जंगली जानवरों का शिकार करने वाले पारधी समुदाय की नई पीढ़ी बनी जंगल की रक्षक

तूफान सिंह कभी खुद एक शिकारी थे, उनका पिता और दादा भी जंगली पशुओं का शिकार करके जीवन चलाते थे, लेकिन अब वो नई भूमिका में हैं। पारधी समुदाय के युवा जंगल के संरक्षक बन गए हैं, नेचर गाइड बन कर आजीविका चला रहे हैं

Arun SinghArun Singh   22 Jun 2021 12:02 PM GMT

जंगली जानवरों का शिकार करने वाले पारधी समुदाय की नई पीढ़ी बनी जंगल की रक्षक

पारधी समुदाय के लोग पन्ना के रानीपुर के सेहा जंगल में आने वाले पर्यटकों को कराते हैं जंगल की सैर। 

पन्ना (मध्यप्रदेश)। डेढ़ दशक पहले तक जंगलों के आसपास डेरा डालकर शिकार करना पारधी समाज के लोगों की जिनकी जिंदगी का अभिन्न हिस्सा था, वे शातिर शिकारी कभी जंगल और वन्य प्राणियों का संरक्षण करेंगे, कभी इसकी कल्पना करना मुश्किल था, लेकिन मध्य प्रदेश के पन्ना जिले के जंगल में ये सच हो रहा है।

शिकार के लिए मध्य प्रदेश सहित महाराष्ट्र और राजस्थान के जंगलों में घूमने वाले इन पारधियों का पहले कोई स्थाई ठिकाना नहीं था, लेकिन वन महकमे की पहल से अब उन्हें बसाकर समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का काम किया जा रहा है। समुदाय के युवक युवतियां नेचर गाइड बनकर काम कर रहे हैं।

'मुगलों के जमाने से हम हम जंगल में शिकार करते आ रहे'

रोज की तरह अपने काम पर निकले तूफान सिंह (70वर्ष) गांव कनेक्शन को बताते हैं, "मुगलों के जमाने से हम जंगल में जाकर शिकार करते रहे हैं। हमारे बाप दादा भी यही काम करते थे। जंगल में घूम-घूम कर शिकार करना हमारी जिंदगी थी। हमारे पुरखों ने कितने जानवरों का शिकार किया, इसका कोई हिसाब नहीं है।"

मध्य प्रदेश में पन्ना शहर से 7 किलोमीटर दूर गांधीग्राम में पारधियों की बस्ती है, जहां 60-70 परिवार निवास करते हैं। पारधियों के इस कुनबे में सबसे बुजुर्ग 70 वर्षीय तूफान सिंह हैं।

पन्ना में पारधी समुदाय की बस्ती। सभी फोटो- अरुण सिंह

शिकार का यह सिलसिला तब थमा जब पन्ना टाइगर रिजर्व सहित आसपास के जंगलों से वर्ष 2008-09 में बाघों का नामोनिशान मिट गया। पन्ना के जंगलों में बाघों के उजड़ चुके संसार को फिर आबाद करने से पहले शिकारी पारधियों की जीवन शैली में बदलाव लाना जरूरी था।

शिकारी समुदाय ही जंगल और जंगली पशुओं का रक्षक बन सके इसलिए उन्हें मुख्य धारा में जोड़ना और उनकी आजीविका के नए इंतजाम जरुरी हो गए थे। वन विभाग ने सकारात्मक पहल करते हुए टाइगर रिजर्व के आसपास के पारधियों को गांधीग्राम में बसाकर उनके बच्चों को शिक्षा से जोड़ा तथा पारधी युवकों का उपयोग नेचर गाइड के रूप में प्रशिक्षण दिया।

तूफान सिंह के मुताबिक बस्ती में बसने और नेचर गाइड बनने से उनके पुराने काम बंद हो गए और कमाई के नए रास्ते खुल गए।

"पहले हम शिकार के लिए इस जंगल से उस जंगल भटकते फिरते थे, लेकिन अब हमारा यही हुनर आय का जरिया बन रहा है। जंगली जानवरों व पक्षियों की आवाज निकाल कर हम पर्यटकों को जब जंगल की सैर कराते हैं तो उनको बहुत अच्छा लगता है।" नेचर गाइड वीरेन पारधी (36 वर्ष ) बताते हैं।

