स्लो बाजार का ऑर्गेनिक 'मधुमक्खीवाला' शहद, लीची से लेकर सरसों तक के स्वाद की मिठास

मधुमक्खी शहद का उत्पादन करने वाले निमित सिंह के लिए शहद सिर्फ आमदनी का जरिया नहीं है, बल्कि एक ऐसा व्यवसाय है जहां उन्होंने जीवन के कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण सबक सीखे हैं।

Pankaja SrinivasanPankaja Srinivasan   16 Nov 2021 9:03 AM GMT

स्लो बाजार का ऑर्गेनिक मधुमक्खीवाला शहद, लीची से लेकर सरसों तक के स्वाद की मिठासनिमित सिंह ने इस व्यवसाय से बहुत कुछ सीखा है।

शहद जिसे गर्मी के दिनों में ठंडे निम्बू पानी में डालकर पिएं या फिर गर्म चाय के प्याले में इसका स्वाद सेहत से भरपूर होगा। बात जब कड़वी दवा को निगलने की हो तो उसके लिए शहद से अच्छा साथी तो आपको मिल ही नहीं सकता! लेकिन फायदा तभी है जब शहद शुद्ध हो।

शुद्ध शहद ठीक वैसा हो जैसा प्रकृति इसे तैयार करती है, बिना मिलावट के, धीमी प्रक्रिया और स्थिरता व स्वच्छता के साथ तैयार किया गया।

30 साल के मधुमक्खी पालक निमित सिंह शहद को कुछ इसी तरीके से प्रकृति के नजदीक रहकर तैयार करते हैं। वह कहते हैं, "शहद के अलग-अलग स्वाद की एक लंबी लिस्ट है।" निमित का उत्तर प्रदेश के लखनऊ में अपना खुद का एक ब्रांड है 'मधुमक्खीवाला'। जिसके जरिए वे अलग-अलग स्वाद और जायके वाला शहद लोगों को उपलब्ध कराते हैं।

निमित बताते हैं,"मैंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है, लेकिन नौ से पांच की नौकरी करने का मन नहीं था। मैं नए सिरे से कुछ करना चाहता था। मेरा मन अपना खुद का कोई बिजनेस शुरु करने का था। मेरे पिता जी सेना से रिटायर हैं। नौकरी के दौरान जब उनकी पोस्टिंग पंजाब में थी तो उन्होंने कई मधुमक्खी पालकों को देखा था। उन्होंने मुझे उन मधुमक्खी पालकों के बारे में बताया। अपने बिजनेस के लिए उनका ये आइडिया मुझे जंच गया।"

निमित सिंह के पिता सेना से रिटायर हैं। उन्होंने अपनी नौकरी के दौरान देश के कई राज्यों का सफर किया है। निमित ने भी अपने लिए एक ऐसा ही व्यवसाय चुना जिसके लिए उन्हें देश के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में घूमना पड़ता है। हां, उनका ये सफर 'फौजी' मार्ग जितना मुश्किल तो नहीं लेकिन इसमें मेहनत कम नहीं लगती।

30 साल के निमित आज एक सफल हनीमेकर हैं। उनका अपना खुद का एक ब्रांड है 'मधुमक्खीवाला'। इसे उन्होंने 2016 में पंजीकृत करवाया था।

निमित ने गांव कनेक्शन को बताया, "मधुमक्खी पालन से मेरे अंदर एक अच्छी व्यावसायिक समझ आई है। इस बिजनेस के लिए मुझे न तो किसी बड़े निवेश की जरूरत पड़ी और न ही जमीन की। कोई भी 5000 रुपये से भी कम में इस काम को शुरू कर सकता है। अंत में मधुमक्खियां जो शहद तैयार करती हैं, उसकी कोई शेल्फ लाइफ नहीं होती। तो मुझे इसके खराब होने की चिंता भी नहीं करनी पड़ती। "

इस व्यवसाय में जाने से पहले निमित ने काफी रिसर्च की थी। मधुमक्खी पालकों से मिलने, देखने और सीखने के लिए देश के कई दूर-दूराज इलाकों में घूमें। उन्होंने देश के कई विशेषज्ञ शहद निर्माताओं से मिलकर उनका अनुभव साझा किया औऱ मधुमक्खियों की देखभाल करते हुए उनके साथ दो साल बिताए।

