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धार्मिक नेताओं के जरिए उन्नाव में लोगों को टीकाकरण के लिए किया जा रहा है जागरूक

उन्नाव, यूपी में सरकारी स्वास्थ्य अधिकारी, ग्रामीण समुदायों को कोविड-19 के खिलाफ टीकाकरण के लिए आगे आ रहे हैं। धार्मिक नेताओं को शामिल करके, जिला प्रशासन टीके के बारे में आशंकाओं और भ्रांतियों को दूर कर रहा है और यह प्रयास रंग भी ला रहा है।

Aishwarya TripathiAishwarya Tripathi   1 Sep 2021 5:48 AM GMT

धार्मिक नेताओं के जरिए उन्नाव में लोगों को टीकाकरण के लिए किया जा रहा है जागरूक

नौभर के जागरूकता प्रयासों से पीखी में महिलाओं का टीकाकरण किया जा रहा है। स्रोत: एमडी दिलशाद, यूनिसेफ जिला मोबिलाइजेशन ऑफिसर

उन्नाव जिले के पीखी गांव में रहने वाली 22 वर्षीय नौभर बानो लाइन में सबसे पहले खड़ी थीं, जब स्वास्थ्य कार्यकर्ता ने कोविड-19 टीकाकरण के लिए वैक्सीन की शीशी खोली। हालांकि 60 वर्ष से ज्यादा आयु वर्ग के लोगों और 45 वर्ष से ज्यादा के लिए टीकाकरण 1 मार्च से शुरू हो गया था, लेकिन उन्नाव के कई गांवों में वैक्सीन को लेकर भ्रांतियों के चलते टीकाकरण की रफ्तार काफी धीमी थी।

वैक्सीन को लेकर अफवाहों और आशंकाओं के बीच बानो ने लोगों को जागरूक करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने राज्य की राजधानी लखनऊ से 60 किलोमीटर दूर स्थित अपने गांव के लोगों को जागरूक करते हुए यह भरोसा दिलाया कि वैक्सीन पूरी तरह से सुरक्षित है। बानो की बदौलत सफीपुर तहसील के पीखी में टीकाकरण के लिए पात्र कुल 450 लोगों में से 225 लोगों को टीका लगाया गया।

मोहम्मद दिलशाद यूनिसेफ द्वारा नियुक्त डिस्ट्रिक्ट मोबिलाइज़ेशन कोऑर्डिनेटर हैं। उनका काम ग्रामीण इलाकों में लोगों को टीकाकरण के लिए प्रोत्साहित करना है। उन्होंने ही बानो को इस काम के लिए प्रेरित किया।

पीखी, सफीपुर की एक स्थानीय महिला नौभर बानो ने टीकाकरण के लिए 225 लोगों को जागरूक और समझाने में मदद की। स्रोत: एमडी दिलशाद, यूनिसेफ जिला मोबिलाइजेशन ऑफिसर

लोगों को टीकाकरण के लिए वैक्सीनेशन सेंटर तक लाने में बानों जैसे लोगों की भूमिका काफी अहम है। जिला प्रशासन द्वारा सूचना, शिक्षा और संचार (IEC) की रणनीति के तहत अलग-अलग चैनलों के माध्यम से टारगेट आडियंस तक जानकारी पहुंचाई जाती है, ताकि जागरूकता के ज़रिए ज्यादा से ज्यादा लोगों का टीकाकरण किया जा सके। जिला प्रशासन के इस काम में यूनिसेफ समेत कुछ अन्य गैर-लाभकारी संस्थाएं सहयोग कर रही हैं।

दिलशाद जैसे मोबिलाइजेशन कोऑर्डिनेटर मस्जिदों, मंदिरों और अन्य धार्मिक संस्थानों के साथ-साथ ऐसे लोगों की पहचान करते हैं, जिनके ज़रिए समुदायों के ज्यादा से ज्यादा लोगों को टीकाकरण शिविरों के बारे में जानकारी दी जा सके और उन्हें इसके लिए प्रेरित किया जा सके।

महामारी से निपटने में सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक ग्रामीण भारत में वैक्सीन को लेकर तरह-तरह की अफवाहों का होना है। कोविड-19 के बारे में जागरूकता और पर्याप्त जानकारी की कमी के कारण ग्रामीण समुदायों में यह डर था कि यह वैक्सीन मृत्यु या नपुंसकता का कारण भी बन सकती है।

