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ग्रामीण इलाकों में जांच की रफ्तार और रिपोर्ट दोनों सुस्त, 10-12 दिन में आ रही कोरोना की आरटीपीसीआर रिपोर्ट

मरीज कोरोना संक्रमित है या नहीं इसका पता सामान्य दो तरह की रिपोर्ट से लगता है, एंटीजन टेस्ट और दूसरा आरटीपीसीआर। एंटीजन की रिपोर्ट तुरंत आती है लेकिन उसकी सत्यता सवालों के घेरे में रही है। RTPCR जांच की रिपोर्ट मान्य है लेकिन ग्रामीण इलाकों में ये जांच कम हो रही है। रिपोर्ट के लिए लंबा इंतना करना पड़ रहा है।

Mithilesh DharMithilesh Dhar   3 May 2021 3:45 PM GMT

ग्रामीण इलाकों में जांच की रफ्तार और रिपोर्ट दोनों सुस्त, 10-12 दिन में आ रही कोरोना की आरटीपीसीआर रिपोर्टआरटीपीसीआर जाँच की रिपोर्ट आने में लग रहे 10 से 12 दिन। (फोटो- अरेंजमेंट)

ग्रामीण भारत में आरटीपीसीआर टेस्ट की रिपोर्ट बहुत देर से आ रही है। तब तक मरीज लोगों के बीच रहता है जिस कारण संक्रमण का खतरा भी बढ़ जाता है। वहीं आरटीपीसीआर टेस्ट की रिपोर्ट न होने की वजह से स्थिति बिगड़ने पर अस्पताल मरीजों को एडमिट भी नहीं ले रहे हैं।

"सरकारी अस्पताल से आरटीपीसीआर की रिपोर्ट एक मई को आयी, जबकि पापा का टेस्ट हमने 24 अप्रैल को ही कराया था। 26 अप्रैल तक जब रिपोर्ट नहीं आयी और स्थिति बिगड़ने लगी तब हमने एक निजी लैब में जाँच कराई जिसमें रिपोर्ट पॉजिटिव आयी। शुक्र है कि हमने ये कदम उठाया और आश्चर्य की बात तो यह है कि सरकारी रिपोर्ट निगेटिव में आयी है।" आयुषी कहती हैं।

आयुषी बागरिया (34) उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से लगभग 350 किलोमीटर दूर जिला कुशीनगर के पट्टी पडरौना में रहती हैं। 30 अप्रैल को उनके पिता अंजनी बागरिया (62) की तबियत ख़राब हो जाती है। कुशीनगर के जिला अस्पताल में बेड नहीं मिलता तो परिजन उन्हें गोरखपुर लेकर जाते हैं, लेकिन वहां भी किसी अस्पताल में बेड नहीं मिलता। फ़िलहाल उनकी स्थिति स्थिर हउ और घर पर ही उनका इलाज चल रहा है।

रिपोर्ट आने में इतनी देरी क्यों हुई? क्या आपने जिला अस्पताल से फिर सम्पर्क नहीं किया, इस सवाल में जवाब में आयुषी कहती हैं, "मुझे तो लगा कि सरकारी अस्पताल में जाँच अच्छी होगी और रिपोर्ट भी जल्दी मिल जाएगी। लेकिन जब 4 दिन बाद भी रिपोर्ट नहीं आयी तो मैं अस्पताल गयी। वहां मुझे पता चला कि यहां तो बस सैम्पल लिया जाता है। जांच तो यहां से लगभग 90 किलोमीटर दूर गोरखपुर में होती है। अगर हम सरकार की रिपोर्ट का इंतजार कर रहे होते तो शायद पापा को बचा ही नहीं पाते।"

