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ऑर्डर की कमी से कारखानों पर लटके ताले, कारखानों के मालिक कारीगरों के साथ मिलकर खुद बना रहे तबला

पिछले साल मिर्जापुर के इस मोहल्ले में लगभग 16 कारखानों में तबला बनाने का काम होता था, अब मुश्किल से दस कारखानों में काम हो रहा है, क्योंकि अब ऑर्डर ही नहीं आ रहे हैं।

Brijendra DubeyBrijendra Dubey   6 April 2021 2:11 PM GMT

मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश)। जिस कारखाने में दस मजदूर तबला बनाने का काम करते थे, वहीं पर आज कारखाने के मालिक खुद तबला बना रहे हैं, पिछले एक साल में यहां के परिवारों के लिए घर चलाना भी मुश्किल हो रहा है।

मिर्जापुर के रमई पट्टी मोहल्ले की गौरियान गली में कई परिवारों में पिछले कई वर्षों से तबला बनाने का काम हो रहा है, पिछले साल लॉकडाउन के पहले तक गौरियान गली में सब कुछ ठीक चल रहा था। यहां से विदेशों तक तबला, ढोलक, ताशा भेजा जाता था, लेकिन अब इसकी मांग बिल्कुल कम हो गई है। यहां पर कुछ खास लकड़ियों जैसे नीम, आम, शीशम और बकरे की खाल, ऊंट के खाल से हाथों की कारीगरी से तबला या फिर ढोलक तैयार करते हैं। लेकिन इस गली में कुछ तबले बनाने के कारखानों में ताले लग गए है। कुछ घरों में अभी भी तबले, ढोलक, डफली का काम चल रहा है।

गौरियान गली जहां पर पहले लगभग 16 कारखानों में तबला और ढोलक बनाने का काम होता था, अब मुश्किल से दस कारखाने ही चल रहे हैं।

एक समय था जहां पर कारीगरों का हुजूम म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट बनाने का काम करते देखे जाते थे। लॉकडाउन के एक साल बाद अब उन्हीं कारखानों के मालिक खुद कारीगर बनकर तबला बनाते दिखाई देते हैं। आरिफ अली भी उन्हीं में से एक हैं, आरिफ गाँव कनेक्शन से कहते हैं, "बस जिंदगी किसी तरह काट रहे हैं, पिछले आठ वर्षों से तबला, ढोलक, ताल, ताशा बनाने का काम कर रहे हैं, केवल नया ही नहीं हम लोग पुराने म्यूजिकल इंस्ट्रमेंट की भी मरम्मत करते हैं, जितने भी म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट होते हैं। उनको हम अपने हाथो से नया बनाते हैं। कोरोना महामारी से पहले विदेशों से ऑर्डर मिलते थे, उन्हीं के डिमांड पर हम लोग तबला, ढोलक, ताशा, ताल बनाते थे, बनाने के बाद विमान व पानी के जहाज के माध्यम से विदेश भेजते थे, अब तो ऑर्डर ही नहीं आ रहे हैं।"

कारीगरों की माने तो कच्चे माल की कीमत भी बहुत बढ़ गई है, अब थोड़ा बहुत महाराष्ट्र और दिल्ली में मांग की जा रही है तो उसी के सहारे काम चल रहा है। आरिफ बताते हैं, "लॉकडाउन से पहले अमेरिका, कनाडा, इंडोनेशिया माल तैयार करके भेजते थे, जहा पर हमें एक तबले पर भारत में 600 रुपए मिलते थे, लेकिन जब हम विदेशो में भेजते है तो हमें उसी एक तबले का दाम 2500 रुपए मिल जाता था।"


पहले आरिफ के यहां दस कारीगर (मजदूर) काम करते थे लेकिन इस वक़्त खुद आरिफ के साथ एक मजदूर काम कर रहा है। आरिफ बताते हैं, "लॉकडाउन के वक्त कारीगर के मजदूरी में कटौती किए थे, जहां तबले का हेड तैयार करने में कुल कारीगर की मजदूरी 60 रुपए होती थी, वहीं हम उस वक़्त 40 रुपए कर दिए थे। लेकिन उस वक़्त विदेशों से डिमांड (मांग) थी, तब कारीगर एक दिन में 10 हेड आराम से तैयार कर लेता था, लेकिन अब लॉकडाउन खत्म हो गया है लेकिन अभी देशों से डिमांड मांग नहीं है दिल्ली और महाराष्ट्र से ऑर्डर मिलने पर हफ्तों में एक कारीगर के साथ खुद लग कर काम पूरा कर लेते हैं।"

इसी गली में मस्जिद के थोड़ा आगे बढ़ने पर तबले की धुन का परीक्षण करते सद्दाम अंसारी (34 वर्ष) दिखे, पूछने पर बताते हैं कि एक तबला 800 रुपए के लागत में तैयार हो जाता है, वह भारत के बाजार में 1200 रुपए में बेचा जाता है।"

मांग न होने से बहुत से तबले और ढोलक अभी भी अधूरे रखे हुए हैं।

सद्दाम आगे बताते हैं कि उनका माल तैयार होकर यूरोप के कुछ देशों समेत दिल्ली, मुंबई, गोवा, आंधप्रदेश, कलकत्ता के बाजारों में जाता है, विदेशों में एक तबले कीमत 2500 रुपए मिलता है, लेकिन पिछले एक साल में वह मालिक से कारीगर बन गए।

सद्दाम अंसारी की दिल्ली में म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट का दुकान थी, जो लॉकडाउन में बन्द हो गया। जिसके बाद दिल्ली छोड़ कर वापस मिर्जापुर लौटना पड़ा, उन्होंने दुखी होकर बताया, "मालिक से कारीगर मजदूर बन गए। लाकडॉउन की वजह से केवल बाजार में 25 प्रतिशत काम चल रहा है, बाकी सब खत्म हो गया। अभी काम तो चल रहा है, लेकिन ऑर्डर की कमी है, और सबसे बड़ी बात तो लागत बहुत बढ़ गई है। तबले की मांग कम हो गई है जिस कारण व्यापारी हमें ऑर्डर ही नहीं दे रहे। जिसकी वजह से हम खुद एक पढ़ने वाले कारीगर के साथ काम करते हैं।"

तबला बनाते सद्दाम

कुछ देर चुप रहने के बाद सद्दाम अंसारी बताते है, "हमारे यहां चार कारीगर (मजदूर) काम करते थे, लेकिन पर्याप्त काम न होने की वजह से कोई कारीगर सब्जी का ठेला लगाता है, तो कोई और कुछ काम करता है। इसलिए हमें दिल्ली की दुकान बन्द करके घर आना पड़ा, मेरे यहां आने से कम से कम एक लोगों का काम तो चल रहा है।"

सद्दाम अंसारी के कारखाने पर अली खान अंसारी (20 वर्ष) भी काम करते हैं, वह इस बार दसवीं कक्षा में हैं और हर दिन सुबह आठ बजे से दोपहर एक बजे तक स्कूल पढ़ाई के बाद सीधे यहीं आ जाते हैं, लेकिन पहले की तरह अब काम ही नहीं रहा तो अब उनको भी उतना फायदा नहीं हो पाता।


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