संगनारा के जंगलों को पवनचक्की परियोजना से बचाने के लिए कच्छ के ग्रामीणों का प्रदर्शन

ग्रामीणों की शिकायत है कि गुजरात के कच्छ जिले में एक उष्णकटिबंधीय कांटेदार वन (ट्रॉपिकल थार्न फॉरेस्ट) के सैकड़ों पेड़ों को काटकर पवन चक्कियों के निर्माण की योजना बनायी जा रही है। पिछले दो महीनों से पवन ऊर्जा परियोजना के लिए उपकरणों के प्रवेश पर रोक को लेकर ग्रामीण सचेत हो गए हैं। 6 अगस्त को उन्होंने अपने जंगलों को बचाने के लिए विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है।

Shivani GuptaShivani Gupta   9 Aug 2021 1:21 PM GMT

संगनारा के जंगलों को पवनचक्की परियोजना से बचाने के लिए कच्छ के ग्रामीणों का प्रदर्शन

पवन चक्कियों के निर्माण के विरोध में 1,000 के करीब ग्रामीण एकत्र हुए। सभी फोटो: अरेंजमेंट

अपने परंपरागत पहनावे चमकीले और रंग बिरंगी चनिया-चोली में गुजरात के कच्छ जिले के गाँवों की महिलाएं 6 अगस्त को संगनारा जंगल की ओर जाने वाली सड़क पर इकट्ठा हुईं। महिलाओं ने हाथों में "जंगल बचाओ" लिखी तख्तियां पकड़ी हुई थीं। उनका यह मार्च मार्च अपने जंगल और चरागाह पर पवन चक्की के निर्माण को रोकने के लिए था।

गुजरात के रेगिस्तानी जिले में पवन चक्कियों के निर्माण के लिए सैकड़ों पेड़ों के कटने की आशंका है, जिसके विरोध में 1,000 के करीब ग्रामीण एकत्र हुए हैं।

संगनारा गांव की 30 वर्षीय शिल्पा लिम्बानी ने गांव कनेक्शन को बताया, "पवन चक्की हरित क्षेत्र में बनाई जा रही है। ये हमारी अच्छी मीठी (उपजाऊ और हरी-भरी) जमीन है।" शिल्पा लिम्बानी 6 अगस्त को आयोजित विरोध प्रदर्शन का हिस्सा थीं। उन्होंने आगे कहा, "हम अपनी गायों और ऊंटों को जंगल में चरने के लिए ले जाते हैं। अगर यह पवनचक्की यहां बनी तो हम जंगल खो देंगे।

लिम्बानी आगे कहती हैं, "ये पवन चक्कियां बंजर भूमि में स्थापित की जानी चाहिए लेकिन यह गौचर जमीन (चराई भूमि) में स्थापित की जा रही हैं। कई बंजार भूखंड हैं जहां पवन चक्की स्थापित की जा सकती है।"

ग्रामीणों का कहना है कि वे अपने जंगल या चरागाह भूमि की कीमत पर ऐसी परियोजनाएं नहीं चाहते हैं।

संगनारा के जंगल कच्छ में 500 वर्ग किलोमीटर तक कांटेदार जंगल के रूप में फैले हुए हैं। यह लुप्तप्राय वनस्पतियों और जीवों की विशाल विविधता का घर है। इसमें चिंकारा, भेड़िया, रैटल, लकड़बग्घा, रेगिस्तानी बिल्ली, भारतीय लोमड़ी, कांटेदार पूंछ वाली छिपकली, रेगिस्तान की मॉनिटर, वाइट-नेप्ड टिट, गिद्ध और कई अन्य प्रजातियां शामिल हैं। ऐसा माना जाता है कि स्थानीय समुदायों ने पिछले 500 वर्षों से इस जंगल का रखरखाव और संरक्षण किया है।

हालांकि पिछले छह वर्षों में ग्रीन पावर के उत्पादन के लिए क्षेत्र में कई पवन चक्कियां बनाई गई हैं। ग्रामीण इन पवन चक्कियों या नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के खिलाफ नहीं हैं लेकिन उनका कहना है कि वो अपने जंगल या अपनी चराई भूमि की कीमत पर ऐसी परियोजनाएं नहीं चाहते हैं।

महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली एक गैर-लाभकारी संस्था कच्छ महिला विकास संगठन की सचिव अरुणा ने गांव कनेक्शन को बताया, "यहां के ग्रामीण समझते हैं कि इन पेड़ों को बचाना कितना महत्वपूर्ण है। वो प्रकाश (बिजली) चाहते हैं लेकिन पेड़ों की कीमत पर नहीं। " अरुणा ने भी कल विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया था। "अधिकांश महिलाएं 6 अगस्त को हुए विरोध प्रदर्शन का हिस्सा थीं। आम तौर पर उनकी आवाज नहीं सुनी जाती है, लेकिन आज वो अपने जंगल और अपनी गौचर जमीन को बचाने के लिए अपने घरों से बाहर निकलीं। "

अधिकांश प्रदर्शनकारी किसान, मालधारी (आदिवासी चरवाहे) और दिहाड़ी मजदूर थे। इनका साथ देने के लिए सहजीवन ट्रस्ट, बाली विकास ट्रस्ट, मालधारी संगठन, सरपंच संगठन, कच्छ महिला विकास संगठन और लेट इंडिया ब्रीद जैसे कई गैर-लाभकारी संगठनों से जुड़े थे।

प्रदर्शन में अधिकांश महिलाएं शामिल थीं।

कितना ग्रीन है 'ग्रीन' पावर

राष्ट्रीय पवन ऊर्जा संस्थान (एनआईडब्ल्यूई) के अनुसार भारत में 100 मीटर हब ऊंचाई पर कुल पवन ऊर्जा क्षमता 302 गीगावाट (जीडब्ल्यू) है। इसमें से 95 प्रतिशत से अधिक व्यावसायिक रूप से दोहन योग्य संसाधन सात राज्यों- आंध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और तमिलनाडु में स्थित हैं।

गुजरात की कुल पवन ऊर्जा उत्पादन क्षमता 7,542 मेगावाट है, जो तमिलनाडु (9,304 मेगावाट) के बाद भारत में दूसरी सबसे बड़ी स्थापित क्षमता है।

पहली पवन ऊर्जा टरबाइन लगभग पांच-छह साल पहले 2015-2016 में संगनारा में लगाई गई थी। तब से इस क्षेत्र में कई पवन चक्कियां बन चुकी हैं। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि इन पवन चक्कियों ने मशीनरी, पंखे और ट्रांसमिशन केबल तक पहुंच बनाने के लिए सैकड़ों पेड़ों, समतल पहाड़ियों को नष्ट कर दिया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पंखे और मशीनरी के लगातार शोर के कारण पक्षी और वन्यजीव वीरान हो गए हैं।

2019 में मुंबई स्थित बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी और कोयंबटूर स्थित सलीम अली सेंटर फॉर ऑर्निथोलॉजी एंड नेचुरल हिस्ट्री द्वारा 'कच्छ, गुजरात में दो पवन फार्मों से एवियन मृत्यु दर और दावनगेरे, कर्नाटक, भारत' शीर्षक से एक अध्ययन में पता चला है कि पवन टरबाइन आसपास के पक्षियों के जीवन के लिए खतरा पैदा कर रही थी। टर्बाइन ब्लेड से टकराने की वजह से पक्षी मर रहे थे।

अध्ययन के हिस्से के रूप में कच्छ पवन खेतों के 59 टर्बाइनों का अध्ययन किया गया। इसमें टर्बाइनों से 130 मीटर के दायरे में समाखियाली, कच्छ में 11 प्रजातियों के पक्षियों के 47 शव मिले। शोधकर्ताओं ने दावा किया कि ये प्रजातियां खतरे वाली थीं।

टर्बाइन बेस से दूरी जिस पर समाखियाली विंड फार्म, कच्छ, गुजरात में शवों को दर्ज किया गया था। -

संयुक्त अध्ययन में सुझाव दिया गया कि पवन फार्म स्थलों का सावधानीपूर्वक चयन किया जाए जो पक्षी आवासों से दूर हो।

