गांव वालों के सहयोग से ही बेहतर हो सकेंगे सरकारी स्कूल

गांव वालों के सहयोग से ही बेहतर हो सकेंगे सरकारी स्कूलसरकारी स्कूल में बना शौचालय। 

लखनऊ। यूपी के इस पूर्व माध्यमिक विद्यालय में आज से दो साल पहले तक न तो शौचालय था और न ही पीने के पानी की सुविधा। इसके अलावा भी कई ज़रूरी सुविधाएं नहीं थीं। विद्यालय प्रबंधन समिति में बच्चों के अभिवावकों की सक्रिय भागीदारी से आज इस स्कूल में शौचालय से लेकर बाउंड्रीवाल तक सब कुछ नया बन चुका है।

आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली जमुना को अब शौच के लिए अपने स्कूल से बाहर खेत में नहीं जाना पड़ता है। जमुना खुश होकर बताती है, “पहले बहुत दूर खेत में जाना पड़ता था, कई बार लोग खेतों में काम कर रहे होते थे तब दूर जाना पड़ता था। पानी पीने के लिए भी दूर जाना पड़ता था। जबसे शौचालय बन गया है और नल लग गया है तबसे हमें बहुत आराम हो गया है।”

लखनऊ जिले के माल ब्लॉक के अटारी गांव के पूर्व माध्यमिक विद्यालय की तरह यूपी में ऐसे कई स्कूल होंगे जो मूलभूत सुविधाओं से वंचित होंगे। अभिभावकों के सहयोग से बनी विद्यालय प्रबंधन समिति की पहल से पूर्व माध्यमिक विद्यालय अटारी में न सिर्फ अतिशीघ्र शौचालय का निर्माण हुआ बल्कि और भी कई मूलभूत सुविधाओं को पूरा किया गया।

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बैंगनी दुपट्टे पे जमुना और उसकी माँ।

लखनऊ जिला मुख्यालय से लगभग 38 किलोमीटर दूर माल ब्लॉक के पूर्व माध्यमिक विद्यालय आटारी में प्रबंधन समिति की सदस्य पार्वती देवी (37 वर्ष) ने बताया, “हमें लगता था स्कूल में जो भी समस्या है उसकी जिम्मेदारी स्कूल की है। जब हमें लखनऊ में ट्रेनिंग दी गयी तब पता चला कि जिनके बच्चे स्कूल में पढ़ते हैं उनकी भी जिम्मेदारी है जितनी स्कूल की। सबसे पहले हम पंचों ने स्कूल में शौचालय, नल, बाउंड्री पर बात की।” वो आगे बताती हैं, “खेतों में काम करने के बाद थोड़ा समय निकालकर मीटिंग में चले जाते हैं। अब हमारी बिटिया को स्कूल जाने में कोई परेशानी नहीं होती है।”

यूनीसेफ द्वारा यूपी के छह जिले बलरामपुर-श्रावस्ती, मिर्जापुर-सोनभद्र, बदायूं-लखनऊ के जिलों में दो साल पहले ‘विद्यालय प्रबंधन समिति’ पर काम हुआ था। जिसमें इन छह जिलों के हर न्याय पंचायत के दो सरकारी स्कूलों सहित 1400 विद्यालयों में काम किया गया। लखनऊ में यूनीसेफ के शिक्षा विशेषज्ञ ऋत्विक पात्रा गांव कनेक्शन को फ़ोन पर बताते हैं, “विद्यालय प्रबंधन समिति को लगभग दो वर्षों में मजबूत करने का काम किया गया। समिति को स्कूल और ग्राम पंचायत से सीधे जोड़ा गया। जिससे स्कूल में 35 प्रतिशत तक बच्चों की उपस्थिति में इजाफा हुआ। 80 से 90 प्रतिशत शिक्षक स्कूल समय से आने लगे।”

विद्यालय के सहायक इंचार्ज प्रधानाध्यापक राकेश कुमार गौतम ने कहा, “अपना काम छोड़कर बच्चों के माता पिता स्कूल आते हैं ये बहुत बड़ी बात है। सभी सदस्य तो नहीं आ पाते हैं लेकिन कुछ लोग आते हैं। दो साल पहले शौचालय तो था पर वो जर्जर था, अब सुविधायें बेहतर हो गयी हैं।” उन्होंने आगे कहा, “इन सब सुविधाओं के बीच इस समय सबसे बड़ी समस्या हमारे स्कूल में शिक्षकों की हैं, 94 बच्चों में मैं अकेला हूँ जिसकी वजह से मैं चाह कर भी अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं कर पा रहा हूँ।”

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विद्यालय प्रबंधन समिति कि सदस्य गुड्डी देवी।

देश भर में 60 लाख शिक्षकों के पद स्वीकृत हैं, जिनमें 9 लाख प्राथमिक स्कूलों में और 1 लाख माध्यमिक स्कूलों में खाली पड़े हैं। अगर दोनों तरह के स्कूलों में शिक्षकों के रिक्त पदों को जोड़ दिया जाए तो 10 लाख होते हैं। बड़े हिंदी भाषी राज्यों- उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में 33.3 करोड़ लोग रहते हैं, जहां प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में शिक्षकों की औसतन एक तिहाई सीटें खाली पड़ी हैं। गोवा, ओडिशा और सिक्किम के प्राथमिक स्कूलों में शिक्षकों का कोई पद खाली नहीं है।

अटारी गांव की विद्यालय प्रबंधन समिति की एक और सदस्य गुड्डी (35 वर्ष) पढ़ी-लिखी भले ही न हों पर विद्यालय प्रबंधन समिति में क्या उनकी भूमिका है ये उन्हें अच्छे से पता है। उनका कहना है, “हम पढ़े नहीं तो क्या हुआ बोलना तो जानते हैं। जब हमें ये पता चला कि अगर सरकारी स्कूल की पढ़ाई सुधारनी हैं तो हम सबको स्कूल में जाना पड़ेगा। हम समय निकाल कर स्कूल जाते हैं बच्चों को ड्रेस अच्छी मिले, अच्छा खाना मिले, साफ़-सफाई रहे इसकी जिम्मेदारी हम सबकी है।”

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