गंगा किनारे गरीब बच्चों का वो स्कूल जहां मुफ्त में फ्रेंच और संस्कृत भी सिखाई जाती है

कानपुर। ऐसे समय में जब शिक्षा का व्यवसायीकरण हो चुका है, स्कूल आैर कोचिंग के नाम पर हजारों रुपए फीस ली जा रही है, वहीं कानपुर का एक युवा गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा देकर बदलाव की अलख जगा रहा है। गंगा किनारे घाट पर प्रतिदिन सैकड़ों बच्चों को ये युवा शिक्षित कर रहा है। इस कोचिंग में बच्चों को फ्रेंच आैर संस्कृत भी सिखाई जा रही है।

कानपुर नगर में गंगा नदी के करीब आनंदेश्वर मंदिर के कमलेश्वर घाट पर हर शाम एक स्कूल चलता है। नर्सरी से लेकर 12वीं तक के करीब 150 बच्चों को यहां ट्यूशन पढ़ाया जा रहा है। बेहद गरीब घरों के बच्चों को पेंसिल और कॉपी भी दी जाती है। इस कोचिंग की एक और जो सबसे खास बात है वो यह कि यहां हिंदी, इंग्लिश के अलावा संस्कृति और फ्रेंच भी सिखाई जाती है। शायद यही वजह है कि बरसात के दिनों में भी उफनाती गंगा की लहरों को नावों से पार कर दर्जनों बच्चे यहां पढ़ने आते हैं। इलाके के लोग इसे घाट वाला स्कूल बोलते हैं। यहां गरीब बच्चों के साथ उनकी मम्मियों को भी पढ़ाया जाता है।


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यहां पढ़ने वाले ज्यादातर बच्चे सरकारी स्कूलों के हैं। इनके परिजन उनकी कोचिंग का खर्च उठाने में सक्षम नहीं हैं। कई बच्चे ऐसे भी हें जो मिठाई की दुकान या दूसरी जगहों पर काम करते हैं। इन सबका भविष्य संवाराने की जिम्मेदारी ली है नितिन कुमार ने।

कोचिंग शुरु करने के बारे में नितिन बताते हैं, "जब मैं पढ़ता था तो मेरे पास कभी पेंसिल नहीं होती थी तो कभी कॉपी। मां दूसरों के घरों में चौका बर्तन कर हमें पढ़ाती थीं। पिताजी घर में आर्थिक मदद नहीं करते थे। मां पढ़ी-लिखी नहीं थीं। लेकिन उन्होंने चारों भाई-बहनों को पढ़ाने के लिए दूसरे के घरों में काम करना शुरू कर दिया। मैंने अभाव का जीवन देखा है। इसलिए मैं नहीं चाहता कि दूसरे बच्चे भी इसका सामना करें।" नितिन विधि की पढ़ाई कर रहे हैं साथ सिविल सर्विसेज की तैयारी भी कर रहे हैं। यहां तक पहुंचने के लिए उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा है।


इस कोचिंग में पढ़ना वाला दीपक पहले एक मिठाई की दुकान पर काम करता था, लेकिन अब वो यहां संस्कृत पढ़ता है। दीपक बताता है, "हलवाई के यहां काम करने के अलावा वो कई शराब की दुकानों पर भी काम कर चुका है और जो लोग शराब पीने आते थे, उन्हें खाने-पीने की चीजें जा कर देता था।' दीपक जैसे कई बच्चों का जीवन अब बदल चुका है।

इस कोचिंग सेंटर की स्थापना कुछ साल पहले ही हुई लेकिन नितिन गरीब घरों के बच्चों को पढ़ाना बहुत पहले शुरू कर दिया था। जब वो दसवीं में थे तभी से बस्ती जाकर बच्चों को पढ़ाने लगे थे। 12वीं तक पहुंचते-पहुंचते उनके घर पढ़ने आने लगे। उस दौरान नितिन की एक शर्त थी, पढ़ाएंगे उन्हीं बच्चों को जो आगे चलकर दूसरे बच्चों को मुफ्त में पढ़ायेगा। नितिन बताते हैं घर में चल रही कक्षाओं से सुकून मिलने लगे था, लेकिन ये घर तक सिमट कर रह गया था। कूड़ा बीनने और दूसरे गरीब घरों के बच्चे घर नहीं आते थे, इसलिए इन्हीं बस्तियों के बीच घाट पर ये स्कूल (कोचिंग सेंटर) खोला गया।

