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नीलगिरी: आदिवासी समुदाय को वैक्सीनेशन के लिए प्रेरित कर रहे स्थानीय गैर सरकारी संगठन

नीलगिरी प्रशासन की योजना इस महीने के अंत तक पूरी आदिवासी आबादी का टीकाकरण करने की है। इसके लिए वे गैर सरकारी संगठनों की मदद ले रहे हैं। उनके संसाधनों और बुनियादी ढांचे का उपयोग कर रहे हैं। आदिवासी मुखिया को साथ जोड़कर उनकी स्थानीय बोली में सामाजिक संदेश लोगों तक पहुंचाया जा रहा है।

Pankaja SrinivasanPankaja Srinivasan   17 Jun 2021 6:31 AM GMT

नीलगिरी: आदिवासी समुदाय को वैक्सीनेशन के लिए प्रेरित कर रहे स्थानीय गैर सरकारी संगठन

गुडलुर, नीलगिरी में आदिवासी लोगों का टीकाकरण। फोटो: @supriyasahuias/twitter

कोयम्बटूर (तमिलनाडु)। तमिलनाडु में पश्चिमी घाट में स्थित नीलगिरी में लगभग 450-500 आदिवासी बस्तियां हैं जो यहां की प्राचीन पहाड़ियों और जंगलों में जहां-तहां बसी हैं। ये बस्तियां टोडा, कोथा, इरुला, कुरुंभा, पनिया और कट्टुनायकन आदिवासी समुदायों का घर हैं।

2,565 वर्ग किलोमीटर में फैला यह इलाका तमिलनाडु के 38 जिलों में से एक है, जिसकी कुल आबादी 8 लाख है। इसमें से लगभग 27,700 लोग आदिवासी समुदाय से आते हैं। नीलगिरी अपनी जैविक विविधता के लिए भी जाना जाता है।

हालांकि महामारी की पहली लहर में ये लोग ज्यादा प्रभावित नहीं हुए थे। लेकिन दूसरी लहर ने आदिवासी समुदायों को भी नहीं बख्शा, क्योंकि कोरोना वायरस ग्रामीण भारत के सबसे दूर-दराज के इलाकों में भी पहुंच गया है। वैसे सरकार ने टीकाकरण के लिए अनेक कार्यक्रम चलाए, टीकाकरण शिविर भी लगाए। लेकिन कह सकते हैं कि इस बारे में आदिवासी समुदाय ने ज्यादा उत्साह नहीं दिखाया।

नीलगिरी में चल रहा टीकाकरण अभियान। फोटो: @supriyasahuias/twitter

इन चुनौतियों से निपटने के लिए नीलगिरी प्रशासन ने स्थानीय गैर-सरकारी संगठनों को अपने साथ जोड़ा ताकि दूरदराज के इलाकों में रहने वाले आदिवासी समुदायों की दहलीज तक टीकाकरण अभियान को लाया जा सके और उन्हें उसके लिए जागरुक किया जा सके।

प्रशासन की इस मुहिम को अब सफलता मिलने लगी है। नीलगिरी जिले की कलेक्टर जे इनोसेंट दिव्या ने गांव कनेक्शन को बताया कि जिले में आदिवासी समुदायों के कुल 27,700 सदस्यों में से 4000 ने टीके की पहली डोज लगवा ली है।

9 जून को जिला प्रशासन की तरफ से जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया, "सरकार और जिला प्रशासन की योजना पर्याप्त मात्रा में टीके हासिल करने की है ताकि नीलगिरी की पूरी आबादी का टीकाकरण किया जा सके। और यह अपनी पूरी आबादी का टीकाकरण करने वाला देश का संभवतः पहला जिला बना जाए।"

दिव्या के अनुसार, शुरुआत में आदिवासी समुदाय टीका लगवाने में झिझक रहे थे। उन्होंने बताया, "जैसा कि देशभर के ग्रामीण इलाकों में हुआ था, फर्जी सोशल मीडिया पोस्ट और व्हाट्सएप के जरिए फैलाई जाने वाली अफवाहों ने लोगों के अंदर डर बिठा दिया था, तो वे टीका नहीं लगवाना चाहते थे।"