निमित याद करते हुए बताते हैं, "मैंने हर एक मधुमक्खी पालक के साथ कम से कम एक सप्ताह बिताने का फैसला किया। उत्तर प्रदेश में पीपीगंज मेरा पहला पड़ाव था। जहां काफी सालों से इस क्षेत्र से जुड़े अनुभवी मधुमक्खी पालक राजीव सिंह ने मुझे मधुमक्खी पालन का पहला सबक और स्वाद चखाया। उन्होंने मुझे मधुमक्खियों के बारे में काफी जानकारी दी, उनकी विशेषताओं के बारे में बताया और सामने आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार किया।"


इसके बाद, साल 2012 में वह पंजाब के राजपुरा चले गए। यहां मधुमक्खी पालक लाल बहादुर भाटिया ने उन्हें मधुमक्खी पालन की बारीकियां सिखाईं।

अब तक वह कन्याकुमारी के तट से लेकर कश्मीर के पहाड़ों तक, पूर्व में ओडिशा से लेकर बंगाल तक और उत्तर पूर्व में सिक्किम से लेकर नागालैंड तक की यात्रा कर चुके हैं। उन्होंने अपने इस सफर में मधुमक्खी पालन की उन बारीकियों के बारे में जाना और सीखा, जिनकी निमित को बहुत ही कम या कहें न के बराबर समझ थी।

उन्होंने कहा, "मैं इस व्यवसाय के बारे में अच्छे से जानना चाहता था। मुझे पता था कि मैं शुरूआत में स्टाफ का खर्च नहीं उठा सकता। और, अगर मैं ऐसा करता हूं तो मुझे मधुमक्खी पालन के हर पहलू को जानना होगा ताकि कोई मेरे साथ चालाकी न कर सके या मुझे बेवकूफ न बना सके।"

निमित बताते हैं कि मधुमक्खी पालन के हर पहलू से रुबरु होने के इस सफर में उन्होंने जीवन के कई महत्वपूर्ण सबक भी सीखे हैं। वह हंसते हुए कहते हैं," अपने इस सफर की शुरूआत में सबसे पहले मैंने तंबू गाड़ना सीखा।" वह आगे कहते हैं, "यह बहुत जरुरी था। क्योंकि घर से दूर रहते हुए मुझे अपना ज्यादातर समय बाहर बिताना पड़ रहा था। दिन का समय सीखने में बीतता और रात का समय तम्बू के साथ सोने में।"

उन्होंने मानव मनोविज्ञान के बारे में भी सीखा। वह बताते हैं,"मैंने गांवों में किसानों से दोस्ती की। मैंने उनसे कृतज्ञता सीखी। उन्होंने उदारता से मुझे अपने खेतों में बक्से लगाने दिए, और उनमें से कई ने तो इसके बदले में मुझसे कुछ भी लेने से इनकार कर दिया था।" उन्होंने कहा, "इन मधुमक्खी पालकों ने मुझे जो सिखाया है, उसके बदले में मैं एक स्वतंत्र मजदूर के रूप में काम करने के काबिल हो गया।"


निमित को 50 मधुमक्खी बक्सों की अपनी पहली खेप पश्चिम बंगाल से मिली थी। यही वो समय था, जब उन्हें पता चला कि मधुमक्खी पालन का व्यवसाय बिना 'डंक' के नहीं होता। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, "मैंने मधुमक्खियों को खो दिया, मेरा शहद नहीं बिका, बैंकों ने मुझे दूर कर दिया ... लेकिन मैं बच गया।"

जब निमित अपने शहद के बारे में बात करते हैं तो उनकी आवाज में एक जोश होता है। वह कहते हैं, "कोई भी दो शहद एक समान नहीं होते। जहां भी या जिस क्षेत्र में मधुमक्खियां अपना शहद बनाती हैं, उसके आधार पर स्वाद और खुशबू शहद में समा जाते हैं। मुजफ्फरपुर के एक खेत में रखे मधुमक्खी के बक्से में जो शहद तैयार होता है उसमें इलाके की प्रसिद्ध लीची के स्वाद और खुशबू की महक होगी। सुंदरवन के शहद में जंगली फूलों की सुगंध है, तो वहीं पंजाब में सरसों के खेत में रखे मधुमक्खी के बक्से का शहद निश्चित रूप से आपको सरसों का अहसास करा जाएगा।"

