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लॉकडाउन की आशंका से डरे रोजाना 100 से 250 कमाने वाले मिर्जापुर के नाविक

पिछले साल लगे लॉकडाउन से अभी तक लोग नहीं उबर पाए हैं और एक बार फिर बढ़ते कोरोना संक्रमण ने लोगों को डरा दिया है, इनमें गंगा नदी में नाव चलाने वाले माझी समुदाय के नाविक भी हैं, जिन्हें डर है कि कहीं फिर लॉकडाउन न लग जाए।

Brijendra DubeyBrijendra Dubey   13 April 2021 11:25 AM GMT

मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश)। दिहाड़ी मजदूरों के जहन में लॉकडाउन की कड़वी यादें आज भी ताजा हैं। यही वजह है कि एक बार फिर कोरोना के मामलों को बढ़ता देख कचहरी घाट से गड़गेड़ी घाट तक नाव चलाकर रोजाना 100 से 250 रुपए कमाने नाविकों को भी दोबारा लॉकडाउन लगने का डर सताने लगा है। हालांकि सोमवार 12 अप्रैल को प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि कोरोना संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए सरकार दोबारा लॉकडाउन नहीं लगाएगी।

दोपहर एक बजे का वक्त है। कड़ी धूप में गंगा के किनारे बने कचहरी घाट पर अचानक एक नाव गंगा के पानी को चीरते हुए किनारे पर आकर ठहरी। पसीने में लथपथ नाव पर मौजूद नाविक आकाश ने यात्रियों से पांच-पांच रुपए इकठ्ठा किए और सवारियों का इंतजार करने लगे। आकाश गड़गेड़ी गाँव चिल्ह थाना के रहने वाले हैं। आकाश ने गाँव कनेक्शन को बताया, "हम आज अपने भाई की जगह नाव चलाने आए हैं। वैसे हम मछली पकड़ते हैं।"

इसके बाद वह गड़गेड़ी घाट की तरफ निकल पड़े। कचहरी घाट से गडगेड़ी घाट की दूरी लगभग एक किलोमीटर है। गडगेड़ी घाट पर कई अन्य नाविक मिले, जिन्होंने पिछले साल मार्च में लगे लॉकडाउन का अनुभव साझा किया।

नाविकों को सता रहा है लॉकडाउन का डर

पिछले 25 साल से नाव चला रहे श्यामाचरण (53 वर्ष) हर साल जिला पंचायत से लाइसेंस बनवाते हैं, जिस पर बाढ़ के समय 15 और गर्मियों में 20-25 सवारियों को नदी पार कराने की अनुमति मिलती है। श्यामा चरण कहते हैं, "एक यात्री से निर्धारित किराया 5 रुपए है। दिन भर की मेहनत के बाद हम 200 रुपये से 400 रुपए तक कमा लेते हैं। जब गंगा में बाढ़ आती है तो नाव चलना भी बंद हो जाती है। हमारे तीन बेटियां और एक बेटा है। किसी तरह परिवार का खर्च चला रहे हैं। इसके अलावा जीविका का कोई साधन नहीं है। दोबारा लॉकडाउन लगा तो फिर मुश्किल हो जाएगी।"

श्याम नारायण माझी

नाविक श्याम नारायण आगे बताते हैं, "पिछली बार जब लॉकडाउन लगा था, उस समय सब कुछ बंद था। इस वजह से 4 महीने हम लोगों ने बहुत परेशानी के साथ जीवन काटा। तब कचहरी घाट को सील कर दिया गया था। ऐसे में हम लोगों ने जो पूंजी किसी और काम के लिए इकट्ठा की थी उसी को धीरे-धीरे खर्च करना शुरू किया। वो भी धीरे धीरे खत्म हो गई। सरकार की तरफ से राशन मिलता था, फिर भी हम लोगों ने बहुत समस्या झेली। कोरोना का प्रकोप एक बार फिर बढ़ रहा है, जिसको लेकर मन में डर बना है, फिर से लॉकडाउन लगा तो क्या होगा।"