अंजनी बागरिया की RTPCR रिपोर्ट, पहली रिपोर्ट सरकारी और दूसरी निजी लैब की है।

कुशीनगर की स्थिति पर वहां के स्वतंत्र पत्रकार संदीप मिश्रा गांव कनेक्शन को बताते हैं, "हमारे जिले में तो 25 अप्रैल के बाद ही जाँच ही नहीं हुई है। स्टाफ की कमी है और उसके बाद सब लोग पंचायत चुनाव की मतगणना में लग गये। यह तो हाल है।"

इस विषय पर बात करने के लिए हमने कुशीनगर के सीएमओ डा.एनपी गुप्ता ने बात करने की कोशिश की। उन्हें कई बार फ़ोन किया, व्हाट्सएप्प पर मैसेज किया, टेक्स्ट भी भेजा लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।

देश के बड़े शहरों में कोविड टेस्ट के लिए सरकारी के साथ-साथ निजी लैब भी हैं, लेकिन ग्रामीण भारत में क्या व्यवस्था है? ग्रामीण भारत की आबादी अभी भी सरकारी अस्पतालों पर निर्भर है, लेकिन जांच रिपोर्ट में देरी और जाँच केंद्रों की ज्यादा दूरी ग्रामीणों के लिए परेशानी बन गयी है। रिपोर्ट न मिलने से मरीज को अस्पतालों में एडमिट नहीं कर रहे और बीमार होने के बावजूद ग्रामीण टेस्ट नहीं करा पा रहे हैं।

जांच रिपोर्ट में देरी के कारण मरीजों को परेशानी को सामना करना पड़ रहा है।
(फोटो -अरेंजमेंट)

मध्य प्रदेश के जिला सिवनी के ब्लॉक केवलारी गांव पारसपानी में रहने किसान शिवम बघेल भी जांच केंद्र की दूरी को लेकर सवाल उठाते हैं। वे गांव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, "मेरे यहां तो कोविड के दोनों टेस्ट जिला अस्पताल में होते हैं यहां से लगभग 60 किलोमीटर दूर है। 15 से अप्रैल से अब तक गांव में लगभग 10 लोगों की मौत भी हो चुकी है। वे सब लोग बीमार थे लेकिन दूर होने की वजह से कोई जाँच कराने नहीं गया। यहां तो ऐसे सुविधा भी नहीं है कि सैम्पल घर पर ही लिया।"

देश में कोरोना कोरोना की दूसरी लहर तबाही लेकर आई है। सोमवार तीन मई को 3.68 लाख से ज्यादा नए कोरोना मरीज मिले हैं और 3,417 लोगों की मौत हो गई। स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से सोमवार को जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक देश में संक्रमित मरीजों की कुल संख्या बढ़कर 1,99,25,604 हो गई है। वहीं बीते 24 घंटों में 3,417 लोगों की कोरोना से जान चली गई। इसके साथ कोविड से मरने वालों की संख्या 2,18,959 पहुंच गई।

दूसरी लहर में देश का ग्रामीण भारत भी नहीं बच पाया है। पहले सेही ही लचर स्वास्थ्य व्यवस्थाओं वाले ग्रामीण भारत की स्थिति ख़राब है, लेकिन मीडिया की ख़बरों में इसका जिक्र नहीं है। गांव-गांव के बीमार हैं, लेकिन इनकी जांच नहीं हो पा रही है। शायद यही वजह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में जांचों की संख्या भी बहुत कम है।

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कोरोना टेस्ट के लिए आरटीपीसीआर (Reverse Transcription Polymerase Chain Reaction) टेस्ट (RTPCR) सबसे भरोसेमंद माना जाता है। इसके अलावा रैपिड एंटीजन टेस्ट (Rapid Antigen Test) भी होता है जिसका नतीजा तुरंत आ जाता है लेकिन आरटीपीसीआर टेस्ट की रिपोर्ट में 70 से 72 घंटे का समय लगता है, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा, जबकि कोविड अस्पताल में एडमिट करने से पहले आरटीपीसीआर की पॉजिटिव रिपोर्ट मांगते हैं, ऐसे में जिनके पास रिपोर्ट नहीं होती उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