नेचर गाइड की भूमिका में पारधी समुदाय के युवक और युवतियां।

पशु-पक्षियों की आवाज निकालने में माहिर, पहचानते हैं पैरों के निशान

पारधी पशु-पक्षिओं की आवाज निकालने, उनके पैरों के निशान पहचानने, पेड़-पौधों की जानकारी आदि के बारे में महारत रखते हैं। 21 जून को गांव कनेक्शन की टीम ने पारधी गाइडों के साथ रानीपुर के जंगल व सैकड़ों फिट गहरे सेहा का भ्रमण किया। यहां का गहरा सेहा, घना जंगल तथा सैकड़ों प्रजाति के पक्षी व वन्यजीव पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन रहे हैं। इस पर्यटन गतिविधि को "वॉक विद पारधी" कहा जाता है। जंगल देखने में आने वाले पर्यटक इन्हें अपने साथ ले जाते हैं, जिसके पैसे मिलते हैं। नेचर गाइड वीरेन पारधी के मुताबिक पर्यटक अपने मन से जो पैसे देते हैं वो लोग रख लेते हैं। लेकिन ज्यादा लोग 100-50 रुपए प्रति व्यक्ति जरुर दे देते हैं।

जंगल, वन्यजीव और पक्षी पारधियों के जीवन में इस कदर रचे बसे हैं कि वे जंगल की आबोहवा से ही भांप लेते हैं कि कौन सा वन्यजीव आसपास मौजूद है। वे जब पक्षियों की आवाज निकालते हैं तो पक्षी भी धोखा खा जाते हैं और आवाज की दिशा में चले आते हैं।

रानीपुर सेहा में गाइड वीरेन पारधी ने गांव कनेक्शन टीम को भी तेंदुआ, तीतर, राष्ट्रीय पक्षी मोर सहित अन्य कई पक्षियों की आवाज निकाल कर सुनाई। इस वॉक में नेचर गाइड बड्डा पारधी (32 वर्ष), रातनी पारधी (22 वर्ष) व दिशावरनी पारधी (23 वर्ष) भी थे, जिन्होंने पेड़-पौधों और पक्षियों के बारे में रोचक जानकारी दी।


पारधी कौन होते हैं?

पन्ना टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक उत्तम कुमार शर्मा बताते हैं, " पारधी मूलतः शिकारी समुदाय के लोग हैं, जिनमें हंटिंग के अलावा दूसरा कोई स्किल नहीं था। हमने (वन महकमा) नई पीढ़ी को शिक्षित करने की पहल की है। पारधी बच्चों के लिए स्कूल व छात्रावास संचालित किए। युवाओं को नेचर गाइड के लिए प्रेरित किया गया है।"

शर्मा आगे बताते हैं, "पारधी अनुसूचित जाति या जनजाति वर्ग में पारधी नहीं आते, उन्हें विमुक्त, घुमक्कड़ एवं अर्द्ध घुमक्कड़ समुदाय के रूप में जाना जाता है।" पारधियों की आबादी छत्तीसगढ़ में भी है। समय-समय पर इस समाज से जुड़े लोग खुद को जनजाति वर्ग शामिल करने की मांग करते रहे हैं। शर्मा के मुताबिक पारधियों की आजीविका अब जंगल से सहारे है तो वो वहां कोई अनैतिक गतिविधि होने नहीं देते।

पारधी लोगों को समाज की मुख्य धारा में शामिल करने में 'लास्ट वाइल्डरनेस फाउंडेशन' की भूमिका भी रही है। मुंबई की ये गैर सरकारी संस्था वाइल्ड लाइफ कंजर्वेशन, जंगलों में रहने वाले आदिवासी, ऐसे घुंमतू लोगों के पुनर्वास पर काम करती है। 2009 में बनी ये संस्थआ पन्ना में इन पारधियों को पर्यटन गतिवधियां संचालन करने में भी मदद करती है।

पन्ना में पिछले 7-8 वर्षों से काम कर रही लास्ट वाइल्डरनेस फाउंडेशन के फील्ड कोऑर्डिनेटर इंद्रभान सिंह बुंदेला गांव कनेक्शन को बताते हैं, " यहां के पारधियों का अब आधार और राशन कार्ड भी है। उनके पास मतदान का अधिकार भी है। इस समुदाय की मौजूदगी छोटे-छोटे कुनबों में प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में है। लेकिन बुंदेलखंड क्षेत्र में इनकी संख्या अधिक है। मध्य प्रदेश में इनकी अनुमानित संख्या लगभग 10 हजार है।"