गडगेड़ी गाँव के रहने वाले नाविक रामपाल (50) का दर्द इनसे थोड़ा अलग है, वो इसलिए कि ये किराए की नाव चलाते हैं। गाँव कनेक्शन से बातचीत में उन्होंने बताया, "मैं भी नाविक हूं, लेकिन मेरे पास अपनी नाव नहीं है। मैं दूसरे की नाव चलाता हूं। किराए पर आधे-आधे का बंटवारा करते हैं। किसी दिन अगर हम 200 रुपए कमाते हैं, तो उसमें से 100 रुपए अपने मालिक को देते हैं और 100 रुपए में अपना गुजारा करते है। घर परिवार में कुछ छह लोग हैं, जिसमें और लोग भी कमाने वाले हैं तो किसी तरह गुजारा हो जाता है। लॉकडाउन की वजह से तकलीफ हुई थी, फिर कोरोना फैल रहा है। देखिए क्या होता है। "

रामख्याल (35 वर्ष) गडगेड़ी गाँव के रहने वाले है। उन्होंने बताया कि वह भी नाविक हैं। घाट पर कुल नौ नाव चलती हैं। तीन-तीन घंटे पर सबका नंबर लगता है। घर चल जाए बस इतना कमा लेते हैं, लेकिन जब लॉकडाउन लगा तो हम लोगों को सात महीने तक बहुत परेशानी झेलनी पड़ी, जो पूंजी रखे थे उसको खत्म कर दिया। फिर लोगों से कर्ज लेकर भी खर्च चलाया। सरकार की तरफ से जो राशन मिलता था उसी के सहारे अपना गुजारा किया, लेकिन कर्ज हो गया है। फिर लॉकडाउन नहीं लगना चाहिए।


पैंतालीस वर्षीय राजू दलापट्टी गांव के रहने वाले है और ये भी पेशे से नाविक हैं। वह बताते हैं, "पांच रुपए एक तरफ का किराया है। हमने 2 लाख रुपए कर्ज लेकर नाव बनवाई है। 200 से 300 रुपए तक कमा लेते हैं। लॉकडाउन की शुरूआत में नाव का संचालन बंद था, लेकिन दूसरे महीने से हम लोग चोरी चोरी एक दो सवारियों को रिजर्व करके ले आते थे। एक बार फिर कोरोना बढ़ने से जिले में रात 9 बजे से सुबह 6 बजे तक कर्फ्यू लगता है। हम लोगों को डर लग रहा है कि फिर से लॉकडाउन न लग जाए। ऐसा होने पर फिर से परिवार को पालने की समस्या खड़ी हो जाएगी। "

पिछले 15 साल से खुद की नाव चला रहे जितेंद्र माझी (40 वर्ष) दलापट्टी गाँव के रहने वाले हैं, पेशे से नाविक हैं और उनके परिवार में दो बेटे, एक बेटी है। बेटी 12वीं कक्षा में पढ़ती। एक बेटा नौवीं और एक दसवीं में पढ़ता है। जितेंद्र बताते हैं, "बच्चों की पढ़ाई में ज्यादा खर्च हो रहा है। पिछली बार जब लॉकडाउन लगा था, उस समय 3 महीने नाव का संचालन पूरी तरीके से बंद था। पुलिस का सख्त पहरा था। सरकार की तरफ से राशन मिलता था। सब्जी की व्यवस्था करते थे। उसी से अपना खर्च चलाते थे, लेकिन फिर से जिले में रात को कर्फ्यू की घोषणा कर दी गई है। आने वाले समय में डर लग रहा कि सरकार फिर से लॉकडाउन ना लगा दे, नहीं तो बड़ी समस्या खड़ी हो जाएगी। हम लोगों के पास जमीन भी नहीं है, हम भूमिहीन हैं।"

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