निमित बताते हैं, "50,000 से लेकर एक लाख मधुमक्खियों वाले हर एक डिब्बे के बीच कुछ भी हो सकता है। छह महीने में 25 किलोग्राम शहद और एक किलोग्राम मोम का उत्पादन होता है। हम फूलों का पीछा करते हैं। जिस भी मौसम में, जहां कहीं भी फूल आ रहे होते हैं, हम बक्सों को वहीं घुमाते रहते हैं।"

नवंबर से मार्च तक निमित के 250 बीबॉक्स उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में रहेंगे। इन महीनों में यहां सरसों और यूकेलिप्टस के फूल खिलते है। "मार्च में मैं उन्हें मुजफ्फरपुर ले जाता हूं जहां मेरी मधुमक्खियां शहद के लिए लीची से स्वाद लेती हैं। इसके बाद वाइल्डफ्लावर शहद के लिए झारखंड, कई तरह के फूलों के लिए सुंदरवन और फिर तिल या तिल के फूल वाले शहद के लिए ओडिशा जाते हैं। और हम एक बार फिर बाराबंकी लौट आते हैं एक नई शुरूआत के लिए …"।

निमित को अपने शहद की पहली खेप उत्तर प्रदेश के सीतापुर के मिश्रिख में एक दोस्त के खेत में रखे मधुमक्खी के बक्सों से मिलती है। उन्होंने कहा, "मैं बक्सों को उन खेतों में स्थानांतरित करता रहता हूं जो मुझे उन्हें रखने की अनुमति देने के लिए तैयार हो जाते हैं। कई जगहों पर मैं किसान को उनकी उदारता के लिए धन्यवाद के रूप में 25 किलो शहद वहीं उनके पास छोड़ जाता हूं।"

शहद की मार्केटिंग के लिए उन्होंने एक खास तरीका अपनाया। निमित हंसते हुए बताते हैं, "मुझे शुरुआत में इसे बेचने में कोई सफलता नहीं मिली। फिर मैंने शहद को कुछ बोतलों में पैक करने और अपनी बाइक पर बाहर निकलने का फैसला किया। मैंने उन लोगों से संपर्क करना शुरु किया जो रोज सुबह की सैर पर बाहर निकलते थे। मैं जानता था कि ये लोग अपने स्वास्थ्य के प्रति सचेत हैं और शायद शहद में दिलचस्पी लेंगे।" सो वह सुबह- सुबह अपने शहद के नमूने लेकर निकल पड़ते और रास्ते में जो मिलता उसे अपने शहद का स्वाद चखाते। इसने काम किया और धीरे-धीरे उनके शहद की मांग बढ़ने लगी।


आज, उनके पास 1000 मधुमक्खी के बक्से हैं और रजौली गांव, फतेहपुर ब्लॉक, बाराबंकी में खरीदी गई एक एकड़ जमीन भी है। उनके पास किसानों और मधुमक्खी पालकों का एक नेटवर्क है जो उन्हें अपने खेतों में अपने मधुमक्खियों को रखने के लिए जगह देते हैं। उनकी मधुमक्खियां से तैयार शहद में 10 अलग-अलग स्वाद हैं। इनमें से यूकेलिप्टस शहद सबसे लोकप्रिय है।

आज निमित उन सभी बड़े दिल वाले लोगों के साथ मिलकर काम कर रहे है जिन्होंने उनकी शुरुआत में काफी मदद की थी। वह बाराबंकी के चैनपुरवा गांव में 114परिवारों की 250 महिलाओं को मोम देते हैं , जिनसे वे दीया बनाती हैं और आजीविका कमाती हैं। वह बताते हैं, "पिछले साल, दिवाली से पहले एक महीने में महिलाओं ने 9 लाख दीये बनाए थे। इस साल उन्होंने 9.5 लाख दीये बनाए हैं। हमने जिस गांव को इसके लिए प्रशिक्षित किया है, वहां के लोगों ने लखनऊ के अलग-अलग आउटलेट्स पर इन दियों को बेचा है।

थोड़ा दार्शनिक होते हुए, निमित कहते हैं, "एक श्रमिक मधुमक्खी का जीवन चक्र 45 दिनों का होता है, जबकि रानी मधुमक्खी तीन साल तक जीवित रहती है। अपने छोटे से जीवन काल में वे कड़ी मेहनत से कितनी मिठास पैदा कर जाती हैं।"

निमित ने कहा, "मैंने जान लिया है कि मधुमक्खियों के बिना इस ग्रह पर हमारा कोई अस्तित्व नहीं है।" और वह पूरे अपने पूरे दिलो जान से इस व्यवसाय को आगे बढ़ने में लगे हैं।

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