बुंदेला के मुताबिक बुंदेलखंड क्षेत्र के पन्ना, कटनी, छतरपुर, दमोह व सागर जिले में पारधी समुदाय के लोग रहते हैं। इसके अलावा होशंगाबाद, डिंडोरी, मंडला, जबलपुर, भोपाल, विदिशा व निवाड क्षेत्र में भी इनकी मौजूदगी पाई गई है।

नेचर गाइड को पर्यटक अपनी सुविधा के अनुसार पैसे दे देते हैं।


सेहा मध्यप्रदेश के राज्य पक्षी दूधराज का अच्छा हैबिटेट

पन्ना में टाइगर रिजर्व के बफर एरिया से सटा रानीपुर सेहा जंगल में पर्यटन गतिविधि "वॉक विद पारधीज" संचालित होती है, यह इलाका मध्य प्रदेश के राज्य पक्षी दूधराज का अच्छा हैबिटेट (पर्यावास) है।

बुंदेला बताते हैं, "रानीपुर का सेहा दूधराज पक्षी (इंडियन पैराडाइज फ्लाइकैचर) का प्रिय रहवास है। यहां टुइयाँ (तोता), उल्लू, पपीहा, धनेश, इंडियन पिटटा (नवरंगा) सहित दर्जनों प्रजाति के पक्षी बहुतायत से पाए जाते हैं। विलुप्त प्राय गिद्धों की प्रजाति भी यहां पाई जाती है। यहां तक कई बार बाघ भी दिखते हैं।"

बुंदेला के मुताबिक रानीपुर का यह जंगल पन्ना टाइगर रिजर्व व रानीपुर वन्य जीव अभ्यारण (चित्रकूट, यूपी) के बीच का गलियारा है, जिसका उपयोग बाघ करते रहे हैं। वर्ष 2015 में पन्ना टाइगर रिजर्व की एक बाघिन इसी गलियारे का उपयोग करते हुए चित्रकूट के जंगल में पहुंची थी।

पन्ना टाइगर रिजर्व अमूमन मॉनसून आऩे के साथ 30 जून को पर्यटकों के लिए बंद हो जाता है लेकिन लेकिन आसपास के जंगल में पर्यटन गतिविधियां चलती रहती हैं। रानीपुर जंगल उसी में एक है। स्थानीय लोगों के मुताबिक बारिश के सीजन में जब पहाड़ों से पानी गिरता है तो कई जगह बहुत सुरम्य वातावरण बनता, जिसे देखने दूर-दूर से लोग आते हैं। और यही लोग नेचर गाइड के लिए कमाई का जरिया बनते हैं।

कुछ साल पहले तक जंगलों के आसपास ऐसे रहते थे पारधी समुदाय के लोग। फाइल फोटो-अरुण सिंह

बाहर भी दुनिया तलाश रही नई पीढ़ी

एक टेबल नुमा पत्थर की पटिया में पढ़ाई कर रही युवती सिजारन पारधी (31 वर्ष) इस कुनबे की सबसे ज्यादा शिक्षित है। सतना के महात्मा गांधी कॉलेज बीए फाइनल की छात्रा सिराजन बताती हैं, "मेरे पति बड्डा पारधी भी नेचर गाइड हैं। जब गांव आती हूं तो कुनबे के बच्चों को पढ़ाती हूं। कई बच्चे अब शहर जाकर पढ़ना भी चाहता है।"

जंगल में रहने वालों पर पड़ा कोरोना का असर

पारधियों को जल, जंगल, पेड़-पौधों को समझने का हुनर जन्मजात है। ये जंगली औषधियों (जड़ी बूटी) के अच्छे जानकार भी होते हैं। समुदाय कई महिलाएं इन जड़ी बूटियों को गांव-गांव जाकर बेचती भी हैं।

पारधियों की बस्ती निवासी किलकिली बाई पारधी (48 वर्ष) गांव कनेक्शन को बताती हैं, "जड़ी बूटियों का ज्ञान बुजुर्गों से हमें मिला है। इन जड़ी-बूटियों से औषधि बनाकर हम बेचते हैं। लेकिन पिछले एक डेढ़ साल से कोरोना के कारण यह धंधा प्रभावित हुआ है। कुछ महिलाएं चूड़ियां भी बेचती थीं लेकिन अब रोक (कोरोना) के चलते डेढ साल से कहीं नहीं जा रहे।"



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