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छोटे से प्रयास से इस प्राइमरी स्कूल में आने लगे ज़्यादा बच्चे 

Neetu SinghNeetu Singh   28 Jan 2018 4:43 PM GMT

छोटे से प्रयास से इस प्राइमरी स्कूल में आने लगे ज़्यादा बच्चे लखनऊ के प्राथमिक विद्यालय बसंतपुर में 85 प्रतिशत से ज्यादा रहती है बच्चों की उपस्थिति।

लखनऊ। अक्सर सुनने में आता है कि सरकारी विद्यालयों में नामांकन बच्चों की अपेक्षा बच्चों की उपस्थिति कम होती है। अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजने के लिए जिम्मेदारी नहीं निभाते और शिक्षकों की इसमें रुचि नहीं होती है लेकिन उत्तर प्रदेश के इस प्राथमिक विद्यालय में अभिभावक और शिक्षक दोनों की सहभागिता से बच्चों की उपस्थिति 80 से 85 प्रतिशत से ज्यादा हमेशा रहती है।

लखनऊ जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर दूर माल ब्लॉक के प्राथमिक विद्यालय बसंतपुर में 150 बच्चों का नामांकन है। इस विद्यालय में हर दिन 120 से 125 बच्चे नियमित स्कूल आते हैं। बच्चों का स्कूल में नामांकन के बाद ठहराव बढ़े इसके लिए इस विद्यालय में दो साल पहले खुली बैठक हुई थी जहां सभी की सहमति से ‘विद्यालय प्रबंधन समिति’ का गठन किया गया था।

विद्यालय प्रबंधन समिति के अध्यक्ष रामवली मौर्य (35 वर्ष) बताते हैं, “पहले हमें लगता था बच्चे रोज स्कूल पढ़ने आयें ये स्कूल के मास्टर जी की जिम्मेदारी है पर जब खुली बैठक में ये समिति बनाई गयी और सभी को जिम्मेदारी दी गयी कि अपनी-अपनी गली के बच्चों को रोज स्कूल भेजो। ये काम सभी लोगों ने एडमिशन के एक दो महीनें लगकर शुरू किया। ऐसा करने से बच्चों की उपस्थिति धीरे-धीरे बढ़नी शुरू हो गयी।”

विद्यालय प्रबंधन समिति की एक सदस्य सुमन देवी।

उन्होंने आगे कहा, “पहले जहां स्कूल में 40-50 बच्चे ही पढ़ने आते थे, बाकी बच्चे खेलते रहते या घर में काम करते थे। जबसे हर महीनें ये मीटिंग होनी शुरू हुई है तबसे सभी लोगों की जिम्मेदारी बंट गयी है। समिति का एक सदस्य कोई न कोई खाना चेक करने रोज आता है, जिस मोहल्ले के बच्चे नहीं आते है तो उस मोहल्ले का सदस्य उसे स्कूल भेजने का काम करता है।” जब तक कोई ख़ास वजह न हो तबतक इस स्कूल के बच्चे अनुपस्थित नहीं रहते हैं। स्कूल में अच्छी पढ़ाई हो, स्कूल साफ़-सुथरा रहे, बच्चे को हर दिन साफ़ सफाई से बना पौष्टिक भोजन मिले जैसी कई बातों का ध्यान यहां की ‘विद्यालय प्रबंधन समिति’ ध्यान में रखती है।

प्राथमिक विद्यालय बसंतपुर में हर महीनें की पांच या छह तारीख़ को विद्यालय प्रबंधन समिति की बैठक होती है। 15 सदस्यों में से हर मीटिंग में 10 से 12 लोग शामिल होते हैं। मीटिंग में किन-किन विषयों पर चर्चा होती है और उसमें क्या सुधार किया जाता है इसकी पूरी रिपोर्ट रजिस्टर में लिखी होती है। लखनऊ में काम कर रही एक गैर सरकारी संस्था वात्सल्य द्वारा प्लान इण्डिया के सहयोग से इस विद्यालय में ही नहीं बल्कि माल ब्लॉक के 32 माध्यमिक और पूर्व माध्यमिक में नियमित हर महीने विद्यालय प्रबंधन समिति की मीटिंग होती है। इसके अलावा लखनऊ के आठ ब्लॉक के 10-10 स्कूल मिलाकर 80 विद्यालयों में लगातार ये बैठकें होती हैं।

प्राथमिक विद्यालय बसंतपुर के बच्चे पढ़ने में हैं होशियार।

विद्यालय के इंचार्ज प्रधानाचार्य विजय कुमार यादव ने बताया, “विद्यालय प्रबंधन समिति के लोग महीने में जो चर्चा करते हैं उसे स्कूल में लागू करते हैं। 11 अभिवावकों में छह महिलाएं पांच पुरुष हैं। ऐनम, लेखपाल, प्रधान द्वारा नामित एक सदस्य सदस्य, विद्यालय से प्रधानाध्यापक कुल मिलाकर 15 सदस्य हैं। हर मीटिंग में 11-12 लोग शामिल होते हैं।” वो आगे बताते हैं, “रेगुलर मीटिंग होने से सभी का काम बंट गया जिससे सिर्फ विद्यालय पर जिम्मेदारी नहीं बढ़ी। नामांकन तो बढ़ा ही उससे ज्यादा महत्वपूर्ण ये रहा कि बच्चों का स्कूल में ठहराव बढ़ा। स्कूल की साफ़-सफाई, ड्रेस और मिड डे मील की गुणवत्ता, स्कूल समय से खुलना समय से बंद होना जैसी तमाम चीजों में सुधार हुआ है।”

“हम हर सुबह एक चक्कर अपने मोहल्ले में लगा देते हैं और सभी बच्चों के घर जाकर कहते हैं कि वो तैयार होकर स्कूल जाएं। हफ़्ते में एक दिन स्कूल में खाना कैसे बना ये चेक करने आते हैं। जो खाना में कमी होती है उसे रसोइये को कहकर ठीक करने को कहते हैं।” ये बात विद्यालय प्रबंधन समिति की एक सदस्य सुमन देवी (38 वर्ष) ने कही, “अब तो जो सुबह स्कूल के समय जो बच्चे खेल रहे होते हैं मुझे देखते ही स्कूल जाने के लिए तैयार होने चले जाते हैं। पांचवी कक्षा में मेरा बेटा पिंकू पढ़ता है जो पढ़ने में पहले से ज्यादा होशियार हो गया है।”

विद्यालय प्रबंधन समिति के अध्यक्ष रामवली मौर्य।

वात्सल्य संस्था के प्रोजेक्ट मैनेजर अंजनी सिंह पिछले पांच साल में विद्यालय प्रबंधन समिति को लेकर अपना अनुभव साझा करते हुए बताते हैं, “इस मीटिंग में अभिभावकों की सहभागिता होने से कई तरह के सुधार हुए हैं। इन बैठकों से बच्चों का नामांकन, उनका स्कूल में ठहराव, टीचरों का विद्यालय समय से आना, शिक्षा और पठन-पाठन सामग्री की गुणवत्ता, मिड डे मील जैसी तमाम चीजों में सुधार हुआ है।”

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