IEC रणनीति के तहत ग्रामीण समुदायों तक सूचनाओं के प्रसार के लिए संचार के ऐसे तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है, जो उनके लिए उपयुक्त हो। इसके तहत कठपुतली शो और नुक्कड़ नाटक [स्ट्रीट थिएटर] जैसे संचार के पारंपरिक तरीके शामिल हैं। लेकिन इस बार कोविड-19 महामारी के चलते फिजिकल डिस्टेंसिंग प्रोटोकॉल की बाध्यता थी, जिसकी वजह से इन पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल नहीं किया जा सका।

उन्नाव में 10 ब्लॉक स्तर के स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारियों को प्रशिक्षित करने वाले लाल बहादुर यादव ने गांव कनेक्शन को बताया, "बचपन में दादी-नानी से सुनी कहानियां हमेशा याद रहती हैं।" उनके अनुसार, जागरूकता के लिए स्थानीय भाषा में कठपुतली तमाशा (कठपुतली शो) जैसी गतिविधियां जितनी कारगर हैं, उतनी पैम्फलेट जैसे आधुनिक तरीके नहीं है।

लाल बहादुर यादव ने आगे कहा, "ग्रामीणों की समझ के हिसाब से उन तक जानकारी पहुंचाना हमेशा प्रभावशाली होता है, इसमें भाषा को लेकर समस्या नहीं होती और दो-तरफा संचार स्थापित होता है।"

जिला स्वास्थ्य शिक्षा सूचना अधिकारी लाल बहादुर यादव (बाएं) व अपर सीएमओ अशोक कुमार रावत (दाएं) सीएमओ कार्यालय उन्नाव में बैठे हैं. फोटो: ऐश्वर्या त्रिपाठी

धार्मिक नेताओं की वजह से टीकाकरण में हुई 15-20 फीसदी की बढ़ोतरी

दिलशाद के अनुसार, उन्नाव में टीकाकरण जागरूकता अभियान में अलग-अलग कस्बों के लगभग 1,400 धार्मिक नेताओं ने हिस्सा लिया। इसकी वजह से टीकाकरण में लगभग 15-20 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। उनवा, सफीपुर में, धार्मिक नेताओं के आह्वान ने एक बड़ी मुस्लिम आबादी को टीकाकरण के लिए प्रेरित किया। जिला मजिस्ट्रेट, ग्राम प्रधानों, आशा बहुओं, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और स्थानीय शिक्षकों से बनी एक निगरानी समिति इन गांवों में टीकाकरण की स्थिति को ट्रैक करने के लिए बैठकें करती हैं।

सिकंदरपुर, उन्नाव के एक चिकित्सा अधिकारी विजय कुमार राजौरा याद करते हुए बताते हैं कि कैसे सात साल पहले जिले के ताकिया पाटन गांव में नट समुदाय के लोगों को पोलियो का टीका लगाना एक बड़ी चुनौती साबित हुई थी। तब राजौरा ने पोलियो वैक्सीन अभियान की शुरुआत करने के लिए एक कसाई से बात की, जिनकी नियमित तौर पर समुदाय के लोगों से बातचीत होती रहती थी। ऐसा इसलिए किया गया ताकि उनके ज़रिए उनके ग्राहकों को पोलियो वैक्सीन के लिए प्रेरित किया जा सके।

उन्नाव के सिकंदरपुर में एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) के चिकित्सा अधिकारी विकास यादव ने गांव कनेक्शन को बताया, "यह [वैक्सीन को लेकर भ्रांतियां] कोई नई बात नहीं है। मैंने इस तरह की भ्रांतियां अन्य नए टीकाकरण अभियान की शुरुआत के दौरान भी देखी है।" चिकित्सा अधिकारी ने कोविड-19 वैक्सीन अभियान को लेकर किसी तरह की शिकायत नहीं की, क्योंकि उस दिन पहले ही 1200 लोगों को टीका लगाया जा चुका था और यह अभियान सुचारू रूप से चल रहा था।