जिलों में जांचों की संख्या बहुत कम

उत्तर प्रदेश का मिर्ज़ापुर जिला जिसकी कुल आबादी लगभग 25 लाख है, यहां 2 मई को कोविड जाँच के लिए मात्र 1123 सैंपल लिए गए जिसमें आरटीपीसीआर टेस्ट की संख्या महज 363 रही वहीं 20 लाख की आबादी वाले भदोही जिले में तीन मई को जांच के लिए कुल 660 सैम्पल लिए गए (एंटीजन और आरटीपीसीआर)।


उत्तर प्रदेश के ही शाहजहांपुर जिले ब्लॉक भागलखेड़ा के गांव कजरी मूलपुर में रहने वाले अरविंद कुमार (27) की तबियत 15 अप्रैल को बिगड़ती है। इसके बाद वे जिले के सरकारी अस्पताल ओसीएफ शाहजहांपुर में 17 अप्रैल को आरटीपीसीआर टेस्ट कराते हैं, लेकिन (3 मई 2021) तक उनकी रिपोर्ट नहीं आ पाई है। ऑनलाइन चेक करने पर पता चल रहा है कि सैंपल अभी लैब गया ही नहीं है।

वे गांव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, "जाँच सेंटर मेरे घर से लगभग 20 किलोमीटर है। तबियत बिगड़ने पर जाँच कराने गया तो वहां एंटीजन जाँच के लिए किट नहीं था तो आरटीपीसीआर टेस्ट कराया, लेकिन 17 दिन बाद भी मेरी रिपोर्ट नहीं आयी है। बीच में मेरी तबियत भी बिगड़ी, लेकिन शुक्र है अब ठीक हूँ।"

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लेकिन उत्तर प्रदेश जिला मिर्ज़ापुर के ब्लॉक सीखड़ के गांव विदापुर के रहने अभिषेक पांडेय के साथ ऐसा नहीं होता। उनकी मम्मी (55) आशा पांडेय की तबियत 25 अप्रैल को बिगड़ती है। तो वे पहले पास के सामुदायिक केंद्र में एंटीजन टेस्ट कराते हैं जिसकी रिपोर्ट निगेटिव आती है। अगले दिन 26 अप्रैल को आरटीपीसीआर टेस्ट भी कराते हैं। उन्हें बताया जाता है कि रिपोर्ट 72 घंटे में आ जाएगी लेकिन ऐसा होता नहीं।

इस बीच उनकी मम्मी की तबियत 28 अप्रैल को बिगड़ जाती है। अभिषेक बताते हैं, "मम्मी को साँस लेने में तकलीफ हो रही थी। उन्हें हम जिले के अस्पतालों में ले गए लेकिन उन्हें किसी ने एडमिट ही नहीं किया। फिर हम उन्हें बनारस ले गए लेकिन आरटीपीसीआर रिपोर्ट न होने की वजह से किसी ने एडमिट नहीं लिया।"

"किसी तरह उन्हें एक परिचित के अस्पताल में एडमिट कराया। खुद ऑक्सीजन की व्यवस्था की। रिपोर्ट 5 दिन बाद आई।" अभिषेक आगे कहते हैं।

हालाँकि उत्तर प्रदेश सरकार का दावा है प्रदेश में 2 मई को 1 लाख 29 हजार आरटीपीसीआर टेस्ट किया जो रिकॉर्ड है।

टेस्ट को लेकर मुश्किलें लगभग पूरे ग्रामीण भारत में हैं। राजस्थान के जिला बाड़मेर के तहसील सिणधरी के गांव ठाकरा राम चौधरी भी कहते हैं कि जाँच केंद्र मेरे गांव से लगभग ३० किलोमीटर है। ऐसे में लोग बीमार होने के बावजूद टेस्ट कराने में कतरा रहे हैं।

