभागों की तरफ से तकनीकी और संचालन की पूरी जानकारी भी दी गई। लेकिन तब भी ये योजना सफल नहीं हो पाई।

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इन तीनों योजनाओं की कुल लागत 1.20 करोड़ रुपए, मिनी कामधेनु 54 लाख रुपए और माइक्रो कामधेनु 27 लाख रुपए की थी। "प्र्रदेश में करीब 50 प्रतिशत डेयरियां बंद चुकी है। जो डेयरी चल रही वो भी नुकसान में है। कुछ किसान जो रिटेल कर रहे है वो सफल है। इन डेयारियों के बंद होने का मुख्य कारण नकली दूध है।" कामधेनु वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष नवनीत महेश्वरी ने बताया, "जो नकली दू्ध को चार से पांच रूपए में तैयार करके 25 रूपए में बेचा जाता है उसको तो मुनाफा है लेकिन जिसकी लागत 35 रूपए आ रही है उसको नुकसान हो रहा है। राज्य सरकार को कई बार पत्र लिखा कि नकली दूध पर कार्रवाई हो। क्योंकि भारत में 68 प्रतिशत नकली दूध होता है जिसमें 90 प्रतिशत उत्तर प्रदेश से आता है।"

मेरठ में स्थित केंद्रीय गोवंश अनुसंधान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ संजीव कुमार वर्मा ने इस सफल डेयरी को बंद होने के कई कारण दिए जो नीचे दिए गए है:

  • इस परियोजना के लिए चयनित किसानों के पास व्यवसायिक डेरी चलाने का कोई व्यवहारिक अनुभव नहीं था।
  • पूरे देश में कोई भी संस्थान या संस्था ऐसी नहीं है जहां से उच्च गुणवत्ता के जानवर इन डेरी मालिकों को मिल पाते। तो डेरी खोलने के लिए इन्होंने अपने निजी स्रोतों से अधिक मूल्य पर जानवर खरीदे। जिसके कारण प्रोजेक्ट कॉस्ट भी बढ़ी।
  • किसानों को पशुओं का वैज्ञानिक विधि से भरण पोषण का भरपूर ज्ञान ना होने के कारण पशु खरीदकर लाने के बाद पोषण के अभाव में उन उच्च उत्पादकता वाली गायों का उत्पादन घट गया जो डेरी को घाटे में लाने के लिए जिम्मेदार हुआ।
  • गायों को उचित पोषण ना मिलने के कारण उनका पुनरुत्पादन प्रभावित हुआ।
  • डेयरी के लिए खरीदे गए पशुओं का बीमा भी नहीं कराया गया और पशु की मृत्यु होने पर डेयरी मालिक को भारी आर्थिक हानि हुई।
  • डेयरी तो खुलवा दी गई मगर उनके द्वारा उत्पन्न किये गए दूध की मार्केटिंग की कोई समुचित व्यवस्था नहीं की गई।

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