चुनावी इतिहास में सपा की सबसे बड़ी हार

चुनावी इतिहास में सपा की सबसे बड़ी हारचुनाव परिणाम के रुझाने आने के बाद सपा कार्यालय में पसरा सन्नाटा।

लखनऊ। चार महीने पहले ही 4 नवंबर को अपनी स्थापना का 25 साल पूरा करने वाली समाजवादी पार्टी के लिए शनिवार का दिन अभी तक के चुनावी इतिहास में सबसे खराब दिनों में गिना जाएगा। ऐसा पहली बार है जब इस पार्टी को विधानसभा चुनाव में मात्र 58 सीटों पर सिमटना पड़ा है जबकि पांच साल पहले ही 2012 के चुनाव में इस पार्टी ने रिकार्ड 225 सीटें जीतकर प्रदेश में अकेले दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। इस बार अपनी हर एक रैली में अखिलेश यादव इस बात का दाव कर रहे थे कि कांग्रेस के साथ गठबंधन करके 300 से ज्यादा सीटें जीतेंगे लेकिन उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया। पार्टी दहाई का आंकडा़ पार नहीं कर पाई।

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विधानसभा चुनाव के ठीक पहले ही समाजवादी पार्टी में नेतृत्व और टिकट बंटवारे को लेकर मचे घमासान के बाद अखिलेश यादव ने सपा की स्थापना करने वाले अपने पिता मुलायम सिंह को हटाकर खुद राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। वहीं अपने चाचा शिवपाल यादव को प्रदेश अध्यक्ष से हटाकर सरकार के साथ ही संगठन पर अपनी पूरी पकड़ बनाई थी। इस बार का विधानसभा चुनाव ऐसा पहला चुनाव रहा जिसमें सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव पूरी तरह चुनाव से दूर रहे और उन्होंने मात्र तीन रैलियां की। विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव अकेले सपा के स्टार प्रचारक थे जिसमें उनकी पत्नी डिंपल यादव भी उनके साथ थी। लेकिन जनता का नब्ज पकड‍़ने में अखिलेश यादव पूरी तरह फेल रहे और कांग्रेस से गठबंधन कनके बाद भी उनकी पार्टी को बुरी हार का सामना करना पड़ा।

4 नवंबर, 1992 को लखनऊ के बेगम हजरतगंज पार्क में मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी की स्थापना की थी। पिछले 25 सालों के सफर में कई उतार-चढ़ाव के बाद कई बार सत्ता का सुख भोगी लेकिन इस बार की हार सपा के लिए किसी सदमे से कम नहीं है। समाजावादी पार्टी को उसकी स्थापना से लेकर अभी तक कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार आशु सक्सेना कहते हैं '' समाजवादी पार्टी का गठन करने के बाद मुलायम सिंह यादव ने अपनी पार्टी की ताकत पहले ही चुनाव में दिखा दिखा दी थी। उत्तर प्रदेश में हुए 1993 के विधानसभा चुनाव में पहली बार सपा चुनाव मैदान में उतरी और अच्छी सफलता प्राप्त की।''

आशू सक्सेन ने बताया कि उस चुनाव में सपा की गठबंधन सहयोगी बसपा को भी 67 सीटें मिली थी। दोनों पार्टियों ने मिलकर सरकार बनाई थी। 4 दिसंबर 1993 को मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश में दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। लेकिन 1 जून 1995 को गेस्ट हाउस कांड के बाद सपा-बसपा का गठबंधन टूट गया और मायावती पहली बार 3 जून 1995 को उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी थीं।

समाजवादी पार्टी के इतिहास और वर्तमान पर नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार मधुरेन्द्र दि्वेदी ने कहा '' साल 2002 के यूपी विधानसभा के चुनाव में समाजवादी पार्टी को प्रदेश में सबसे ज्यादा सीटें मिली। इस चुनाव में बीजेपी जहां 88 सीटों पर सिमट गई वहीं सपा को अपने दम पर 143 सीटें मिली। '' उन्होंने बताया कि सपा की ताकत बढ़ती रही लेकिन बीजेपी और बीएसपी ने गठबंधन करके सरकार बना ली। उनका साथ ज्यादा दिनों तक नहीं चला और मुलायम सिंह यादव तीसरी बार 29 जुलाई 2003 को राज्य के मुख्यमंत्री बने। उनकी सरकार साल 2007 तक चली। साल 2004 के लोकसभा चुनाव में सपा ने लोकदल के साथ गठबंधन के करे चुनाव में उतरी और सपा को अकेले 36 सीटों पर जीत मिली। जिससे केन्द्र में मुलायम सिंह की ताकत बढ़ी।

सपा के चुनावी इतिहास में पार्टी को बड़ा झटका साल 2007 के चुनाव में मिला जब बीएसपी ने अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई और सपा सैकड़ा का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई और 99 सीटों पर सिमट गई। इस हार से सपा में निराशा का भाव पैदा हो गया। लोगों को लगा कि अब सपा दोबारा प्रदेश अपनी राजनीतिक हैसियत नहीं बढ़ा पाएगी।

लोग मुलायम सिंह को चुका हुआ मानने लगे। लेकिन अगले ही चुनाव में सपा ने चमत्कार कर दिया। पार्टी के हताश और निराश कार्य कर्ताओं में जोश भरने के लिए साल 2012 के चुनाव से पहले अखिलेश यादव ने साइकिल लेकर जनता के बीच उतरे और साल 2012 के चुनाव में सपा को प्रदेश में सबसे बड़ी जीत मिली। और पार्टी ने अपने दम पर 225 रिकार्ड सीटें जीती। अखिलेश यादव राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने। लेकिन 4 साल बीतते ही इस पार्टी में विवाद बढ़ने लगा और अब जब पार्टी साल 2017 के चुनाव में समाजवादी पार्टी को बड़ी हार का सामना करना पड़ा।

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