लड़ रहे हैं लंबी लड़ाई

पिछले छह वर्षों से कच्छ के ग्रामीण विवादास्पद स्थानों पर पवन चक्कियों की स्थापना के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं।

2015 में एक पवनचक्की निर्माण कंपनी को बिजली उत्पादन के लिए पवन चक्कियों की स्थापना के लिए संगनारा गांव में 11 स्थल आवंटित किए गए थे, जिनमें से छह पूरे हो चुके हैं। संगनारा गांव के निवासी नितिन लिंबानी ने गांव कनेक्शन को बताया, "पहले कई पेड़ काटे जाते थे क्योंकि पवनचक्की उपकरण और मशीनरी ले जाने के लिए, ट्रेलरों और ट्रकों के गुजरने के लिए क्षेत्र को साफ करना पड़ता था।" उन्होंने कहा कि पवनचक्की के लिए कम से कम तीन से चार एकड़ (लगभग 1.5 हेक्टेयर) भूमि की आवश्यकता होती है, इसलिए वे आसपास के पेड़ों को काटते हैं।

दो महीने पहले, 18 जून को ग्रामीणों ने पवनचक्की निर्माण कंपनी द्वारा जंगल में दो और पवन चक्कियां लगाने का एक नया प्रयास देखा, जिसके कारण क्षेत्र में नए सिरे से विरोध हुआ।

पवनचक्की ट्रकों के प्रवेश पर नजर रखने के लिए पिछले दो महीनों से महिलाओं और युवाओं सहित कम से कम 50-60 ग्रामीण नियमित रूप से गांव की सीमाओं के पास भटक रहे हैं।

गांव के बाहरी इलाके में रोका गया पवनचक्की ट्रक

संगनारा निवासी 55 वर्षीय शंकरलाल गोपालभाई लिंबानी ने गांव कनेक्शन से कहा, "हम पवनचक्की कंपनी को यहां नहीं आने देंगे। हम अपने गांव की सीमा पर रखवाली कर रहे हैं।" शंकरलाल जंगल और चरागाह भूमि को बचाने के लिए विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे हैं। उन्होंने कहा, "टिफिन लेकर ये ग्रामीण हर सुबह सीमा के लिए निकल जाते हैं और पूरे दिन वहीं रहते हैं ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि पवनचक्की के उपकरण गांव में प्रवेश न करें।"

55 वर्षीय शंकरलाल जोर देकर कहते हैं, "हम उन्हें आकर, हमारे जंगलों को नष्ट नहीं करने देंगे।"

लिंबानी ने बताया कि कल विरोध प्रदर्शन के दौरान ग्रामीणों ने संगनारा गांव की ओर जाने वाले रास्ते को जाम कर दिया. उन्होंने बताया,"6 अगस्त को भी पवनचक्की बनाने वाली निर्माण कंपनी के प्रतिनिधि आए थे। उनके ट्रक गांव के बाहरी इलाके में हैं। हमने रोड जाम कर दिया है। यदि वे फिर से आते हैं, तो कच्छ के अधिक से अधिक ग्रामीण हमारे पुश्तैनी जंगल के विनाश को रोकने के लिए शामिल होंगे। "

इस बीच मामला पहले से ही नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के समक्ष है। 2019 में ग्रामीणों ने पवन चक्कियों के निर्माण को रोकने के लिए एनजीटी का रुख किया था। शंकरलाल कहते हैं, "कोरोना महामारी के कारण इस पर अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई है, लेकिन हमारी अगली सुनवाई अगले महीने होने वाली है। हम अपने जंगलों को नष्ट नहीं होने देंगे। "

गांव कनेक्शन ने जिलाधिकारी प्रवीना डीके के कार्यालय से संपर्क किया, लेकिन वह टिप्पणी करने के लिए उपलब्ध नहीं थीं। जिला मजिस्ट्रेट और गुजरात ऊर्जा विकास एजेंसी से प्रतिक्रिया मिलने के बाद कहानी को अपडेट किया जाएगा।

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