महाराष्ट्र के 17 हजार किसानों को उनकी उपज का सही दाम दिला रही ये महिला उद्यमी

महाराष्ट्र के 17 हजार किसानों को उनकी उपज का सही दाम दिला रही ये महिला उद्यमीरीमा साठे ने किसानों को उनके पारंपरिक अनाजों के दिए वाजिब दाम 

एक छोटी जोत का किसान कैसे अपनी फसलों से बेहतर लाभ ले सकता है ? इस गंभीर समस्या से किसानों को अक्सर दो चार होना पड‍़ता है। किसानों को सिवाय नुकसान के हाथ कुछ नहीं लगता। ऐसे में एक महिला उद्यमी ने इस ओर पहल की आैर अब तक 17 हजार किसानों को खुद वाजिब दाम दे रही हैं।

महाराष्ट्र के 17000 किसान अब बाजार में सीधे अनाज नहीं बेचते बल्कि उसका प्रोसेसिंग करके बेचते हैं, जिससे इन किसानों को अपने अनाज का दोगुना भाव मिलता है। ऐसा संभव हो पाया है पुणे की रहने वालीं रीमा साठे की बदाैलत।

पुणे में रहने वाली केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई किए रीमा साठे को लगभग सात साल मल्टीनेशनल कम्पनी में मैन्युफैक्चरिंग और फूड सर्विस में मार्केटिंग का अनुभव है। रीमा ने कनेक्शन को फोन पर बताया “महाराष्ट्र के आदिवासी और छोटी जोत के किसानों से मिलने के बाद मुझे पता चला कि इनके पास 120 प्रकार के पारंपरिक अनाज हैं जिनमें प्रोटीन की मात्रा बहुत ज्यादा है। लेकिन ये किसान इसे खाने भर का ही उगाते थे, बाजार में इसे बेचते नहीं थे।”

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ग्रामीण महिलाएं बन रही हैं आत्मनिर्भर

रीमा ने महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित क्षेत्र विदर्भ के अकोला, अमरावती, यवतमल जिलों के किसानों मिलने के बाद एक लक्ष्य बना लिया कि इनके लिए कुछ करना है। ताकि इन किसानों को उनके प्रोटीन युक्त अनाजों का सही भाव मिल सके और उनका पलायन रुके।

पारंपरिक अनाज जैसे ज्वार, बाजरा, कुट्टू, मक्का जैसी कई प्रजातियों पर रीमा ने एक शोध किया, जिसमें यह पाया कि जो लोग शहरों में रहते हैं उन्हें इस तरह के प्रोटीन युक्त अनाज खाने को नहीं मिलते हैं। इन पौष्टिक अनाजों से कैसे पौष्टिक उत्पाद बनाकर शहरों में रहने वाले लोगों तक पहुंचाया जाए जो इसे खाने के शौकीन हैं। रीमा ने इस दिशा में एक लम्बा शोध किया और कई जगह प्रशिक्षण भी लिया। कुछ वैज्ञानिकों की मदद से इन्होंने वर्ष 2014 में अपना काम करना शुरू कर दिया।

ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएं खेती के आधुनिक टू-तरीके सीखकर बन रही हैं हुनरमंद

इन्होंने जनवरी 2015 में ‘हैप्पी रूट्स फूड्स एंड ब्रेवरीज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड’ नाम की कंपनी खोली जिसकी ये संस्थापक और निदेशक हैं। रीमा साठे ने महाराष्ट्र के 15000 पुरुष और 2000 महिला किसानों को प्रशिक्षित किया है कि वो अपने पारंपरिक अनाजों को बाजार में सीधे न बेचकर उसका प्रोसेसिंग करके बेचें, जिससे उन्हें दोगुना लाभ मिलेगा। ये किसानों से अनाज लेने की बजाए उसका आटा खरीदती हैं।

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रीमा बताती हैं, “किसानों को यह प्रशिक्षण दिया जाता है कि वो कैसे अपने पारंपरिक अनाजों को उच्च गुणवत्ता के साथ उगाएं, जिससे उन्हें प्रोटीन युक्त अनाजों का बेहतर दाम मिल सके। किसानों ने इस दिशा में काम करना शुरू कर दिया है। जो कुट्टू कभी वो अपने खाने के लिए ही उगाते थे, अगर आस-पास किसी को देते भी तो 30-40 रुपए ही उसका भाव मिलता। पिछले साल इन किसानों ने एक टन इसका उत्पादन किया था। ये आटा किसानों से अब हम सीधे खरीदते हैं जिसका उन्हें 90 से 100 रुपए मिलता है।”

किसानों को सिखाया जाता है कि वो कैसे गुणवत्तापूर्ण अनाज का उत्पादन करें

रीमा ने अपने बनाए ‘पौष्टिक खाद्य उत्पाद’ को कॉमर्शियल रूप से अगस्त 2015 से बाजार में बेचना शुरू कर दिया। ‘हैप्पी रूट्स’ के छह से सात आनलाइन पार्टनर हैं इन उत्पादों की मांग देश के साथ-साथ विदेशों में भी है। मुंबई और पुणे के कुछ होटल और कॉफ़ी शाप में बड़ी मात्रा में इनके बनाए उत्पाद जाते हैं। एक साल में इस कम्पनी का सालाना टर्नओवर 12 लाख रुपए है।

छोटी जोत के किसानों एवम ग्रामीण महिलाओं के लिए बेहतर काम करने के लिए रीमा को महिला एवम बाल विकास मंत्रालय द्वारा 8 मार्च 2017 को पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने नारी शक्ति अवार्ड से भी सम्मानित किया है। रीमा ने आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, मणिपुर में भी अपने काम की शुरुआत कर दी है।

ये महिलाएं बन रहीं आत्मनिर्भर

इन उत्पादों की ये है विशेषता

रीमा ने इन अनाजों से अभी छह प्रकार के ‘पौष्टिक खाद्य उत्पाद’ जिसमें कुकीज, क्रैकर्स, स्नैक्स बनाने शुरू कर दिए हैं। इनके उत्पादों की खासियत यह है कि ये पारंपरिक अनाज से बनाए जाते हैं। यह ‘पौष्टिक खाद्य उत्पाद’ मशीन की जगह हाथ से तैयार किया जाता है। यही वजह है कि इनका स्वाद बाजार में मिलने वाले दूसरे प्रोडक्ट से अलग है।

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हैप्पी रूट्स के प्रोडक्ट को बनाती हैं ग्रामीण महिलाएं

अहमदनगर में ‘निर्मिती महिला औद्योगिक सहकारी संस्था’ है जिसकी ओनर दो हजार ग्रामीण महिलाएं हैं। रीमा ने इन महिलाओं को इन खाद्य पदार्थों को बनाने का प्रशिक्षण दिया है। इनके साथ एक बेकरी यूनिट शुरू कर दी है, जहां ये महिलाएं उत्पाद बनाती हैं।

किसानों को बेहतर उत्पादन का समय-समय पर दिया जाता है प्रशिक्षण

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