कृषि तकनीक को किसानों तक पहुंचाने वाले कृषि विज्ञान केंद्र कैसे काम करते हैं?

शुरूआती दौर में एक प्रशिक्षण केंद्र के रूप में कार्य करने वाले कृषि विज्ञान केंद्र आज तकनीकी के परीक्षण, प्रदर्शन, प्रशिक्षण, प्रसार के साथ ही दूसरे कई कार्यक्रमों को किसानों तक पहुंचा रहे हैं। केवीके राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली का एक अभिन्न अंग हैं।

Dr. Satyendra Pal SinghDr. Satyendra Pal Singh   10 Jan 2022 9:23 AM GMT

कृषि तकनीक को किसानों तक पहुंचाने वाले कृषि विज्ञान केंद्र कैसे काम करते हैं?

इस समय सम्पूर्ण देश में लगभग 722 केवीके कार्य कर रहे हैं। यह सभी केवीके पूरे भारत में संचालित 11 कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थानों के तकनीकी मार्गदर्शन में कार्य करते हैं। सभी फोटो: अरेंजमेंट

जिस तरह लोगों को सेहतमंद रखने और जरूरी स्वास्थ्य सलाह देने के लिए जिस तरह से अस्पतालों में डॉक्टर उपलब्ध रहते हैं, उसी तरह ही किसानों की समस्याओं के समाधान और फसलों में लगने वाली बीमारियों के इलाज के लिए कृषि विज्ञान केंद्र भी काम करते हैं। हर जिले में किसानों की मदद के लिए एक या फिर दो कृषि विज्ञान केंद्र संचालित होते हैं जहां पर किसानों की हर एक समस्या के समाधान के लिए डॉक्टर यानी वैज्ञानिक मौजूद रहते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि कृषि विज्ञान केंद्र की शुरूआत कैसे हुई और ये कैसे काम करते हैं?

भारतीय कृषि हमेशा से पूरी तरह मौसम पर आधारित रही है। गांवों में प्राचीन समय से ही एक कहावत प्रचलन में रही है, कि खेती करना किसानों के लिए किसी जुआ खेलने से कम नहीं हैं। 1960 के दशक के बाद आई हरित क्रांति के बाद भी पूरे देश में एक समान खेती के विकास का लाभ किसानों को नहीं मिल पा रहा था। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, पूसा, नई दिल्ली के विभिन्न शोध संस्थानों और कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा खेती-बाड़ी व उससे जुड़े विषयों पर किए जा रहे नवीनतम शोध इस दौर के बाद भी गांव, खेतों और किसानों तक नहीं पहुंच पा रहे थे।


खेती-किसानी का ज्ञान प्रयोगशालाओं और शोध संस्थानों से निकलकर गाँव-किसानों तक कैसे पहुंचे इस दिशा में भारत सरकार द्वारा एक कार्य योजना तैयार की गई। इसी को मध्येनजर रखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा कृषि विज्ञान केंद्रों को खोलने का अभिनव प्रयोग किया गया। इसकी शुरूआत पहला केवीके 1974 में पांडिचेरी में डॉ. मनमोहन सिंह मेहता की अध्यक्षता में गठित दल की रिपोर्ट आने के बाद लिया गया। तब से अब तक 46 वर्षों के कालखण्ड में देश के लगभग हर छोटे-बड़े जिलों में केवीके खोले जा चुके हैं। देश के कुछ बड़े जिलों में एक की बजाय दो केवीके खोले गये हैं।

इस समय सम्पूर्ण देश में लगभग 722 केवीके कार्य कर रहे हैं। यह सभी केवीके पूरे भारत में संचालित 11 कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थानों के तकनीकी मार्गदर्शन में कार्य करते हैं। अटारी के नाम से लोकप्रिय यह संस्थान लुधियाना, जोधपुर, कानपुर, पटना, कोलकाता, गुवाहाटी, बारापानी, पुणे, जबलपुर, हैदराबाद और बेंगलुरू में स्थापित हैं, जो कि केवीके के साथ समन्वय और निगरानी की भूमिका निभा रहे हैं।

शुरूआती दौर में एक प्रशिक्षण केंद्र के रूप में कार्य करने वाले केवीके आज तकनीकी के परीक्षण, प्रदर्शन, प्रशिक्षण, प्रसार के अलावा नित्रोज अनेकों कार्यक्रमों को संचालित करने का सफल कार्य कर रहे हैं। केवीके राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली का एक अभिन्न अंग हैं। जो कि कृषि प्रौद्योगिकी के ज्ञान और संसाधन केंद्र के रूप में कार्य कर रहे हैं। जिसका मुख्य उद्देश्य प्रौद्योगिकी मूल्यांकन, शोध और प्रदर्शनों के माध्यम से कृषि और संबद्ध विषयों में स्थान विशिष्ट प्रौद्योगिकी मॉड्यूल का मूल्यांकन करना है। किसानों को तकनीकी से रूबरू कराने के लिए कृषि विज्ञान केंद्रों द्वारा प्रमुख रूप से विभिन्न कृषि प्रणालियों के तहतः कृषि प्रौद्योगिकियों की स्थान विशिष्टता का आंकलन करने के लिए ऑन फार्म परीक्षण किये जाते हैं। किसानों के खेतों में प्रौद्योगिकियों की उत्पादन क्षमता स्थापित करने के लिए प्रथम पंक्ति प्रदर्शनों का आयोजन करना।