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नितिन बताते हैं जब मैंने अपने साथी अनंत के साथ ये कोचिंग शुरू की तो सिर्फ 4-5 बच्चे थे, उन्हें वो अपनी पॉकेट मनी से पेन-पेंसिल देते थे। फिर कारवां चल पड़ा और बच्चों की संख्या बढ़ने लगी। संसाधनों की कमी हो गई थी, लेकिन कई साथी सहयोग को तैयार हो गए। कोई पेन पेंसिल का इंतजाम करवा रहा था तो कोई खुद पढ़ाने आने लगा था।'

फतेहपुर जिले के रहने वाले अनंत परमट में एक हॉस्टल में रहते हैं। वो ग्रीन पार्क स्टेडियम में क्रिकेट की कोचिंग करते हैं। अपने सपने को पूरा करने में जुटे अनंत इन बच्चों को खेल की बारीकियां सिखाते हैं। अनंत घाट पर आने वाले बच्चों को फिट रहने और अच्छे आचरण को लेकर जागरूक करते हैं। अनंत बताते हैं, "मानसिक विकास के साथ शारीरिक व्यायाम भी आवश्यक होता है। हर रविवार इन बच्चो को खेल और कुछ दूसरी एक्टिवटी कराता हूं। पढ़ाई के बाद थोड़ा खेलने-कूदने को भी मिलता है तो बच्चों का मन लगा रहता है।


नितिन और अनंत को उनके कई दोस्तों ने सहयोग मिल रहा है। नंदिनी उपाध्याय, विष्णु और सिद्धार्थ ने बच्चों को पढ़ाने और संसाधन जुटाने में मदद की। आज यहां करीब डेढ़ सौ बच्चे पढ़ने आते हैं। बच्चों को संस्कृत के साथ फ्रेंच भी सिखाई जाती है। कुछ गरीब बच्चों का रेगुलर स्कूलों में दाखिला करवाया गया है, जिनकी फीस का इंतजाम भी इन्हीं लोगों ने किया है।

नितिन की सहयोगी आर्पिता वर्मा से एक बार किसी ने सवाल किया इन बच्चों को पढ़ाने के तुम्हे कितने पैसे मिलते हैं, अर्पिता का जबाव सवाल पूछने वाले तो निरुत्तर कर गया था। "मुझे इन बच्चों को पढ़ाने से सुकून मिलता है और इन बच्चों से जो प्यार मिलता है वह आप कितने भी पैसे देकर नहीं खरीद सकते हैं।"

हर रविवार को मम्मियों को लगती है क्लास

नितिन उस दिन को कभी नहीं भूल सकते जब एक बच्चे ने आकर उनसे एक अतिरिक्त पेंसिल और कॉपी मांगी थी। नितिन के सवाल के जवाब में बच्चे ने कहा कि उसकी मां निरक्षर हैं लकिन वो चाहता है कि स्कूल में पढ़ने के बाद वो अपनी मम्मी को पढ़ाए। नितिन बताते हैं "हमें इन बच्चों को मांओं को पढ़ाने का ख्याल तभी आया। हफ्ते के बाकी दिन बच्चे नदी पारकर घाट पर आते हैं और रविवार को हम लोग नदी पारकर उस तरफ जाकर उनके घरों की महिलाओं को पढ़ाते हैं।'


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इस साप्ताहिक स्कूल में पढ़ने वाली दिबनी पुरवा की निर्मला देवी बताती हैं, "बचपन में पढ़ाई छूट गई थी। लेकिन इन लोगों के आने से फिर से शुरू हो गई हैं। नाम लिख लेते हैं, बैंक में दस्तखत करते हैं। नोट भी गिन लेते हैं।' रविवार के इस विशेष स्कूल में इन बच्चों की मम्मियों के साथ कई चाचियां और दादियां भी क, ख, ग और एबीसीडी पढ़ती हैं।

सुयश शादीजा / राजीव शुक्ला

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