लेकिन जिला प्रशासन ने आदिवासी समुदायों के बीच काम करने वाले स्थानीय गैर-सरकारी संगठनों की मदद ली और अब आदिवासी बस्तियों में जाकर लोगों का टीकाकरण हो रहा है।

पंडालूर तालुका में एनएडब्ल्यूए पनिया फार्म सेंटर में टीकाकरण। फोटो: नीलगिरि आदिवासी कल्याण संघ, कोटागिरी

सार्वजनिक-निजी पहल

दिव्या बताती हैं, "हमने जिले के आदिवासी क्षेत्रों में जमीनी स्तर पर शानदार काम कर रहे अनेक गैर-सरकारी संगठनों की मदद ली और उनके साथ मिलकर काम किया।" कलेक्टर ने विशेष रूप से नीलगिरी आदिवासी वेलफेयर एसोसिएशन, नीलगिरी वायनाड ट्राइबल वेलफेयर सोसाइटी, एक्शन फॉर कम्यूनिटी ओर्गेनाइजेशन, रिहैबिलिटेशन एंड डेवलपमेंट और अस्तित्व जैसे गैर सरकारी संगठनों की सराहना की। उन्होंने कहा कि इन इलाकों में टीकाकरण अभियान को लोगों तक पहुंचाने के लिए सभी संगठनों ने अपने संसाधनों और बुनियादी सुविधाओं को साझा किया।

गैर सरकारी संगठन नीलगिरी आदिवासी वेलफेयर एसोसिएशन (एनएडब्ल्यूए) के सचिव/सीईओ एम अलवास ने गांव कनेक्शन को बताया, "जब सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्र और सरकारी स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के दलों को आदिवासी समुदायों के बीच टीकाकरण करने में ज्यादा सफलता नहीं मिली, तब कलेक्टर ने इन लोगों तक पहुंच बनाने और बेहतर परिणाम के लिए इलाके के गैर-सरकारी संगठनों की मदद ली।"

एनएडब्ल्यूए 1958 से नीलगिरी आदिवासी समुदाय के लिए काम करता आ रहा है। इसने 2009 में आम जन तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने के लिए जिस मोबाइल आउटरीच प्रोग्राम की शुरुआत की थी, उसे तमिलनाडु सरकार के राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन का समर्थन भी प्राप्त है.

लेकिन यह सफर आसान नहीं था। टीकाकरण अभियान और इसके बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए काफी प्रयास किए गए। आदिवासी समुदाय आमतौर पर अस्पतालों पर भरोसा नहीं करते, ना ही वे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र जाते हैं। इसलिए उनके टीकाकरण के लिए सुनियोजित योजना की जरूरत थी।

पंडालूर तालुका में एनएडब्ल्यूए पनिया फार्म सेंटर में टीकाकरण। फोटो: नीलगिरि आदिवासी कल्याण संघ, कोटागिरी

स्थानीय भाषा में सामाजिक संदेश

दिव्या कहती हैं, "हमने सबसे पहले गांव के मुखियाओं की बैठक बुलाई। हमने उनसे बात की और फिर उनके लिए खास तौर से टीकाकरण शिविर लगाए।" वह आगे कहती हैं, "मैंने गांव के लोगों के लिए एक संदेश रिकॉर्ड किया जिसमें उन्हें बताया गया कि सिर्फ टीकाकरण ही हमें कोरोना वायरस से बचा सकता है।"

उसके बाद प्रशासन ने गांव के मुखियाओं से उनकी भाषा में संदेश रिकॉर्ड करावाया। इसमें उन्होंने अपनी भाषा में टीके के असर के बारे में बताया, जिसे बाद में जिले की आदिवासी बस्तियों तक पहुंचाया गया। जब लोगों ने देखा कि उनके मुखिया टीका लगवाने के बाद ठीक-ठाक हैं और उनसे सुना कि टीके से जुड़ी अफवाहें गलत हैं तो वे टीका लगवाने के लिए आगे आने लगे।

