World Pulses Day: पीली, काली या लाल नहीं… जानिए दालों की असली पहचान और पोषण का राज
Gaon Connection | Feb 10, 2026, 10:57 IST
आप दालों को उनके नाम से जानते हैं या फिर काली, पीली, लाल या फिर सफेद दाल के नाम स? आज जानते हैं दालों के बारे में; इसे पढ़ने के बाद अपने बच्चों को लेकर रसोई में जाइएगा और वहाँ पर उन्हें दाल की पहचान कराइएगा।
हम हर रोज़ दाल खाते हैं, कभी अरहर, कभी मसूर, कभी चना या मूंग। लेकिन अगर किसी से पूछें कि यह कौन सी दाल है, तो अक्सर जवाब मिलता है पीली दाल, लाल दाल, या फिर काली दाल। यानी पहचान रंग से होती है, नाम से नहीं। बरसों से दालें हमारी थाली का सबसे ज़रूरी हिस्सा रहीं हैं, इसलिए उनके बारे में सही जानकारी होना भी उतना ही ज़रूरी है।
दालें केवल खाने की चीज़ नहीं हैं। ये पोषण का बड़ा ज़रिया हैं, किसानों की आमदनी से जुड़ी हैं और मिट्टी की सेहत सुधारने में भी मदद करती हैं। इसलिए दालों को समझना मतलब भोजन, खेती और स्वास्थ्य, तीनों को समझना है।
दालें फलियों वाली फसलें होती हैं, जिन्हें अंग्रेज़ी में Pulses कहा जाता है। इनके पौधे छोटे होते हैं और मिट्टी में नाइट्रोजन बढ़ाने की क्षमता रखते हैं। यही वजह है कि किसान अक्सर अनाज के साथ दालों की खेती भी करते हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और रासायनिक खाद की जरूरत कम होती है।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा दाल उत्पादक और उपभोक्ता देश है। यहां की जलवायु और खेती की परंपरा दालों के लिए अनुकूल रही है। देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग दालें उगाई जाती हैं] जैसे मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में तुअर(अरहर), राजस्थान में चना, उत्तर प्रदेश में मसूर, और दक्षिण भारत में उड़द व मूंग।
घर में अक्सर दालों की पहचान उनके रंग से होती है। जैसे पीली दाल- अरहर या मूंग, लाल दाल- मसूर, काली दाल- उड़द या साबुत मसूर और सफेद दाल- धुली उड़द। लेकिन रंग के पीछे असली पहचान छिपी होती है। हर दाल का पौधा अलग होता है, उसका स्वाद, पोषण और खेती का तरीका भी अलग होता है।
अरहर (तुअर) दाल: यह भारत की सबसे लोकप्रिय दालों में से एक है। इसका रंग पीला होता है और यह रोजमर्रा की दाल-चावल की थाली का हिस्सा है। इसमें प्रोटीन, आयरन और फाइबर भरपूर होता है। तुअर की खेती सूखे इलाकों में भी अच्छी तरह हो जाती है।
चना दाल: यह मोटी, पीले रंग की दाल होती है। चना दाल से बेसन भी बनता है, जिससे पकौड़े, ढोकला और मिठाइयाँ बनती हैं। इसमें प्रोटीन और ऊर्जा भरपूर होती है, इसलिए इसे ताकत देने वाली दाल माना जाता है।
मूंग दाल: मूंग साबुत हरे दानों में और धुली पीली दाल के रूप में मिलती है। यह हल्की और जल्दी पचने वाली दाल है, इसलिए बीमार या बच्चों को अक्सर मूंग की दाल दी जाती है। इसमें प्रोटीन के साथ विटामिन और खनिज भी होते हैं।
मसूर दाल: यह लाल या नारंगी रंग की दाल होती है और जल्दी पक जाती है। इसमें आयरन और फाइबर भरपूर होता है। उत्तर भारत में यह सर्दियों की लोकप्रिय दाल है।
उड़द दाल: साबुत उड़द काली होती है और धुलने पर सफेद दिखाई देती है। दाल मखनी, इडली, डोसा और वड़ा जैसे कई लोकप्रिय व्यंजन इसी से बनते हैं। इसमें प्रोटीन और कैल्शियम अच्छी मात्रा में होते हैं।
राजमा और लोबिया: इन्हें आम बोलचाल में दाल नहीं कहा जाता, लेकिन ये भी पल्सेस की श्रेणी में आते हैं। राजमा और लोबिया प्रोटीन से भरपूर होते हैं और कई राज्यों में मुख्य भोजन का हिस्सा हैं।