आरटीपीसीआर रिपोर्ट न होने की वजह से मरीजों को अस्पताल में एडमिट नहीं ले रहे रहे हैं। (फोटो -अरेंजमेंट)

वे कहते हैं, "गांव में टेस्टिंग नहीं हो रही है। टेस्टिंग करवाने के लिए यहां से 30 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। गांव में लोगों को वैक्सीन तो लगी है लेकिन बहुत सारे लोग बीमार हैं। उनकी जाँच नहीं होगी तो पता कैसे चलेगा कि कोरोना है नहीं है।

बिहार के जिला गोपालगंज के ब्लॉक कटिया बैरिया के रहने वाले त्रियंबक श्रीवास्तव जो एम्स दिल्ली से पीएचडी कर रहे हैं, वे गांव कनेक्शन को जो बताते हैं उससे पता चलता है कि देश कोविड जांच की वास्तविक स्थिति क्या है।

वे फोन पर बताते हैं, "मेरे परिवार में छोटे भाई, बहन, पिताजी, और चाची को कोविड-19 हुआ है। जाँच के लिए सैंपल 17 अप्रैल को लिया गया जिसकी रिपोर्ट्स अभी तक नहीं मिली। (एसएमएस अथवा बिहार सरकार के बहुप्रचारित संजीवन एप से. हॉस्पिटल ने भी 1 हफ्ते से ज्यादा समय लेकर भी रिपोर्ट साझा नहीं किया)। भाई की स्थिति ख़राब होने पर उसे घर से लगभग 90-95 किमी दूर बीआरडी मेडिकल कॉलेज, गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) में दाखिल कराया गया जहाँ वो कोविड-19 पॉजिटिव आया।

"मैंने अपने एम्स के साथियों की मदद से परिवार की यथासंभव मदद की। मुख्यत: कोविड-19 जन्य चिंता व अवसाद से. शासन और प्रशासन की तरफ से हमें कोई भी सहायता नहीं मुहैया कराई गई, खैर, उम्मीद भी नहीं थी।" वे आगे बताते हैं।

जन स्वास्थ्य अभियान मध्य प्रदेश से जुड़े और स्वास्थ्य अधिकार पर लंबे समय से काम कर रहे अमूल्य निधि का कहना है कि सरकारों को गांवों में आरटीपीसीआर टेस्ट की संख्या बढ़ानी होगी।

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वे कहते हैं, "एंटीजन टेस्ट में सही रिपोर्ट नहीं आती, ऐसे में जरूरी है कि सरकार आरटीपीसीआर टेस्ट को तेज करे गांवों में यह सुविधा सुलभ हो और दूरी कम हो। गांवों को अगर बचाना है तो सरकार को जांच की संख्या बढ़ानी होगी।"

आरटीपीसीआर टेस्ट कम क्यों हो रहा, इस बारे में हमने उत्तरा प्रदेश के भदोही के एक ब्लॉक में तैनात जाँच केंद्र अधिकारी से बात की। उन्होंने नाम न बताने की शर्त पर बताया, "एक सच यह भी है कि हमें जाँच करने वाला किट पर्याप्त नहीं मिलता। एक सेंटर पर 25-50 किट मिलते हैं और टेस्ट कराने वालों की संख्या सैकड़ों में होती है, ऐसे में सबका आरटीपीसीआर टेस्ट तो हो नहीं सकता।"

वहीं उत्तर प्रदेश के ही जिला मिर्ज़ापुर के सीएमओ डा. विधु गुप्ता का कहना है कि हमारे यहां कई स्टाफ कोविड पॉजिटिव हैं जिस कारण आरपीटीसीआर टेस्ट कम हो पा रही है। वे बताते हैं, "हमारे यहां कई लैब कर्मचारी संक्रमित हैं, इसलिए टेस्ट कम हो पा रहा है। वैसे नियम तो है कि रिपोर्ट 10 से 12 घंटों में आ जानी चाहिए लेकिन अभी 3 से 4 दिन का समय लग रहा है।"

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