अलवास बताते हैं, "एनएडब्ल्यूए पर वर्षों से आदिवासी समुदायों का भरोसा रहा है। हमने आदिवासियों की सेहत, पोषण और शिक्षा पर केंद्रित परियोजनाओं पर काम किया है। टीकाकरण अभियान के लिए एक चिकित्सा अधिकारी, एक स्टाफ नर्स, एक लैब टेक्निशियन और एक ग्राम स्वास्थ्य नर्स ने हमारे एक सदस्य के साथ गांवों का दौरा किया।"

जिला प्रशासन गैर-सरकारी संगठनों के काम से काफी खुश हैं। दिव्या कहती हैं, आदिवासी समुदाय के बीच उनकी पहुंच और प्रभाव के चलते टीकाकरण अभियान में उनका योगदान बहुमूल्य है।


उनके घर की दहलीज तक टीका पहुंचाना

कोविड-19 महामारी की पहली लहर से नीलगिरी आदिवासी समुदाय प्रभावित नहीं हुआ। एनएडब्ल्यूए के शिक्षा निदेशक के विजय कुमार गांव कनेक्शन को बताते हैं, "लेकिन दूसरी लहर से बचना मुश्किल था। अनेक आदिवासी बस्तियां इससे प्रभावित हुईं।"

विजय कुमार ने बताया, "गुडालुर ब्लॉक के गांव चोलाडी में पिछले महीने मई में कोविड-19 के 43 मामले सामने आए थे और धीरे धीरे यह संख्या बढ़ने लगी। आसपास के गांवों में भी संक्रमण फैलने लगा। हालांकि कोविड-19 से होने वाली मौतें यहां सिर्फ एक या दो ही थीं। फिर भी यह चिंता का विषय था।"

जिला प्रशासन ने महसूस किया कि आदिवासी समुदायों को टीका लगाने का सबसे अच्छा तरीका है, टीका उनकी दहलीज तक पहुंचाना। दिव्या बताती हैं, "वे अपने इलाके में सहज हैं और टीका लगवाने के इच्छुक भी। गांव के मुखियाओं के आगे आने के बाद, अब वे संकोच नहीं कर रहे हैं।"

पिछले कुछ हफ्तों से इस जिले में आदिवासी समुदायों की दहलीज तक जाकर टीकाकरण अभियान चलाया जा रहा है।


टीकों की नियमित आपूर्ति की जरूरत

जिला कलेक्टर के अनुसार आदिवासी लोगों के बीच टीकाकरण अभियान गति पकड़ रहा है लेकिन टीके की पर्याप्त उपलब्धता ना होने से यह प्रक्रिया धीमी हो रही है।

6 जून को तमिलनाडु के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री मा सुब्रमण्यम ने नीलगिरी का दौरा किया। उन्होंने घोषणा की कि जून के अंत तक जिले के सभी योग्य आदिवासियों को टीका लग जाएगा। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि तमिलनाडु को जून खत्म होने से पहले वैक्सीन की 42 लाख डोज मिल जाएंगी।

दिव्या गांव कनेक्शन से बताती हैं, "मैंने उन्हें स्थिति की जानकारी दी और बताया कि विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूहों की सेहत की सुरक्षा कितनी जरूरी है. उनकी संख्या लगातार घट रही है। उन्होंने हमें टीके उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया है।"

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, तमिलनाडु में अभी (14 जून 2021) तक वैक्सीन की 10,842,928 डोज लगाई जा चुकी हैं।

अगर सब कुछ योजना के अनुसार रहा तो इस महीने के अंत तक नीलगिरी देश का संभवतः ऐसा पहला जिला बन जाएगा जहां आदिवासी समुदायों समेत पूरी आबादी का टीकाकरण हो चुका होगा।

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अनुवाद- संघप्रिया मौर्य

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