विकास यादव ने गांव कनेक्शन को बताया, "18 साल और उससे अधिक उम्र के स्लॉट खुलने के बाद टीकाकरण अभियान में तेजी आई है।" हालांकि उन्होंने यह स्वीकार किया कि अभी भी लोगों में इसे लेकर भ्रांतियां हैं। चिकित्सा अधिकारी ने आगे बताया, "सबसे पहले ऐसे वरिष्ठ लोगों की पहचान की जानी चाहिए जिन पर समाज के लोग भरोसा करते हैं और उनकी बात सुनते हैं। इस तरह उनके ज़रिए लोगों में जागरूकता बढ़ती है। ये वरिष्ठ लोग ग्राम प्रधान, मौलवी या पंडित हो सकते हैं।"

टीकाकरण बुलावा पर्ची

सिकंदरपुर पीएचसी में स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी उपेंद्र सिंह चौहान के अनुसार, नई रणनीतियां विकसित की जा रही हैं। उन्होंने एक प्रयोग के बारे में बताया जिसे अभी लांच किया जाना है, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को आगे आने और टीकाकरण के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।

बुलावा परची : प्रशासन द्वारा घर-घर जाकर वैक्सीन सकारात्मकता लाने के लिए अभियान चलाया जा रहा है। फोटो: ऐश्वर्या त्रिपाठी

चौहान ने गांव कनेक्शन को बताया, "लोगों को टीकाकरण के लिए आने को अनुरोध करने के लिए बुलावा पर्ची या एक निमंत्रण पर्ची जारी की जाएगी।" उन्होंने कहा कि यह अभियान गांवों में कारगर साबित हो सकती है। पर्ची, टीकाकरण शिविर की तिथि और स्थान की जानकारी के साथ प्रत्येक परिवार के मुखिया को सौंप दी जाएगी।

उन्होंने आगे कहा, "कई लोगों को शिविरों के स्थान और तारीख के बारे में पता नहीं होता है। पर्ची में इसकी पूरी जानकारी दी जाएगी। यह पर्ची परिवार के मुखिया के नाम पर होगी, ताकि वह घर के अन्य सदस्यों को इसके लिए प्रेरित करे।" चौहान ने कहा, "लेकिन, ग्रामीणों को इसके आम साइड इफेक्ट्स के बारे में जानकारी देना जरूरी है। ऐसा करने पर वे घबराते नहीं हैं और इससे निपटने के लिए तैयार रहते हैं।

कोरारी कला निवासी। फोटो: ऐश्वर्या त्रिपाठी

कोरारी कलां गांव में आशा कार्यकर्ता किरण कुशवाहा ने बुलावा पर्चियों को भर दिया है। उसने महसूस किया कि शायद उसे उन्हें घर-घर जाकर लोगों को नहीं देना पड़ेगा, क्योंकि लोग पहले से ही टीकाकरण के लिए उत्सुक थे।

सरकारी योजनाओं से वंचित रह जाने का डर

सिकंदरपुर में पूरे दो महीने की झिझक के बाद जून महीने में 50 वर्षीय गीता गुप्ता को टीका लगवाने के लिए राजी किया जा सका। उन्होंने बताया कि उनके अन्य साथी ग्रामीणों, जिन्होंने टीकाकरण करवा लिया है, ने उन्हें इसके लिए राजी किया। उन्हें देखकर उनके घर के अन्य सदस्यों ने भी टीकाकरण करवाने का फैसला किया। सिकंदरपुर की एक आशा कार्यकर्ता, नीलम गुप्ता ने गांव कनेक्शन से कहा, "सब एक दूसरे को देख कर लगवा लेंगे धीरे-धीरे।"

नीलम (नीली साड़ी पहने) अपनी पड़ोसी गीता गुप्ता (गुलाबी साड़ी पहने हुए) से बात करते हुए, जिन्हें हाल ही में टीका लगाया गया है। फोटो: ऐश्वर्या त्रिपाठी

कई ग्रामीण टीकाकरण इसलिए करवा रहे हैं क्योंकि उन्हें डर है कि अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया तो वे सरकारी योजनाओं और सेवाओं से वंचित रह जाएंगे।

कोरारी कलां के 24 वर्षीय मो. करीम ने वैक्सीन इसलिए लगवाया ताकि वह मुंबई में अपनी सिलाई (दर्जी) की नौकरी फिर से शुरू कर सके। सिकंदरपुर में, लोक निर्माण विभाग के 66 वर्षीय सेवानिवृत्त मिस्त्री (तकनीशियन) मोहम्मद एहसान ने टीकाकरण इसलिए करवाया क्योंकि उन्होंने सुना कि अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया तो उनकी पेंशन रोकी जा सकती है। इसी तरह, उनके पड़ोसी अब्दुल लतीफ ने सुना था कि अगर टीकाकरण नहीं कराया गया तो कोटेदार उन्हें पीडीएस (सार्वजनिक वितरण प्रणाली) के तहत मासिक राशन देने से मना कर देगा।