आधुनिक वैज्ञानिक कृषि प्रौद्योगिकियों पर अपने ज्ञान और कौशल को अद्यतन करने के लिए किसानों और विस्तार कर्मिर्यों का क्षमता विकास करना। जिले की कृषि अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए सार्वजनिक, निजी और स्वैच्छिक क्षेत्र की पहल का समर्थन करने के लिए कृषि प्रौद्योगिकियों के ज्ञान और संसाधन केंद्र के रूप में काम करना हैं। किसानों की रूचि के विभिन्न विषयों पर आईसीटी एवं अन्य मीडिया माध्यमों का उपयोग करते हुए कृषि परामर्श प्रदान करने के अलावा गुणवत्तापूर्ण तकनीकी का उत्पादन करके किसानों को उपलब्ध कराना हैं। केवीके द्वारा अग्रिम पंक्ति की विस्तार गतिविधियों को संचालित करने के साथ ही कृषि नवाचारों को पहचान कर उनका दस्तावेजीकरण को भी बढ़ावा दिया जाता है।

केवीके भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर), नई दिल्ली द्वारा पूर्णतः वित्त पोषित प्लान टू प्लान संचालित परियोजना है। वर्तमान में केवीके प्रशासनिक दृष्टिकोण से आईसीएआर संस्थानों, राज्य एवं केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालयों, एनजीओ, राज्य सरकारों, अन्य शिक्षण संस्थानों आदि के अधीन पूरे देश में संचालित हो रहे हैं। जिसमें वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों एवं कर्मचारियों की नियुक्त से लेकर प्रशासनिक अधिकार इन संस्थानों का ही रहता है।

देश में इस समय कृषि विश्वविद्यालयों के अधीन 472, केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा 22, आईसीएआर संस्थानों द्वारा 66, गैर सरकारी संगठनों द्वारा 104, सार्वजनिक क्षेत्र के संगठनों द्वारा 3, राज्य सरकारों द्वारा 38, केंद्रीय विश्वविद्यालयों द्वारा 3, डीम्ड विश्वद्यिालयों द्वारा 8 एवं अन्य शिक्षण संस्थानों द्वारा 5 कृषि विज्ञान केंद्र संचालित किए जा रहे हैं। सम्पूर्ण विश्व में नवीनतम कृषि तकनीकी को किसानों तक प्रभावी ढ़ग से पहुंचाने की यह एकमात्र और अनूठी परियोजना है। केवीके आज पूरे देश में अपनी अलग ही पहचान कायम कर चुके हैं। देश के हर जिले में केवीके आज फ्रंटलाइन एक्सटेंशन के अग्रणी पुरोधा बनके उभरे हैं। इन केंद्रों द्वारा अनिवार्य लक्ष्य के इतर दर्जनों प्रमुख कार्यक्रमों के साथ कई सारी परियोजनाओं का संचालन किसान, ग्रामीण युवक-युवतियों, पशुपालकों, कृषि उद्यमियों आदि के लिए किया जा रहा है।


केवीके की द्वारा दी जा रही तकनीकी के प्रसार का ही प्रभाव है कि उन्नत तकनीकी आज गांव-किसानों तक पहुंच सकी है। किसान परंपरागत खेती-बाड़ी से निकलकर वैज्ञानिकता की ओर अग्रसर हो रहे हैं। बेराजगार किसान युवक-युवतियां आदि उद्यानिकी, डेयरी व्यवसाय, बकरी पालन, मुर्गी पालन, मशरूम उत्पादन, मधुमक्खी पालन से लेकर मछली पालन की ओर उन्मुख हुए हैं। किसानों में जैविक खेती की ओर भी रूझान देखा जा रहा है।

इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईएफपीआरआई) द्वारा जारी एक हॉलिया रिपोर्ट में बताया गया कि देश में केवीके के प्रयासों से 3568 रूपये प्रति हेक्टेयर की अतिरक्ति शुद्ध कृषि आय बढ़ी है। इन केंद्रों द्वारा दी जा रही तकनीकी को अपनाने से एक रूपये के निवेश से किसानों को इसका 8 गुना तक लाभ मिला है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि जिन क्षेत्रों के किसान 'केवीके के ज्ञान' से परिपूर्ण हैं, उन क्षेत्रों में खेती में गुणात्मक लाभ हुआ है। एक प्रशिक्षित किसान 30 अन्य साथी किसानों तक ज्ञान का प्रसार कर रहा है। यही कारण है कि केवीके द्वारा किसानों तक खेती की नई तकनीकी व वैज्ञानिक ज्ञान पहुंचाने से कृषि उत्पादकता को कई गुना तक बढ़ाने में मदद मिली है।