दालें केवल खाने के लिए ही नहीं, बल्कि खेती के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। इनके पौधों की जड़ों में विशेष जीवाणु होते हैं, जो हवा से नाइट्रोजन लेकर मिट्टी में जमा कर देते हैं। इससे मिट्टी उपजाऊ बनती है। इसी वजह से कृषि वैज्ञानिक दालों को फसल चक्र में शामिल करने की सलाह देते हैं। उदाहरण के लिए, गेहूं या धान के बाद चना या मसूर बोने से मिट्टी की सेहत बेहतर होती है।
भारत के अलग-अलग हिस्सों में दालों के अपने-अपने व्यंजन हैं, जैसे कि दक्षिण भारत में सांभर, रसम, इडली-डोसा, पंजाब में दाल मखनी, राजमा,राजस्थान में पंचमेल दाल, बिहार-पूर्वी यूपी में अरहर दाल-चावल और गुजरात में मीठी-खट्टी दाल। यह दिखाता है कि दालें सिर्फ पोषण नहीं, बल्कि परंपरा और स्वाद की भी पहचान हैं।
आजकल बच्चों की थाली में पैकेट वाले स्नैक्स ज्यादा और पारंपरिक भोजन कम हो रहा है। ऐसे में दालों के बारे में जानकारी देना ज़रूरी है।
ये भी पढ़ें: जलवायु बदलाव के बीच कश्मीर में अरहर की नई उम्मीद
दालें केवल खाने की चीज़ नहीं हैं। ये पोषण का बड़ा ज़रिया हैं, किसानों की आमदनी से जुड़ी हैं और मिट्टी की सेहत सुधारने में भी मदद करती हैं। इसलिए दालों को समझना मतलब भोजन, खेती और स्वास्थ्य, तीनों को समझना है।
दाल क्या होती है?
भारत दुनिया का सबसे बड़ा दाल उत्पादक और उपभोक्ता देश है। यहां की जलवायु और खेती की परंपरा दालों के लिए अनुकूल रही है। देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग दालें उगाई जाती हैं] जैसे मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में तुअर(अरहर), राजस्थान में चना, उत्तर प्रदेश में मसूर, और दक्षिण भारत में उड़द व मूंग।
पोषण, खेती और परंपरा का अनमोल खजाना होती हैं दालें।
रंग से पहचान बनाम असली पहचान
प्रमुख दालें और उनकी खूबियाँ
चना दाल: यह मोटी, पीले रंग की दाल होती है। चना दाल से बेसन भी बनता है, जिससे पकौड़े, ढोकला और मिठाइयाँ बनती हैं। इसमें प्रोटीन और ऊर्जा भरपूर होती है, इसलिए इसे ताकत देने वाली दाल माना जाता है।
मूंग दाल: मूंग साबुत हरे दानों में और धुली पीली दाल के रूप में मिलती है। यह हल्की और जल्दी पचने वाली दाल है, इसलिए बीमार या बच्चों को अक्सर मूंग की दाल दी जाती है। इसमें प्रोटीन के साथ विटामिन और खनिज भी होते हैं।
मसूर दाल: यह लाल या नारंगी रंग की दाल होती है और जल्दी पक जाती है। इसमें आयरन और फाइबर भरपूर होता है। उत्तर भारत में यह सर्दियों की लोकप्रिय दाल है।
उड़द दाल: साबुत उड़द काली होती है और धुलने पर सफेद दिखाई देती है। दाल मखनी, इडली, डोसा और वड़ा जैसे कई लोकप्रिय व्यंजन इसी से बनते हैं। इसमें प्रोटीन और कैल्शियम अच्छी मात्रा में होते हैं।
राजमा और लोबिया: इन्हें आम बोलचाल में दाल नहीं कहा जाता, लेकिन ये भी पल्सेस की श्रेणी में आते हैं। राजमा और लोबिया प्रोटीन से भरपूर होते हैं और कई राज्यों में मुख्य भोजन का हिस्सा हैं।
खेती में दालों की भूमिका
दालों को पहचानना क्यों है जरूरी।
भारत में दालों का सांस्कृतिक महत्व
बच्चों को दालों की पहचान क्यों सिखानी चाहिए?
- आप घर में एक छोटा-सा प्रयोग कर सकते हैं
- अलग-अलग कटोरियों में दालें रखिए।
- बच्चों से उनका रंग पहचानने को कहिए।
- फिर उनका असली नाम बताइए।
- बताइए कि कौन-सी दाल से कौन-सा खाना बनता है।
ये भी पढ़ें: जलवायु बदलाव के बीच कश्मीर में अरहर की नई उम्मीद