मोहम्मद एहसान (बाएं) और अब्दुल लतीफ अपने पोर्च पर बैठे हैं और बिना टीकाकरण के अपने डर पर चर्चा कर रहे हैं। फोटो: ऐश्वर्या त्रिपाठी

हालांकि, जिले के अधिकारियों का कहना है कि गांवों में चल रही इन अफवाहों में कोई सच्चाई नहीं है।

अतीत से सबक लेना है जरूरी

फरवरी 2018 में, उत्तर प्रदेश सरकार ने एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (AES) और जापानी एन्सेफलाइटिस (JE) पर जागरूकता बढ़ाने के लिए दस्तक नामक एक विशाल डोर टू डोर अभियान शुरू किया था। इस अभियान का नारा था - "दरवाजा खटखटाओ, AES और JE को भगाओ।" यह अभियान भी IEC रणनीति पर आधारित था।

दस्तक अभियान बेहद प्रभावी था। एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, AES मृत्यु दर 2005 में 24.76 प्रतिशत से गिरकर 2021 में 8 प्रतिशत हो गई।

सिकंदरपुर पीएचसी के बाहर, सफेद दीवारों पर लाल रंग में लिम्फेटिक फाइलेरिया से लड़ने के नारे अभी भी लिखे हुए हैं - "आशा दीदी की माने बात, दवा से ही फाइलेरिया को मात।"

Covid19 किट में पैरासिटामोल, विटामिन और खनिज की गोलियां होती हैं और सिकंदरपुर में ग्रामीणों को बांटी गईं। फोटो: ऐश्वर्या त्रिपाठी

कोरारी कलां में, आशा बहू कुशवाहा ने फाइलेरिया और जापानी इंसेफेलाइटिस को लेकर जागरूकता के लिए नारे लिखे थे। उसने गांव की गलियों में दीवारों पर लिखे कुछ नारों की ओर इशारा किया। एक मंदिर की दीवार पर उसने लिखा था - उन्नाव ने ठाना है, फाइलेरिया भगाना है। इसी तरह दूसरे पर उसने लिखा था - चूहा और छछूंदर, जाने ना दो घर के अंदर।

कुशवाहा का मानना है कि नारा लिखने से लोगों में जागरूकता बढ़ती है। उन्होंने कहा, "लोगों के रवैये में बदलाव [फाइलेरिया और एन्सेफलाइटिस के प्रति] सरकारी जागरूकता प्रयासों की वजह से हुआ है।"

फाइलेरिया जागरूकता अभियान सिकंदरपुर के तहत शौचालय की दीवारों पर लिखा स्लोगन। फोटो: ऐश्वर्या त्रिपाठी

वैक्सीन की कमी भी है बड़ी चुनौती

ग्रामीण उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य कर्मियों के सामने दूसरी चुनौती वैक्सीन की कमी है। जिला टीकाकरण अधिकारी नरेंद्र सिंह ने गांव कनेक्शन को बताया, "उन्नाव जिला अस्पताल एक दिन में तीस हजार लोगों को टीका लगाने में सक्षम है, लेकिन केवल पांच हजार लोगों के लिए ही टीके उपलब्ध हैं।" उन्हें डर है कि इससे टीके के लिए आने वाले लोगों की संख्या प्रभावित हो सकती है।

जिला टीकाकरण अधिकारी के अनुसार मई में प्रतिदिन लगभग 8,000 टीके लगाए गए, लेकिन टीकों की अनुपलब्धता के कारण संख्या कम हो गई। वर्तमान में, टीकाकरण के लिए आने वाले हजारों लोगों को हर दिन वापस भेजा जा रहा है। सिंह ने कहा कि इससे लोगों की टीकाकरण की इच्छा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

ऐश्वर्या त्रिपाठी उत्तर प्रदेश के उन्नाव में स्थित एक स्वतंत्र पत्रकार हैं। यह स्टोरी नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया फेलोशिप फॉर इंडिपेंडेंट जर्नलिस्ट्स के तहत रिपोर्ट की गई हैं।

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अनुवाद: सुरभि शुक्ला

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