केवीके के काम और योजनाओं को अधिक प्रभावी ढ़ग से लागू करवाने में वर्तमान केंद्र सरकार का बहुत बड़ा योगदान रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा स्वंय केवीके के कार्यों को अधिक गतिशील बनाने में व्यक्तिगत तौर पर रूचि लेने के कारण आज ये केंद्र अनेकों कार्यों को संपादित कर रहे हैं। आईसीएआर के माध्यम से आज केवीके भारत सरकार के कृषि मंत्रालय की कार्ययोजनाओं की सूची में नंबर एक पर हैं। माननीय कृषि मंत्री भारत सरकार नरेंद्र सिंह तोमर समय-समय पर केवीके की समीक्षा करते हुये इन केंद्रों को और अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में सदैव तत्पर रहे हैं। यही कारण है कि आज जिला स्तर से लेकर राज्य और केंद्र स्तर तक हर कोई केवीके की ओर देख रहा है।


शुरूआत से अब तक के 46 वर्ष के दौरान कृषि विज्ञान केंद्र अपनी शैशवावस्था से किशोरावस्था और अब जवानी तक का सफर तय कर चुके हैं, लेकिन यह अंतिम पड़ाव नहीं हैं। किसी भी प्राणि की यौवनावस्था सबसे ज्यादा ऊर्जावान व क्षमता से परिपूर्ण जरूर होती है। लेकिन इसके बाद का सारा जीवन गुणवत्ता, अनुभव, सोच की दूरदृष्टि आदि सब मिलकर एक मील के पत्थर का कार्य करता है। केवीके अभी यौवनावस्था में हैं लेकिन ये तो अभी शुरूआत ही है पूरा जीवन बाकी है। इससे इतना तय है कि आने वाले समय में केवीके अपने नाम के अनुरूप साल दर साल वैज्ञानिकों-कर्मचारियों की मेहनत से गांव-किसानों के कल्याण के लिए कार्य करते हुये देश के कृषि तकनीकी विकास को और अधिक ऊचांइयों तक ले जायेंगे।

केवीके के द्वारा गांव-किसानों के कल्याण में दी जा कृषि तकनीकी को और अधिक प्रभावी बनाया सकता है। इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण सुझावों को अमल में लाने की नीतिगत जरूरत है। जिला प्रशासन द्वारा आये दिन तकनीकी के इतर अन्य कार्यों में केवीके के वैज्ञानिकों को काम दे दिया जाता है जिससे इनका मुख्य वैज्ञानिक कार्य प्रभावित होता है। स्थानीय प्रशासन के हस्तक्षेप को कम करने के साथ ही इन केंद्रों को कृषि और उससे जुड़े तकनीकी विषयों के अलावा अन्य अनावश्यक कार्यों से अलग रखने की जरूरत है। केवीके पर स्टॉप की भी कमी हैं, जिसे वर्ष 2015 में केवीके के राष्ट्रीय सम्मेलन पटना में की गई घोषणा के अनुरूप बढ़ाया जाना उचित रहेगा।


केवीके को कार्यों के लिए बजट आंवटन बढ़ाये जाने की भी दरकार है। केवीके को इसके सुखद भविष्य के लिए प्लान परियोजना से निकाल कर नॉन प्लान में करने की जरूरत है। ऐसा होने से यह देश के गरीब किसानों की सेवा और अधिक गतिशीलता के साथ कर पाने में सक्षम होंगे। देश के जो बड़े जिले हैं उन सभी में दो-दो केवीके खोले जाएं जिससे इन केंद्रों का लाभ जिले में ज्यादा से ज्यादा किसानों को मिल सके। केवीके में कार्यरत स्टॉफ को व्यक्तिगत स्तर पर एलटीसी, बच्चों की पढ़ाई के लिए भत्ता और गंभीर बीमारी की दशा में आर्थिक सहायता जैसी कुछ मूलभूत सुविधाएं भारत सरकार के कर्मचारियों के समान प्रदान की जाती हैं तो यह केंद्र और अधिक प्रभावी भुमिका में कार्य कर पाने में सक्षम होगें।

कृषि विज्ञान केंद्र की संरचना में 16 लोगों का स्टॉफ रहता है। जिसमें वरिष्ठ वैज्ञानिक और प्रमुख-एक, विषय वस्तु विशेषज्ञ-छह, कार्यक्रम सहायक-तीन (फार्म मैनेजर, कम्यूटर प्रोग्रामर व लैब टैक्नीशियन), कार्यालय सहायक-एक, स्टैनो कम टाइपिस्ट-एक, वाहन चालक-दो (जीप व ट्रैक्टर), परिचर-दो। केवीके स्थापना के लिए कम से कम 20 हेक्टेयर जमीन का होना आवश्यक होता है।

(डॉ सत्येंद्र पाल सिंह, कृषि विज्ञान केंद्र, शिवपुरी, मध्य प्रदेश के प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रमुख हैं, यह उनके निजी विचार हैं।)

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